पृष्ठ

indore लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
indore लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, अगस्त 25, 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला

Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।

बुधवार, अगस्त 11, 2010

बताओ, आपके अस्पताल में मानवाधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा?

- ड्रग ट्रायल मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग ने एमवायएच को भेजा नोटिस

बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का रोगियों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) पर राज्य मानवाधिकार आयोग ने सख्त रवैय्या अपना लिया है। आयोग ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल एमवायएच को नोटिस भेजकर पूछा है कि बताएं, ट्रायल के कारण आपके अस्पताल में आ रहे रोगियों के मानवाधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा? जवाब के लिए आयोग ने तीन सप्ताह की समय सीमा तय की है।

आयोग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक आयोग के अध्यक्ष पूर्व जस्टिस डीएम धर्माधिकारी और दो अन्य सदस्यों ने 'पत्रिकाÓ अखबार में प्रकाशित खबरों के आधार पर एमवायएच अधीक्षक को 30 जुलाई को पत्र भेजा है। आयोग की खबरों की कटिंग स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नामक एनजीओ द्वारा उपलब्ध हुई थी। ताज्जुब तो यह है कि एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को यह नोटिस आज तक प्राप्त नहीं हुआ है। वे कहते भी हैं मुझे इस तरह की कोई जानकारी नहीं है।



इन बिंदुओं पर मांगी है जानकारी
ट्रायल से मरीजों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है?
मरीजों की सुरक्षा का ख्याल कैसे रखा जा रहा है?
मरीज के मानवाधिकार की रक्षा के लिए क्या एहतियात बरती जाती है?

भला क्या जवाब देंगे, ट्रायल में लिप्त अधीक्षक
आयोग ने एमवायएच अधीक्षक को नोटिस दिया है, लेकिन अधीक्षक डॉ. भार्गव खुद ही ट्रायल में लिप्त हैं। वे सरकारी नौकरी करके अपने ट्रायल सेंटर 'ज्ञान पुष्पÓ पर ट्रायल करते हैं। वर्तमान में उनके केंद्र पर करीब एक हजार मरीज रजिस्टर्ड हैं, जो ट्रायल से गुजर रहे हैं।

News in Patrika on 10th August 2010

रविवार, अगस्त 08, 2010

परिजन पर क्यों नहीं किए ट्रायल?

डॉक्टरों ने दी ड्रग ट्रायल पर सफाई, डीन को भी दी जाती है पूरी राशि की जानकारी

ड्रग ट्रायल के आरोपों से घिरे डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल क्या है और इससे क्या लाभ हैं इसे लेकर डॉक्टरों ने होटल क्राउन पैलेस में गोष्ठी का आयोजन किया। डॉक्टरों ने बताया कि कोई भी कंपनी डॉक्टर की योग्यता देखकर ही अनुबंध करती है। डॉक्टरों ने कहा कि कंपनियों से मिलने वाली राशि का खुलासा आयकर विभाग के समक्ष किया जाता है। इसमें कोई चोरी नहीं की जाती। मरीजों की सहमति से किए जाने वाले ट्रायल में किसी तरह की आशंका की गुंजाइश नहीं रह जाती।

ट्रायल विश्व के सभी विकसित और विकासशील देशों में किए जा रहे हैं। यह रोजगार के अवसर पैदा करता है और अनुसंधान में देश को आगे ले जाता है। गोष्ठी में कॉलेज डीन की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया। ट्रायल के माध्यम से मिलने वाली राशि की पूरी जानकारी डीन को भी दी जाती है। बैठक में ये सवाल भी उठा कि क्यों गरीब मरीजों पर ही ट्रायल किए जाते हैं? कितने डॉक्टरों ने परिवार के सदस्यों पर ट्रायल किए? इनमें से किसी भी सवाल का जवाब डॉक्टर नहीं दे सके। बैठक में पूर्व कुलपति और ट्रायल का कानून तैयार कर रहे डॉ. भरत छपरवाल, डॉ. सरोज कुमार, अभय छजलानी, इथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी, डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. आरके माथुर, डॉ. पूनम माथुर, डॉ. उज्ज्वल सरदेसाई व जूनियर डॉक्टर आदि मौजूद थे।

news in Patrika on 7th August

सोमवार, अगस्त 02, 2010

कौन सच्चा अमेरिका या भारत ?

अमेरिका की कंपनियों के इंदौर में 99 ट्रायल हुए, लेकिन भारत सरकार को 56 की ही जानकारी


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का इंसानों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भारत सरकार के आंकड़े कटघरे में हैं। ट्रायल का रजिस्ट्रेशन करने वाली भारत की सरकारी संस्था क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया और अमेरिका के राष्टरीय स्वास्थ्य संस्थान के आंकड़ों में भारी अंतर है। भारत सरकार को जानकारी है कि इंदौर में अब तक 56 ट्रायल हुए हैं, जबकि अमेरिका सरकार कहती है इंदौर में 99 ट्रायल हुए हैं। इसके अलावा दूसरे देश भी हैं, जहां की विकसित दवाइयां इंदौर में परखी गई हैं।

अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ नाम का सरकारी विभाग है। इसकी वेबसाइट पर दर्ज है कि अमेरिका की कंपनियों से भारत में 1432 ट्रायल किए हैं। इनमें से 176 जयपुर में और 47 भोपाल में हुए हैं। इधर, भारत के सीटीआरआई की वेबसाइट बताती है जयपुर में 121 ट्रायल हुए हैं, जबकि भोपाल की कोई जानकारी ही उपलब्ध नहीं है। दोनों ही वेबसाइट 2 अगस्त तक अपडेटेड हैं। 

निगरानी तंत्र नहीं होने का नतीजा
इस नई जानकारी से यह बात साफ होती है कि ट्रायल रुपए हासिल करने के खातिर ही हो रही है, न कि शोध के लिए। कई कंपनियां भारत सरकार को बगैर जानकारी दिए ट्रायल करवा रही हैं। चूंकि ट्रायल की निगरानी का तंत्र ही देश में मौजूद नहीं है, इसलिए कई कंपनियां जमकर लोगों को शिकार बना रही हैं।



ईओडब्ल्यू की जांच इंदौर पहुंची
ड्रग ट्रायल में शामिल सात डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) द्वारा भोपाल में शुरू की गई जांच, सोमवार को इंदौर पहुंच गई। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति की शिकायत की जांच के लिए ईओडब्ल्यू डीआईजी प्रियंका मिश्रा यहां आई और कुछ जरूरी दस्तावेजों को बटोरकर भोपाल रवाना हो गई। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ईओडब्ल्यू जांच के घेरे में हैं। इन पर सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने का आरोप है।



३ अगस्त २०१० को पत्रिका में प्रकाशित खबर

रविवार, अगस्त 01, 2010

शोध नहीं है ड्रग ट्रायल


एमसीआई के पत्र का साफ संदेश


ड्रग ट्रायल शोध है या नहीं? इस बहस का जवाब चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी सर्वोच्च संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के एक नियम में मिलता है। एमसीआई के मुताबिक जब ड्रग ट्रायल के परिणाम भारत में प्रकाशित किए जा सकें, तभी यह शोध है। यदि दवा कंपनी ऐसा नहीं करने देती है, तो ट्रायल किया ही नहीं जाना चाहिए।

एमसीआई ने इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन करके यह बात गत वर्ष ही स्पष्ट की है। दरअसल, भारत सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 में वर्ष 2005 में संशोधन किया तो देशभर में डॉक्टरों ने शोध के नाम पर ड्रग ट्रायल शुरू कर दिए, परंतु इसके परिणामों को छापने की अनुमति किसी को नहीं मिली। डॉक्टर से समझौता करने वाली स्पांसर कंपनी ने ड्रग ट्रायल के परिणामों को प्रकाशित करने का अधिकार स्वयं के पास सुरक्षित रखती हैं। एमसीआई ने इसी बंधन से ट्रायल को मुक्त रखने के लिए नए नियम जारी किए।

आईसीएमआर के ट्रायल शोध
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) देशभर में जो भी ट्रायल करवाती है, उन्हें चिकित्सा जगत में शोध का दर्जा दिया गया है। पोलियो की दवा, स्वाइन फ्लू का टीका ऐसे ही ट्रायल हैं। इनके नतीजों को भारत सरकार द्वारा प्रकाशित किया जाता है और ये देश में चिकित्सा विज्ञान की प्रगति में सहायक साबित होते हैं। बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के परीक्षण के नतीजों पर कंपनी का अधिकार रहता है।




जवाब भी तैयार नहीं कर पाई सरकार
 बीस दिन में भी नहीं जुटी जानकारी
 तीनों विधायकों के प्रश्न अब तक बेजवाब


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भले ही सरकार ने कायदे कानून बनाने की घोषणा कर दी हो, लेकिन अभी भी तीन विधायकों के प्रश्नों के जवाब तैयार नहीं हुए हैं। इन विधायकों ने सरकार से सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में ड्रग ट्रायल की जानकारी चाही थी।

सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल, रतलाम के पारस सकलेचा और ग्वालियर के प्रदुम्म तोमर ने तारांकित प्रश्न पूछे थे। बीस दिन पहले (12 जुलाई) को ग्रेवाल का सवाल सभी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचा था। सदन ने ग्रेवाल को सूचना दी थी कि 23 जुलाई को जवाब दे दिया जाएगा, परंतु जब उन्होंने मांगा तो कहा गया जानकारी जुटाई जा रही है। ऐसा ही जवाब सकलेचा और तोमर को मिला।

प्रक्रिया पर सवालिया निशान
विधानसभा में पूछे जाने वाले सवाल के जवाब तय समय सीमा में देने जिम्मेदारी सरकारी अमले की है। मीडिया में जब मामला आ जाए, तो और भी सक्रियता के साथ जानकारी तैयार की जाना चाहिए, परंतु इस मसले में ऐसा नहीं किया गया।

अनियमितता दबाने की कोशिश तो नहीं
ड्रग ट्रायल में बहुत अधिक राशि का लेन-देन होता है। एक मरीज के लिए डॉक्टर को औसतन दो से पांच लाख रुपए मिलते हैं। माना जा रहा है कि इसी पर परदा डालने के लिए जानकारी रोकी गई है।

इन सवालों में अटकी सरकार
- ड्रग ट्रायल कराने वाली कंपनियों से किस डॉक्टर को कितनी राशि मिली?
- जिन मरीजों पर ट्रायल किया गया, क्या उन्हें इसकी जानकारी दी गई? यदि हां, तो नाम बताएं।
- किसी भी राशि के लेनदेन के लिए किससे इजाजत ली गई?
- पांच वर्ष में कितने डॉक्टर विदेश गए और उन्हें किस कंपनी ने भेजा? क्या वे अनुमति लेकर गए?


News in PATRIKA on 02 Aug 2010

निजी अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल का धोखा

ड्रग ट्रायल
कई अस्पतालों में धड़ल्ले से निशाना बन रहे मरीज
स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है कोई जानकारी











बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का परीक्षण (ड्रग ट्रायल) केवल सरकारी एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में ही नहीं हो रहा है। कई निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में भी यह काम जोरों पर है। ऐसा भी नहीं है कि किसी एक बीमारी के रोगियों पर ही ट्रायल चल रहे हैं। दिल के ऑपरेशन में लगने वाले स्टेंट से लेकर इनहेलर तक और डायबिटीज से लेकर कैंसर तक के रोगियों तक पर प्रयोग हो रहे हैं। 

भारत सरकार के क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया (सीटीआरआई) का रिकॉर्ड बताता है कि मप्र में सबसे अधिक ट्रायल इंदौर में किए जा रहे हैं। पिछले चार वर्ष (२००६-२००९) के आंकड़ों पर गौर करें तो मप्र में ८३ दवाओं के ट्रायल किए गए इनमें से ५६ ट्रायल इंदौर में हुए, जबकि २७ ट्रायल भोपाल सहित प्रदेश के अन्य शहरों में किए गए।

निजी अस्पतालों में हो रहे ड्रग ट्रायल के बारे में विभाग के पास कोई जानकरी उपलब्ध नहीं है। नियम देखकर इनके बारे में पड़ताल की जाएगी।
- डॉ. शरद पंडित, सीएमएचओ, इंदौर

ये हैं कुछ निजी डॉक्टर

1. डॉ. सुनील एम. जैन
अस्पताल- टोटल (डायबिटीज थॉयरॉइड हॉरमोन रिसर्च इंस्टीट्यूट)
कंपनी - बोईरिंगर इंगेल्हिम फार्मास्यूटिकल्स सहित कुछ अन्य कंपनियां
उत्पाद - बीआई १३५६ (५ एमजी) सहित कुछ अन्य उत्पाद
बीमारी - डायबिटीक मरीजों में ग्लायकेमिक

२. डॉ.गोविंद एन.मालपानी
अस्पताल-  सुयश
कंपनी - ल्यूपिन
उत्पाद - एलएलएल २०११, नेसल स्प्रे
बीमारी - माइग्रेन


3. डॉ.एके पटेल
अस्पताल-  चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - पेल्सीटेक्सल, सिस्प्लेटिन (किमोथेरेपिक एजेंट)
बीमारी - स्मॉल सेल लंग केंसर 


4. डॉ. सुशील भाटिया
अस्पताल- चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - मायकोबैक्टेरियम विथ डॉसिटेक्साल
बीमारी - प्रोस्टेट केंसर

5. डॉ.गिरीश के कवठेकर
 अस्पताल  - सीएचएल अपोलो अस्पताल
 कंपनी  - इन्फीनियम-कोर
 उत्पाद   - कोरोनरी स्टेंट
 बीमारी  - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


6. डॉ.विनोद सोमानी
अस्पताल -  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


7. डॉ. शैलेंद्र त्रिवेदी
अस्पताल-  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


8. डॉ. नितीन मोदी
अस्पताल- सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


9. डॉ. बीएस ठाकुर
अस्पताल-  गे्रटर कैलाश
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स व जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 


10. डॉ. अतुल शेंडे
अस्पताल - मानव ट्रेड सेंटर स्थित क्लिनिक
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स और जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 

11. डॉ. प्रवर पासी
अस्पताल- ग्रेटर कैलाश 
कंपनी - बायोजेन आइडेक
उत्पाद - १२५ एमसीजी, बीआईआईबी ०१७
बीमारी - मल्टीपल सिरोसिस

( खबर शैलेष दीक्षित से साभार)

=======



आंध्रप्रदेश के कानून पर कमेटी की निगाह 
 प्रमुख सचिव के साथ डीएमई और डॉ. छपरवाल भी शामिल

बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के परीक्षण (ड्रग ट्रायल) को प्रदेश में काबू करने के लिए नियमावली बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यी कमेटी की निगाह आंध्रप्रदेश के कानून पर है। वहां ड्रग ट्रायल को प्रतिबंधित किया गया है। कमेटी संभवत: एक माह में रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी।

स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने शुक्रवार को विधानसभा में कमेटी गठित करने की घोषणा की थी। शनिवार को 'पत्रिकाÓ से चर्चा में उन्होंने बताया चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनाई कमेटी में संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी और एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल सदस्य रहेंगे।

उधर, दाणी ने बताया फिलहाल ड्रग ट्रायल के संबंध में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट लागू किया गया है। अध्ययन करने के बाद ही स्पष्ट होगा कि राज्य सरकार इस बारे में क्या कर सकती है? दोनों अन्य सदस्यों के साथ शीघ्र ही बैठक की जाएगी। कोशिश रहेगी कि एक महीने में रिपोर्ट बनाकर दे दी जाए। डॉ. छपरवाल ने बताया फिलहाल मुझे कमेटी के सदस्य बनाए जाने की जानकारी नहीं मिली है। मौजूदा कानूनों और गाइडलाइन का अध्ययन करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।



सीबीआई, एमसीआई को भी शिकायत
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) में जांच शुरू होने के साथ ही एमजीएम मेडिकल कॉलेज के ड्रग ट्रायल की शिकायत सीबीआई और एमसीआई को भी पहुंच चुकी है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने बताया दोनों स्थानों पर शपथ पत्र के साथ शिकायत की गई है।

गुरुवार, जुलाई 29, 2010

ड्रग ट्रायल में जा चुकी एक जान



 जबलपुर में कैंसर मरीज की हुई थी मौत
 भोपाल, ग्वालियर में भी अनियमितताएं


बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के दौरान प्रदेश में एक महिला मरीज की जान जा चुकी है। जबलपुर के कैंसर अस्पताल में इस मरीज का उपचार चल रहा था। उधर, इंदौर के बाद भोपाल और ग्वालियर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल की अनियमितताएं सामने आई हैं।

जबलपुर में अगस्त 2008 में कैंसर रोगियों पर ड्रग ट्रायल शुरू  हुआ था। रेडियोथेरेपी की प्रोफेसर डॉ. पुष्पा किरार और डॉ. अमित जोतवानी ने पेट के कैंसर (कार्टिनोमा स्टमक) के चार रोगियों पर दवा का प्रयोग शुरू किया था। चूंकि यह ट्रायल प्लेसिबो (इलाज के बीच में दवा बंद करके दूसरे मरीजों से तुलना करना) था, इसलिए एक महिला रोगी पर सारी दवाइयां बंद कर दी गईं। इसी दौरान उसकी मौत हुई।

प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मुताबिक मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में चिकित्सा जगत की विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की घोषणा को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार किया है।


'वह बहुत गंभीर थीÓ

 क्या आपने कोई ट्रायल किया है?
 हां, 2008 में शुरू किया था, लेकिन चार मरीजों के बाद ही बंद कर दिया।

बंद क्यों कर दिया?
ïकॉलेज की मान्यता और हमारी डिग्री के कारण कंपनी ने इंकार कर दिया था।

सूचना के अधिकार में आपने जानकारी दी है कि चार में से एक की मौत हो गई?
ïहां, मौत हुई थी। वह महिला बहुत गंभीर अवस्था में थी। चूंकि ट्रायल प्लेसिबो था, इसलिए कुछ मरीजों को दवा नहीं दी जाती है। उसे भी नहीं दी थी।

मौत के कारण ही ट्रायल बंद तो नहीं हुआ?
हमारे यहां इंदौर जैसा मामला नहीं है। मैं खुद भी ट्रायल करना नहीं चाहती थी, इसलिए बंद कर दिया।
(डॉ. पुष्पा किरार से सीधी बात)


भोपाल का हाल
ईसी अहमदाबाद में, ट्रायल भोपाल में

गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के सर्जरी एचओडी डॉ. एमसी सोनगरा और डॉ. नितिन वर्मा ने 2008 में मूत्र रोग से पीडि़त 40 लोगों पर कैडिला कंपनी की दवा का प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने अहमदाबाद की एक निजी एथिकल कमेटी (ईसी) से मंजूरी ली। आईसीएमआर की गाइडलाइन के मुताबिक यदि सरकारी कॉलेज में एथिकल कमेटी मौजूद हो, तो बाहर की किसी कमेटी से अनुमति नहीं ली जा सकती है।


ग्वालियर में बड़ा कारोबार
3500 लोगों पर थोपा ट्रायल, कमेटी भी अधूरी 

वर्ष 2005 में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में किए गए संशोधन के मुताबिक ट्रायल को मंजूरी देने वाली एथिकल कमेटी में एक आम आदमी समेत पांच बाहरी व्यक्ति होना आवश्यक है। ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी में दो लोग बाहर हैं और इनमें भी आम आदमी नहीं है। यहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्मेंद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए। इसमें करीब 3500 रोगियों को चुना गया।



ईओडब्ल्यू में बयान शुरू
 ड्रग ट्रायल मामले में तीन सप्ताह में पूरी होगी प्रारंभिक जांच

मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण करने (ड्रग ट्रायल) के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने भोपाल में बुधवार से बयान लेना शुरू कर दिया है। ब्यूरो ने सबसे पहले शिकायतकर्ता से वे दस्तावेज हासिल किए हैं, जिनके आधार पर शिकायत की गई। 

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम संगठन ने ईओडब्ल्यू में शिकायत की है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर के सात डॉक्टरों ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों से सांठगांठ करके ड्रग ट्रायल शुरू किया। इसके एवज में उन्हें अकूत संपत्ति हासिल की। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया जांच का दायित्व असिस्टेंट आईजी प्रियंका शर्मा को सौंपा है। उन्होंने शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे के बयान दर्ज कर लिए हैं। करीब तीन सप्ताह में जांच का कार्य समाप्त कर लिया जाएगा। जिन डॉक्टरों पर आरोप हैं, उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

ईओडब्ल्यू आईजी के मुताबिक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल के खिलाफ शिकायत मिली है।


दोषियों पर होगी कार्रवाई : मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भोपाल में मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा ड्रग ट्रायल मामले में ईओडब्ल्यू में शिकायत हुई है और वहां जांच भी शुरू हो गई है। जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 


देर रात तक उलझा रहा एमजीएम

एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में हुए ड्रग ट्रायल मामले में संभवत: गुरुवार को विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाया जाएगा। इसकी तैयारी में रात करीब 9.30 बजे तक कॉलेज में कार्य जारी थी। कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के साथ ही कुछ प्रोफेसर और प्रशासनिक अधिकारी जुटे थे, ताकि भोपाल मुख्यालय से पूछे गए हर सवाल का 'माकूलÓ जवाब दे सकें। उधर, भोपाल में संचालक चिकित्सा शिक्षा और प्रमुख सचिव में भी देर रात तक इस मसले पर कार्य चलने की जानकारी मिली है।

News i n PATRIKA on 29th July 2010

बुधवार, जुलाई 28, 2010

एमसीआई को थी ट्रायल घपले की भनक


- देशभर के मेडिकल कॉलेजों को भेजे थे नोटिस
- सात माह बाद भी किसी अफसर ने नहीं दिया ध्यान

 
अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाईश के घपले की मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भनक लग चुकी थी। इसी कारण सात माह पहले देश के सभी मेडिकल कॉलेजों को एक पत्र लिखा गया था। पत्र में कहा था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। अफसोस जनक यह है कि चिकित्सा शिक्षा की इस सर्वोच्च संस्था को एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर जैसे संस्थानों ने कोई तवज्जो नहीं दी। ï

एमसीआई सचिव रिटायर्ड कर्नल डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को लिखा था कि ट्रायल से आर्थिक लाभ उठाने के लिए डॉक्टर मरीजों को निशाना बना रहे हैं, इसलिए इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन आवश्यक हो गया है। इस संशोधन के बताए अनुसार ही अब कॉलेजों के डॉक्टरों को बरताव करना अनिवार्य है।

'मेरे पास इस तरह के निर्देश आए थे और इसकी जानकारी सभी विभागाध्यक्षों को दे दी गई थी। अब उन्होंने इसका पालन नहीं किया तो कार्रवाई की जाएगी।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर

छह बिंदु जिनका उल्लंघन हुआ

एक-
कोई भी डॉक्टर किसी दवा कंपनी से कोई उपहार नहीं लेगा।
दो-
कोई भी डॉक्टर या उसके परिवार का सदस्य किसी दवा कंपनी के खर्चे से यात्रा नहीं करेगा।
तीन-
ट्रायल की स्थिति में कोई भी डॉक्टर पारदर्शी तरीके से ही कंपनी से रुपए लेगा।
चार-
ट्रायल शुरू करने के पहले ही जनता को विज्ञापन जैसे माध्यम से राशि की जानकारी देना होगी।
पांच-
जो मरीज स्वेच्छा से ट्रायल में शामिल हों, उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा का इंतजाम करना होगा।
छह-
दवा कंपनी से किए गए समझौते में ट्रायल के परिणाम को प्रकाशित करने का अधिकार लेना।


डीजीपी को भी भेजी शिकायत
लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के बाद ड्रग ट्रायल करने वाले मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस महानिदेशक के पास भी शिकायत हुई है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, एथिकल कमेटी अध्यक्ष डॉ. केडी भार्गव के साथ ही करीब चालीस डॉक्टरों और कमेटी सदस्यों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और गैर इरादतन हत्या जैसे आरोप दर्ज करने की मांग की है।

भोपाल ईओडब्ल्यू करेगा जांच
स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति संगठन द्वारा की गई शिकायत पर भोपाल पदस्थ असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल प्रियंका मिश्रा को जांच का जिम्मा सौंपा गया है। उन्होंने इसकी पड़ताल भी शुरू कर दी है। पहले माना जा रहा था कि जांच ईओडब्ल्यू के इंदौर दफ्तर से शुरू होगी। शिकायत में डॉ. हेमंत जैन, डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. पुष्पा वर्मा और डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया गया है।





आजाद ने मांगे इंदौर ड्रग ट्रायल के तथ्य
- 'पत्रिकाÓ की खबरों पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने लिया संज्ञान
- भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से भी की चर्चा





केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्री गुलाम नबी आजाद ने इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ïïविकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण किए जाने को लेकर 'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों को गंभीरता से लिया है। इस संबंध में उन्होंने मंत्रालय से सभी जरूरी तथ्य मांगे हैं। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है।

अधिकारी ने बतायाï इंदौर के एमवाय अस्पताल, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय और चेस्ट सेंटर में पिछले कुछ साल से मरीजों पर दवाओं का धोखे से परीक्षण किए जाने की जानकारी मिली है, जिसे आजाद ने गंभीरता से लिया है। आजाद ने इस संबंध में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच से भी चर्चा की। आईसीएमआर मापदंडों के आधार पर ही दवाइयों के क्लिनिकल परीक्षण होते हैं।  


News in PATRIKA on 28th July 2010

रविवार, जुलाई 25, 2010

ईओडब्ल्यू में जांच शुरू

 आईजी ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना



विदेशी दवा कंपनियों से मिलने वाले रुपए के लिए शुरू हुए ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में शामिल डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने जांच शुरू कर दी है। ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना है। फिलहाल जांच में सात डॉक्टरों के नाम हैं, जो आगे 50 से अधिक तक पहुंच सकते हैं।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति द्वारा ईओडब्ल्यू में शिकायत की गई थी। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया शिकायत को जांच में ले लिया गया है। प्रथम दृष्टया यह बेहद गंभीर मामला दिखता है। आरोपों सच साबित होने पर केस दर्ज किया जाएगा। संभवत: जांच इंदौर ऑफिस भेजी जाएगी।

शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे ने बताया एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया है। 


ये हैं आरोप
एक - सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित की।
दो-  सरकार की जानकारी के बगैर मरीजों की जान आफत में डाली।
तीन- ट्रायल से एमबीबीएस और एमडी/एमएस के छात्रों की पढ़ाई बाधित।
चार- बगैर जानकारी के अवैधानिक तरीके से विदेश यात्राएं की।
पांच - सरकारी खजाने में रुपए न डालकर खुद ने विभिन्न बैंकों में खाते खुलवाए।


लोकायुक्त में एक ओर शिकायत की तैयारी
शुक्रवार को लोकायुक्त में भेजी गई शिकायत के बाद अब दूसरी शिकायत की तैयारी है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति ने बताया डॉक्टरों के नाम से आईसीआईसीआई, एडीएफसी, आईडीबीआई, एचएसबीसी, सिटी बैंक के साथ ही कुछ सहकारी बैंकों में भी खाते हैं। इनकी जांच करने से पूरे लेन-देन की जानकारी मिल सकती है। ये डॉक्टर वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए रुपए भारत मंगवाते हैं। पहली शिकायत में करीब तीन दर्जन डॉक्टरों और अन्य को आरोपी बताया है


सीटीए की भी हो जांच
उधर, विधानसभा में मामला उठाने वाले विधायकों का कहना है 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को वे समझौते भी जगजाहिर करना चाहिए जिनका नाम क्लिनिकल ट्रायल्स एग्रीमेंट (सीटीए) होता है। इससे ही रुपए की असली जानकारी सामने आएगी।


पैसे के लिए बेच रहे देश : हजारे
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने इंदौर प्रवास के दौरान 'पत्रिकाÓ से चर्चा में कहा विदेशी कंपनियों के लिए जो लोग ड्रग ट्रायल कर रहे हैं, वे पैसे के लिए देश को बेच रहे हैं। उनसे देश को बचाना चाहिए। वे कंपनियों के मुनाफे के लिए ही इस काम में लगे हैं। शोध जैसी कोई बात इसमें नहीं है।

News in Patrika on 26th July 2010

लोकायुक्त भी पहुंची शिकायत

मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के साथ ही एथिकल कमेटी व सीटीआरआई को भी बनाया आरोपी
ईओडब्ल्यू भोपाल ने भी शुरू कर दी जांच

रोगी को चूहे की तरह प्रयोगशाला मानकर शुरू हुए दवा आजमाईश के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ में अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज फंसते दिख रहे हैं। आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) के बाद लोकायुक्त में भी शिकायत पहुंच चुकी है। इसमें एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े दो दर्जन से अधिक डॉक्टरों के साथ ही उस एथिकल कमेटी के सदस्यों को भी आरोपी बनाया गया है, जिन्होंने ट्रायल को हरी झंडी दी।

शपथपत्र पर की गई लोकायुक्त शिकायत में कहा गया है कि मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव ने एथिकल कमेटी के सदस्यों से साथ सांठगांठ करके मरीजों की जान खतरे में डाली है। इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार के नियमों का ध्यान नहीं रखा गया। विदेशी दवा कंपनियों से आर्थिक लाभ पाने के लिए गंभीर अनियमितताएं की गई। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने लोकायुक्त को यह भी बताया है कि ड्रग ट्रायल के संबंध में सूचना के अधिकार में कई जानकारियां मांगी गई, लेकिन हमेशा से ही इंकार किया जाता रहा। दस्तावेजों के लिए फिलहाल मामला मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष लंबित है। उधर, सूत्रों का कहना है ईओडब्ल्यू भोपाल में स्वास्थ्य सेवा समर्पण संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे द्वारा की गई शिकायत पर जांच शुरू कर दी है।

इन पर लगे आरोप
मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, ड्रग कंट्रोलर मप्र राकेश श्रीवास्तव, क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. आभा अग्रवाल, एथिकल कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव, कमेटी सदस्य कुट्टी मेनन, डॉ. जयंतीलाल भंडारी, रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये, एडवोकेट योगेश मित्तल, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, उपअधीक्षक डॉ. वीएस पाल, चाचा नेहरू अस्पताल अधीक्षक डॉ. शरद थोरा, चेस्ट सेंटर अधीक्षक डॉ. एम. हरगुनानी, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन, मेडिसिन एचओडी डॉ. जीबी रामटेके, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संजय अवासिया, मेडिसिन कंसलटेंट डॉ. अतुल शेंडे, डॉ. सोनल पगारे, पूर्व एचओडी मेडिसिन डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्ररोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, मनोरोग एचओडी डॉ. रामगुलाम राजदान, मनोरोग कंसल्टेंट डॉ. मनीष पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई के साथ ही जूनियर डॉक्टर सचिन सेठी, गौरव मोहन, प्रोमिता चौधरी, दीलिप सिंह, मयंक जैन, आशीष जैन, प्रज्ञा जैन, मीना ढोल, अब्दुल मंसूर एवं वरूण कटारिया।


News in Patrika on 25th July 2010

बगैर अनुमति मरीजों पर थोपी ट्रायल

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज की ड्रग ट्रायल अवैध
- क्लिनिकल ट्रायल एग्रीमेंट पर सात वर्ष से किसी भी डीन ने नहीं किए हस्ताक्षर


एमवाय अस्पताल, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय और चेस्ट सेंटर में जाने वाले गरीब और जरूरतमंद रोगियों (दूधमुंहे बच्चे भी शामिल) पर विदेशी कंपनियों की दवाइयों के ट्रायल बगैर प्रशासनिक अनुमति के थोपे गए। तीनों अस्पताल एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अधीन आते हैं और सात वर्ष से किसी भी डीन ने ट्रायल के समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैंï। क्लिनिकल ट्रायल एग्रीमेंट (सीटीए) नाम के इस समझौते पर स्पांसर कंपनी और ट्रायल करने वाले डॉक्टर के साथ ही संस्थान प्रमुख के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य संचालनालय ने ट्रायल को पारदर्शी बनाने के लिए सीटीए के संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जिस संस्थान में दवा आजमाईश होती है, उसकी जानकारी के लिए थ्रीपार्टी समझौता अनिवार्य है। संस्थान प्रमुख के हस्ताक्षर के बाद ही ट्रायल शुरू की जाना चाहिए। इस लिहाज से एमवायएच, चाचा नेहरू अस्पताल व चेस्ट सेंटर में होने वाले ट्रायल की जानकारी एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन को होना अनिवार्य है, परंतु वर्ष 2003 से अब तक किसी भी डीन ने सीटीए देखा तक नहीं है। फरवरी 2007 से पहले एमवायएच अधीक्षक रहे डॉ. डीके जैन ने जरूर कुछ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद के दोनों अधीक्षकों का कहना है हमने कभी किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए। 

इसलिए तो नहीं छुपाते समझौता
सीटीए में ट्रायल के लिए डॉक्टर को दी जाने वाली राशि के साथ ही यह भी बताया जाता है कि कब कितनी राशि किस एकाउंट नंबर में जाएगी। एक मरीज पर आने वाले खर्च, मरीज की बीमा पॉलिसी की राशि के साथ ही यह भी उल्लेख रहता है कि मरीज की तबीयत बिगडऩे पर उसका उपचार कैसे और कहां किया जाएगा।

उठते सवाल
- जब किसी जिम्मेदार अधिकारी ने अनुमति नहीं दी, तो ट्रायल कैसे किए जा रहे हैं?
- बगैर समझौते के किसी आधार पर गरीब मरीजों की जिंदगियों को खतरे में डाला गया?
- एथिकल कमेटी ने भी कभी समझौते के दस्तावेज देखने की कोशिश क्यों नहीं की?
- ट्रायल पर उठे सवालों के बावजूद अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सीटीए दस्तावेज क्यों नहीं मांगे?



बोले डीन

'मैंने आज तक न तो सीटीए देखा है और न ही साइन किए हैं। ट्रायल करने वाले एथिकल कमेटी के सामने पेश होते हैं और वहीं से अनुमति ले लेते होंगे।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
(कार्यकाल- 29 जनवरी 2007 से 2 जनवरी 2008 तक और 12 फरवरी 2009 से अब तक)


'सीटीए पर हस्ताक्षर आमतौर पर एमवायएच वाले ही करते हैं। मुझे किसी हस्ताक्षर का अंदाज नहीं।Ó
- डॉ. अशोक वाजपेयी, पूर्व प्रभारी डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
(कार्यकाल- 2 जनवरी 2008 से 11 फरवरी 2009 तक)

'ड्रग ट्रायल से जुड़े किसी भी दस्तावेज मैंने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। न तो मैंने ट्रायल किए और न ही इसे बढ़ावा दिया।Ó
- डॉ. वीके सैनी, संचालक चिकित्सा शिक्षा, मप्र
(दिसंबर 2009 से 29 जनवरी 2007 तक कॉलेज डीन रहे)


बोले अधीक्षक
'ट्रायल के पहले सीटीए पर हस्ताक्षर किए जाते हैं, लेकिन एमवायएच मामले में आज तक हस्ताक्षर नहीं किए।Ó
- डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवायएच
(कार्यकाल- जुलाई 2008 से अब तक)


 'सीटीए के किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर की जानकारी मुझे नहीं है। ट्रायल के किसी कागज से मेरा नाता नहीं रहा।Ó
- डॉ. सीवी कुलकर्णी, एचओडी, पैथोलॉजी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
(फरवरी 2007 से जुलाई 2008 तक एमवायएच अधीक्षक)


'मैंने कुछ समझौतों पर साइन किए थे। वैसे करना डीन को थे, लेकिन ट्रायल हमारे यहां होते थे, इसलिए मैंने किए।Ó
- डॉ. डीके जैन, पूर्व अधीक्षक, एमवायएच
(फरवरी 2007 से पूर्व करीब दो वर्ष तक अधीक्षक रहे)




ड्रग ट्रायल पर तैयार नहीं हुआ जवाब
-  रोगियों को प्रयोगशाला बनाने का मामले में बेहद सावधानी बरत रही सरकार


मरीजों को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करने के गोरखधंधे 'ड्रग ट्रायलÓ के बारे में सरकार की पास पहले से कोई जानकारी मौजूद नहीं थी, इसका खुलासा भी अब हो गया है। एक विधायक द्वारा करीब 20 दिन पहले जो प्रश्न विधानसभा में जवाब के लिए लगाया था, उसका जवाब तय तारीख तक तैयार ही नहीं हो सका। सरकार ने विधायक को आश्वस्त किया है कि शीघ्र ही उत्तर पटल पर रख दिया जाएगा।

सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल, रतलाम के पारस सकलेचा और ग्वालियर के प्रद्धुम तोमर ऐसे विधायक हैं जिन्होंने राज्य में पहली बार ड्रग ट्रायल के विषय को उछाला है। तीनों ने ही इंदौर एमजीएम मेडिकल कॉलेज में जारी ड्रग ट्रायल, इसकी अनुमति, इसमें जुड़े डॉक्टर, मरीज, रुपए का लेन-देन, केंद्र-राज्य सरकार की भूमिका जैसे सवाल पूछे हैं। करीब दो सप्ताह से कॉलेज जानकारी जुटा रहा है। शुक्रवार को ग्रेवाल को जवाब मिलना था। उन्होंने जब सदन में इसकी मांग की, तो बताया गया फिलहाल जवाब तैयार नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि इस मामले में सरकार की जानकारी शून्य थी और कई बिंदु ऐसे हैं, जिनके बारे में कोई माकूल जवाब ही नहीं मिल रहा है। इसी के चलते बेहद फूंक-फूंककर कदम उठाए जा रहे हैं। इधर, एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत का कहना है भोपाल से मांगी गई हर जानकारी भेज दी गई है। सभी प्रश्नों के बिंदुवार जवाब दिए गए हैं।
News in Patrika on 24th July 2010

मरीजों को नहीं दिए सहमति पत्र

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के कायदों का जमकर उल्लंघन

पूरे देश में मरीजों को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने अक्टूबर 2006 में जो मापदंड जारी किए थे, उनका इंदौर के डॉक्टरों ने जमकर उल्लंघन किया है। मरीजों को जो जानकारी दी जाना चाहिए, वह दिए बगैर ही दवा और टीकों का प्रयोग शुरू कर दिया गया। इसमें कई रोगियों की जान पर भी बन आई।

आईसीएमआर की 120 पेज की पुस्तक में जो कायदे बनाए हैं, उनकी जानकारी ही कई डॉक्टरों को नहीं है। ट्रायल करने वाले एक डॉक्टर ने बताया हमें तो बस हेलेंस्की घोषणा और स्पांसर कंपनी द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हैं। एक अन्य का कहना है ट्रायल एक बार क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया में रजिस्टर्ड होने के बाद कोई कुछ पूछता ही नहीं है, इसलिए गाइडलाइन पढऩे की आवश्यकता नहीं है। ताज्जुब की बात तो यह है कि इस गाइडलाइन के बारे में अब तक एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्तव को भी जानकारी नहीं थी। उन्होंने बताया मामला उठा है तो गाइडलाइन निकलवाकर अध्ययन कर रहा हूं। अब इसके आधार पर तुलना की जाएगी।


जो किया जाना था, परंतु किया नहीं

- सहमति पत्र की एक कॉपी मरीज को देना।
- मरीज का बीमा करके पॉलिसी उसे देना।
- दवा के साइड इफेक्ट का पूरा खुलासा करना।
- मरीज के अनपढ़ होने पर दो शिक्षित गवाहों के हस्ताक्षर।
- थर्ड पार्टी एग्रीमेंट की गारंटी अर्थात ट्रायल एमवायएच में होने की स्थिति में अधीक्षक का पत्र
- जिस बात पर मरीज सवाल पूछे, उसे सहमति पत्र में अंडर लाइन करने लिखना।
- कोई लिखित सहमित न दे, तो ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करना।
- मानसिक रोगियों के परिजन से कानूनी अनुमति के बगैर जांच नहीं करना। 



प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
आईसीएमआर ने स्पष्ट किया है कि मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की डिक्लेरेशन को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार कर दिया है।





ट्रायल इंदौर में, ईसी पूणे में
- ड्रग ट्रायल के गोखधंधे में निमयों को रखा ताक पर 



विदेशी कंपनी द्वारा मरीजों पर दवा आजमाइश के खेल ड्रग ट्रायल में भारत सरकार के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है। डॉक्टरों ने निजी कंपनियों से रुपए लेने की जल्दबाजी में यह भी नहीं देखा कि उन्हें जांचने वाली एथिकल कमेटी कहां की है। ट्रायल के ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें डॉक्टर इंदौर के हैं और कमेटी पूणे, बैंग्लूर, चैन्नई की। कमेटी के सामने हाजिर की जरूरत इन डॉक्टरों ने नहीं समझी।

मानसिक रोगियों पर किए गए ट्रायल में ऐसा ही किया गया। एमवायएच के उप अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ने पूणे में कंपनी द्वारा गठित की गई एथिकल कमेटी से अनुमति ली। इसके लिए वे कभी पूणे गए भी नहीं। यही हाल एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव का भी रहा। उन्होंने ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर पर दमा रोगियों पर जो ट्रायल की हैं, उनके लिए इंदौर के बाहर की एथिकल कमेटी से अनुमति ली।

कॉलेज के कर्मचारी भी चपेट में
मेडिकल कॉलेज के कुछ कर्मचारियों पर डॉक्टरों द्वारा ट्रायल करने की जानकारी मिली है। कॉलेज के एकाउंट सेक्शन में कार्यरत एक व्यक्ति पर चेस्ट सेंटर में ट्रायल की गई। वह दमे का रोगी है।




विधानसभा बहस के लिए ध्यानाकर्षण

 ड्रग ट्रायल पर बहस के लिए दो विधायकों ने गुरुवार को विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी से मुलाकात की है। विधायकों का कहना है कि इस मुद्दे पर अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए क्योंकि यह हर प्रदेशवासी से जुड़ा मुद्दा है। इंदौर एक के विधायक सुदर्शन गुप्ता ने बताया रतलाम के विधायक पारस सकलेचा के साथ मैंने इस मसले पर चर्चा करवाने की आग्रह किया है। विधानसभा अध्यक्ष सैद्धांतिक तौर पर इसके लिए राजी भी हो गए हैं।

विशेषाधिकार हनन की तैयारी
ड्रग ट्रायल में लिप्त कुछ डॉक्टर सरकार को झूठी जानकारी देकर या किसी प्रकार के लेख छपवाकर विधानसभा एवं नागरिकों को भ्रमित करने की कोशिश में लगे हैं। एक जागरूक विधायक ने 'पत्रिकाÓ को बताया जब कोई प्रश्न किसी सदस्य ने पूछा है तो उस पर सदन के पटल पर चर्चा होने तक किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डाला जा सकता है। विषय से जुड़ा कोई व्यक्ति ऐसा करता है तब तो यह सीधे-सीधे विशेषाधिकार हनन का मामला है। ड्रग ट्रायल में भी ऐसी कोशिशें हो रही हैं, जिन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।



News in Patrika on 23th July 2010

इलाज के नाम पर करोड़ों का घालमेल

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: ईओडब्ल्यू पहुंचा मामला


ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा अब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) पहुंच गया है। डॉक्टरों से ही जुड़े एक संगठन ने शिकायत की है कि गरीब मरीजों को निशाना बनाकर एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर से जुड़े अस्पतालों में ऐसी दवाइयों का आजमाइश हो रही है, जो बाजार में उतरी ही नहीं है। राज्य सरकार की जानकारी के बगैर इलाज के नाम पर डॉक्टरों ने करोड़ों का घालमेल किया है। इसकी विस्तृत जांच करके भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और ड्रग एंड कास्मेटिक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाए।

 स्वास्थ्य समर्पण सेवा संगठन द्वारा भोपाल स्थित ईओडब्ल्यू मुख्यालय में शिकायत की गई है। संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे ने बताया ट्रायल के नाम पर काला धन राज्य में आ रहा है। ट्रायल करने वाले डॉक्टरों और उनके परिजन के बैंक खातों की जांच की जाए, तो हकीकत उजागर हो सकती है। चूंकि राज्य में ईओडब्ल्यू ही आर्थिक अपराध से जुड़े मामले सुलझाता है, इसलिए शिकायत की।

जीने का अधिकार संकट में
 स्वदेशी जागरण मंच ने शुरू किया विरोध


ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच ने बुधवार को विरोध शुरू कर दिया। मंच ने ट्रायल को जीवन जीने के अधिकार की राह में अड़चन बताया है। इस कार्य में लिप्त डॉक्टरों के विरूद्ध एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में संगठन चरणबद्ध आंदोलन करेगा।

मंच के कार्यकर्ताओं ने अपर आयुक्त गौतमसिंह को राष्टï्रपति एवं राज्यपाल के नाम पांच बिंदुओं का ज्ञापन सौंपा। महानगर संयोजक सुरेश बिजौलिया, विभाग संयोजक बलराम वर्मा एवं महानगर सहसंयोजक मनोज लोढ़े ने बताया मेडिकल हब की शक्ल लेते इंदौर में कुछ डॉक्टर मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। विदेशी कंपनियों की आड़ में मरीज पर जानलेवा प्रयोग किए जा रहे हैं। बारिकी से पूरे मामले की जांच की जाए तो सारा मामला सामने आ सकता है। केंद्र सरकार को चाहिए क्विंटल्स व बायोटेक नाम की स्पांसर कंपनियों को तत्काल प्रतिबंधित करे और राज्य सरकार को चाहिए कि वह तत्काल एक नियामक आयोग गठन करे जो मामले की पड़ताल कर सके। 


अब खंगाल रहे गाइडलाइन
- मरीजों पर प्रयोग करने से पहले तो नहीं दिया ध्यान
- पलट रहे आईसीएमआर, एम्स के नियमों की किताबें



पांच वर्षों से अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाइश (ड्रग ट्रायल) करने वाले डॉक्टर अब उस नैतिक गाइडलाइन की तलाश में है, जो उनका बचाव कर सके। इसके लिए वे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की उन किताबों के पन्ने पलट रहे हैं जिसमें ड्रग ट्रायल के कायदे तय किए गए हैं।

'पत्रिकाÓ द्वारा ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे का खुलासा करने और सरदारपुर, रतलाम व ग्वालियर के विधायकों द्वारा विधानसभा में मामला उठाने के बाद डॉक्टरों को नियमों की याद आई है। अब तक वे क्विंटल्स और बायोटेक जैसी स्पांसर कंपनियों द्वारा तय दिशा में काम करते थे। उन्होंने कभी आईसीएमआर के उन नियमों की परवाह नहीं की जो मनुष्य को प्रयोगशाला बनाने से बचाते हैं।

दो धारी तलवार!
आईसीएमआर के मापदंड दो धारी तलवार की तरह हैं। ट्रायल करने वाले डॉक्टर इसमें अपने बचाव की बातें ढूंढ रहे हैं, जबकि चिकित्सा शिक्षा विभाग डॉक्टरों को कटघरे में खड़े करने के तथ्य।


News in Patrika on 22th July 2010

एमवायएच उपअधीक्षक भी ट्रायल में लिप्त

जानकारी छुपाने वालों में डॉ. वीएस पाल शामिल
मनोरोगियों पर आजमाई रामेलटियोन दवा


एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव के बाद उपअधीक्षक डॉ. वीएस पाल द्वारा भी ड्रग ट्रायल की जानकारी छुपाने की बात सामने आई है। उन्होंने सरकार को ट्रायल नहीं करने की जानकारी दी है, जबकि क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) रिकॉर्ड के मुताबिक 2009 में उन्होंने मनोरोगियों पर ट्रायल किया है। उन्होंने खुद को एमजीएम मेडिकल कॉलेज का प्रोफेसर बताकर ट्रायल अलंकार पाइंट गीता भवन चौराहा स्थित प्रायवेट क्लिनिक पर की।

सीटीआरआई की 29 जून 2010 को अपडेट की गई जानकारी बताती है 9 दिसंबर 2009 को गुरगांव के प्रो. कंचन त्यागी के अधीन देश के 16 डॉक्टरों ने रेनबैक्सी कंपनी के लिए रामेलटियोन दवा का ट्रायल शुरू किया। इसमें डॉ. पाल के साथ ही मनोरोग कंसलटेंट डॉ. अभय पालीवाल भी उनके साथ रहे। डॉ. पाल ने ट्रायल के लिए पूणे स्थित एथिकल कमेटी से ट्रायल की अनुमति ली थी। 

इन्होंने भी छुपाई जानकारी
नेत्ररोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, ïमनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. रामगुलाम राजदान, कंसलटेंट डॉ. मनीष पालीवाल, कंसलटेंट डॉ. उज्जवल सरदेसाई और मेडिसीन के डॉ. अतुल शेंडे ने जानकारी छुपाई है।


'बहुत पुराना मामला हैÓ

क्या आपने किसी दवा का ट्रायल किया है ?
- नहीं तो।
सीटीआरआई रिकॉर्ड बताता है आपने रामेलटियोन दवा इस्तेमाल की?
- पुरानी बात होगी, क्योंकि यह दवा तो अब बाजार में आ चुकी है।
आपने किस एथिकल कमेटी से इजाजत ली थी?
- वह बाहर की थी, लेकिन मैंने ट्रायल नहीं किया है।
सरकारी रिकॉर्ड में तो आपका नाम है?
वह हो सकता है। कई बार चर्चा चलती है, लेकिन काम शुरू नहीं हो पाता।
(डॉ. वीएस पाल से चर्चा) 



मेडिकल कॉलेज डीन की भोपाल से खिंचाई
- ड्रग ट्रायल के गोरखधंधों मामले में सरकार ने लताड़ा


विदेशी दवा कंपनियों से मोटी रकम कमाने के लिए अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाइश (ड्रग ट्रायल) करने वाले डॉक्टरों के कारण बदनाम हुए एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन को सरकार ने जमकर लताड़ लगाई है। सरकाार ने उनसे ड्रग ट्रायल से जुड़े सभी मुद्दों पर विस्तृत जवाब मांगा है। यह भी पूछा है कि उनकी नाक के नीचे ट्रायल का धंधा चलता रहा, फिर भी उन्हें इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली?

'पत्रिकाÓ द्वारा ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे के खुलासे से मामले में सरकार की अज्ञानता जाहिर हुई है। कॉलेज से जुड़े एमवायएच, चाचा नेहरू अस्पताल और चेस्ट सेंटर में मरीजों पर दवा आजमाइश होती है। इसकी सरकार को कानों-कान खबर नहीं है। सूत्रों के मुताबिक डीन डॉ. एमके सारस्तव से सरकार बेहद नाराज हैं, क्योंकि उनकी जानकारी के बगैर कई डॉक्टर ट्रायल कर रहे हैं। इससे मरीजों के साथ ही कॉलेज की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। सूत्रों का कहना है कि चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव आईएस दाणी पूरे घटनाक्रम से बेहद खफा हैं।

एथिकल कमेटी भंग करने की तैयारी
सूत्रों का कहना है एमजीएम मेडिकल कॉलेज की एथिकल कमेटी को भंग करने की तैयारी है। इस कमेटी के सहयोग के कारण ही डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के धंधे का विस्तार किया है।

वह बाबूगिरी तो यह क्या?
एथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी ने कॉलेज काउंसिल की एक बैठक में कहा था मैं किसी कमेटी में नहीं रहूंगा क्योंकि मैं बाबूगिरी नहीं करना चाहता। यही वजह है कि उन्हें किसी कमेटी में नहीं रखा जाता है। वे कोई जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहते हैं। ड्रग ट्रायल के खुलासे के बाद कॉलेज एक प्रोफेसर ने बताया उन्हें जब बाबूगिरी पसंद नहीं है, तो एथिकल कमेटी की सदस्यता छोड़ क्यों नहीं देते। 

फिर आया ड्रग ट्रायल का सवाल
विधानसभा में इस बार मानो ड्रग ट्रायल से जुड़े सवालों की बरसात हो रही है। मंगलवार को फिर से एक सवाल कॉलेज पहुंचा। इसमें भी कमोबेश वही जानकारी मांगी गई जो पूर्व में मांगी जा चुकी है। पांच वर्षाें में हुई ट्रायल, लिप्त डॉक्टर, सरकार की अनुमति , विदेश यात्रा के साथ ही रुपए का हिसाब भी इसमें पूछा गया है। इसका जवाब तैयार करने के लिए शाम सात बजे तक मशक्कत जारी रही। 


इंदौर का मुद्दा उठाएंगे बाहरी विधायक
- ड्रग ट्रायल में हमारे जनप्रतिनिधियों की बड़ी चूक
- रतलाम, सरदारपुर व ग्वालियर के विधायकों ने खोला मोर्चा



इंदौर के लिए इंदौर के जनप्रतिनिधि कितने सजग और जागरूक है, इसकी कलाई ड्रग ट्रायल के मौजूदा मुद्दे से खुल रही है। जिले में नौ विधायक हैं और इन्हें इस बात से कोई सरोकार ही नहीं कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवायएच में आने वाले मरीजों की सेहत के साथ डॉक्टर खिलवाड़ कर रहे हैं। कैलाश विजयवर्गीय व महेंद्र हार्डिया को मंत्री होने के नाते छोड़ भी दिया जाए तो शेष सात विधायक इस मसले पर क्या कर रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।

हालांकि, इंदौर को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। प्रदेश के तीन दूसरे विधायक इंदौर की चिंता कर रहे हैं। रतलाम के पारस सकलेचा, सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल और ग्वालियर के प्रद्धुम्नसिंह तोमर ऐसे विधायक हैं, जिन्हें राज्यभर के मरीजों की फिक्र है। सकलेचा भाजपा से ही हैं, जबकि ग्रेवाल व तोमर कांग्रेस से। तीनों ने ही ड्रग ट्रायल से जुड़े मुद्दे को विधानसभा में प्रश्न के जरिए उठा दिया है।

मंत्री को जानकारी ही नहीं
इंदौर पांच के विधायक महेंद्र हार्डिया स्वास्थ्य राज्य मंत्री हैं और उन्हें यह पता ही नहीं है कि ड्रग ट्रायल क्या होता है। उन्होंने हाल ही में कहा है कि इसकी जानकारी मैं उन्हीं डॉक्टरों से लूंगा, जो ट्रायल कर रहे हैं।

इंदौर के विधायक
सुदर्शन गुप्ता, रमेश मेंदोला, अश्विन जोशी, मालीन गौड़, जीतू जिराती, सत्यनारायण पटेल और तुलसी सिलावट।


 

News in Patrika on 21th July 2010

इनहेलर के ट्रायल से हुआ मोतियाबिंद !

दमे की तकलीफ लेकर 2008 में एमवायएच आया था मरीज
कुछ ही दिन में दूसरी बीमारी ने जकड़ा

एक ऐसा मरीज सामने आया है जिस पर एमवायएच में ड्रग ट्रायल (ऐसी दवा से उपचार जो बाजार में नहीं मिलती) हुआ। मरीज दमे का रोगी था और उपचार के दौरान उस पर डॉक्टरों ने इनहेलर का प्रयोग किया। इसकी वजह से उसे मोतियाबिंद हो गया। मोतियाबिंद का उपचार भी एमवायएच के नेत्ररोग विभाग में ही हुआ।

मरीज को नुकसान होने की आशंका के चलते उसका नाम पता प्रकाशित नहीं किया जा रहा है। दस्तावेज बताते हैं कि दमा की शिकायत पर 2008 में जब मरीज एमवाय अस्पताल पहुंचा तो मेडिसीन विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक वाजपेयी ने उसे फार्मेटेरोल और मोमेटासोन दवा से बना इनहेलर दिया। साथ ही कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाए। इनहेलर के प्रयोग के साथ ही उसे नेत्र रोग विभाग भी भेजा गया, जहां उसकी आंखों की जांच नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. पुष्पा वर्मा ने की। उपचार शुरू होने के बाद उसे चेस्ट सेंटर शिफ्ट कर दिया गया। बाद में जब भी वह अस्पताल आता, जूनियर डॉक्टर मोटर साइकिल पर बैठाकर उसे एमवायएच से चेस्ट सेंटर ले जाया जाते। कुछ दिन बाद मरीज को मोतियाबिंद हो गया। कारण पूछा तो बताया गया उम्र बढऩे से ऐसा हो जाता है।

डॉक्टरों को मिले 27.54 लाख
सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि इनहेलर के इस ट्रायल के बदले प्लो रिसर्च इंस्टीट्यूट ने डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया के खाते में 27.54 लाख रुपए जमा कराए। इसका कुछ हिस्सा दूसरे डॉक्टरों को भी मिला। ट्रायल करीब दो दर्जन मरीजों पर किया गया। वर्ष 07-08 में 1.70 लाख, 08-09 में 11.08 लाख और 09-10 में 11.76 लाख का भुगतान डॉक्टरों को हुआ।


हां, साइड इफेक्ट होते थे
'डॉ. अशोक वाजपेयी के मार्गदर्शन में इनेहलर का ट्रायल किया था। इनहेलर से आंख संबंधी साइड इफेक्ट होते थे, इसीलिए मरीजों को नेत्र रोग विभाग भेजा जाता था। वहां की एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा ट्रायल में साथ थीं और मरीजों को जांचती थी। मरीज का नाम जाने बगैर यह नहीं बता सकता हूं कि मोतियाबिंद हुआ या नहीं।Ó
- डॉ. संजय अवासिया, एसोसिएट प्रोफेसर, मेडिसीन विभाग


डॉ. पुष्पा वर्मा की पोल खुली
डॉ. संजय अवासिया के बयान से नेत्र रोग विभाग की एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा की पोल भी खुल गई है। उन्होंने हाल ही में सरकार को जानकारी भेजी है कि वे किसी ट्रायल में शामिल नहीं रही।

रतलाम के डॉक्टर ने पूछा सवाल
एमवायएच के सूत्र बताते हैं इस ड्रग ट्रायल के संबंध में रतलाम के एक डॉक्टर ने सूचना के अधिकार में जानकारी मांगी, जो उसे नहीं दी गई। डॉक्टर ने इसके लिए चार रिमाइंडर भी भेजे, परंतु बात नहीं बनी। बाद में डॉक्टर ने क्या कार्रवाई की, इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है। 

News in Patrika on 21th July 2010

तय हो नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी

ड्रग ट्रायल को लेकर आगे आए चिकित्सकीय संगठन


शहर में चल रहे ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में लिप्त डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे चुनिंदा डॉक्टरों की वजह से चिकित्सा पेशे से जुड़े वे डॉक्टर भी बदनाम हो रहे हैं, जिनकी ट्रायल में कोई भूमिका नहीं है। एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छापरवाल इसके लिए पूरी तरह से इथिकल कमेटी को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि इथिकल कमेटी को ट्रायल से गुजर रहे प्रत्येक मरीज की जानकारी जुटाई जाना चाहिए। ट्रायल कई कडिय़ों से होकर गुजरता है। सभी कडिय़ां ईमानदारी से काम करें, जिसकी भी भूमिका संदिग्ध हो, उसकी ईमानदारी से जांच कराई जाना चाहिए। मरीजों का कंसेंट फॉर्म सूचनात्मक न होकर जानकारीपरक होना चाहिए, ताकि वह अपने भले-बुरे का निर्धारण कर सके। वहीं आईएमए के अध्यक्ष डॉ. अनिल बंडी का कहना है कि नियमों का पालन नहीं करने वाले डॉक्क्टरों की भूमिका को संदिग्ध माना जा सकता है। वे मानते हैं कि मरीजों को ट्रायल की जानकारी देना नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है। ट्रायल कर रहे डॉक्टर यदि ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह गैरकानूनी है।

ऐसे काम से पेशे की बदनामी

यह बात सौ फीसदी सही है कि कुछ डॉक्टरों के गलत ढंग से ड्रग ट्रायल करने के कारण शहर के अन्य चिकित्सकों की बदनामी हो रही है। निर्धारित मापदंडों और मरीज को विश्वास में लेकर उसे पूरी जानकारी देकर ही ट्रायल किया जाना चाहिए। यह वास्तव में मरीज का अधिकार भी है। 
डॉ. जीएस पटेल, पूर्व अध्यक्ष इंडियन पीडिएट्रिक एसोसिएशन

मरीजों से ट्रायल की बात छिपा रहे हैं, मतलब डॉक्टर कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। जनहित में किए जाने वाले इस काम के पहले मरीजों को ट्रायल के साथ दवा और उसके साइड इफेक्ट, इंश्योरेंस की जानकारी भी दी जाना चाहिए। चुनिंदा डॉक्टरों के कारण होम्योपैथी व अन्य पैथियां भी बदनाम न हो, इसका ट्रायल कर रहे डॉक्टरों को ध्यान रखना चाहिए।
डॉ. एके द्विवेदी, अध्यक्ष, होम्योपैथी एसोसिएशन

ड्रग ट्रायल कर रहे चिकित्सकों को चाहिए कि वे मरीजों को ट्रायल वाली दवाओं से होने वाले नुकसान और फायदे के बारे में भी बताएं। साइड इफेक्ट होने पर मरीजों के कानूनी अधिकारों की भी जानकारी दी जाना चाहिए। चिकित्सकों की भूमिका पूरी तरह पारदर्शी हो।
डॉ. ओपी तिवारी, सदस्य, एमसीआई



News in Patrika on 20th July 2010

500 पेज में समाया ड्रग ट्रायल का हिसाब

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा

एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में पांच वर्ष से जारी ड्रग ट्रायल की पूरी जानकारी 500 से अधिक पन्नों में पूरी हुई। शनिवार को यह जानकारी दो कर्मचारियों के हाथ भोपाल भेजी गई, जिसे विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा।

बरसों से एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ड्रग ट्रायल हो रहा है और सरकार को इसकी रत्तीभर भी जानकारी नहीं थी। इस बार सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल ने ड्रग ट्रायल का सवाल पूछा तो मामले में लिप्त सभी डॉक्टरों के कान खड़े हो गए। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने एक सप्ताह पहले जब इसका जवाब मंत्रालय को भेजा तो वहां से इंकार आ गया कि गोलमाल जवाब नहीं चाहिए, स्पष्ट और पारदर्शी जवाब भेजें।

इसी दौरान 'पत्रिकाÓ ने पूरे मामले का खुलासा किया कि किस तरह से डॉक्टर मरीजों पर चूहा की तरह प्रयोग कर रहे हैं। इसके एवज में विदेशी कंपनियों से उन्हें मोटी रकम भी मिल रही है। इससे सरकार सचेत हुई और मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत को तगड़ी फटकार मिली। एक बार फिर से जानकारी तैयार की गई लेकिन इससे भी भोपाल संतुष्ट नहीं हुआ। आखिर में विस्तृत ब्यौरा भेजा गया है, जिसमें ïट्रायल और इसके हिसाब की जानकारी है।

कई तथ्य छुपाए
सूत्रों का कहना है कि अभी भी कॉलेज ने कई तथ्यों को छुपा लिया है। यह नहीं बताया गया है कि जिन मरीजों प्रयोग किए गए, उनकी वर्तमान हालत क्या है? क्या उन पर दवा प्रयोग से विपरीत प्रभाव पड़ा? क्या मरीजों को ट्रायल के खतरों की जानकारी दी गई? कुछ डॉक्टरों ने यह जानकारी भी छुपा ली है कि वे निजी अस्पतालों में जानकर ट्रायल करते हैं।

 


भोपाल करेगा डॉ. भार्गव की जांच
- इंदौर के प्रबंधन पर नहीं भरोसा

एमवाय अस्पताल अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव द्वारा ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर में खड़ा किया गया करोड़ों का ड्रग ट्रायल के कारोबार की जांच भोपाल के अधिकारी करेंगे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के लचर रवैय्ये को देखते हुए यह फैसला किया गया है।

'पत्रिकाÓ ने खुलासा किया था कि डॉ. भार्गव ने सरकार को अंधेरे में रखकर तीन वर्ष में ड्रग ट्रायल का बड़ा धंधा शुरू कर दिया है। इसके लिए उन्होंने धार कोठी स्थित अपने घर के पास ही ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर खोला है। यहां वे दमा को रोगियों पर पांच अलग-अलग कंपनियों की दवाइयों के प्रयोग करते हैं और इसके एवज में उन्हें मोटी रकम मिलती है। भोपाल पदस्थ सूत्रों के मुताबिक डॉ. भार्गव की जांच के लिए सचिव स्तर के किसी अधिकारी को नियुक्त किया जा सकता है।

डॉ. भार्गव पर आरोप
- पूर्णकालिक अधीक्षक होने के नाते प्रायवेट प्रेक्टिस की अनुमति नहीं फिर भी कर रहे ड्रग ट्रायल।
- खुद लिप्त इसलिए एमवाय अस्पताल को भी खुले आम ट्रायल का केंद्र बनने दिया। 
- सरकार को भेजे संपंत्ति के ब्यौरे में ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर का जिक्र नहीं किया।


अन्य डॉक्टर भी घेरे में
मनोरोग विभाग के डॉ. रामगुलाम राजदान, डॉ. अभय पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई और मेडिसीन के डॉ. अतुल शेंडे ने भी डॉ. भार्गव की तर्ज पर निजी अस्पतालों में जाकर ट्रायल के गोरखधंधे में व्यारे-न्यारे किए हैं। इन्हें भी सरकार शिकंजे में लेगी।


'मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता हूं। वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा के बाद ही कार्रवाई होगी।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

News in Patrika on 19th July 2010

ड्रग ट्रायल का हिसाब-किताब ही नहीं

गरीब मरीज निशाने पर परंतु केंद्र-राज्य में से कोई नहीं कर रहा निगरानी
विदेशाी कंपनियों से तीन वर्ष में पूरे देश में फैलाया देशभर में नेटवर्क 



बरसों से हिंदुस्तानियों पर विदेशी कंपनियां ड्रग ट्रायल के नाम पर 'गुमनामÓ दवाइयों का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन इन कंपनियों से आने वाले धन का न तो केंद्र सरकार के पास और न ही राज्य सरकार के पास कोई हिसाब है। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में भारत में 1500 करोड़ का कारोबार जारी है, जो 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ तक पहुंचेगा। ताज्जुब तो यह है कि देशभर में ट्रायल करने वाले डॉक्टरों की कभी पड़ताल भी नहीं की गई, जबकि ये देश के गरीब और अनपढ़ मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं।

विदेशी कंपनियों ने तीन वर्ष में पूरे देश में नेटवर्क फैलाया है। केंद्र सरकार में उपलब्ध आंकड़े बताते हैं देश में चारों चरणों (फेज वन से फोर) तक के ट्रायल चलते हैं। फेज वन और टू के ट्रायल जानलेवा हैं और इससे मरीज की जान भी जा सकती है। वर्ष 2009 में ही फेज वन की 33 और फेज टू की 53 ट्रायल हुई हैं। सबसे अधिक कारोबार महाराष्टï्र में हो रहा है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश दूसरे-तीसरे स्थान पर हैं। शहरों में बैंग्लूर सबसे आगे है। पूणे और मुंबई इसके बाद आते हैं।

मप्र में इंदौर, राजस्थान में जयपुर गढ़
विदेशी कंपनियों ने मप्र में इंदौर और राजस्थान में जयपुर को गढ़ बनाया है। वर्ष 2006 से 2009 तक इंदौर में क्रमश: तीन, दो, 13 और 38 ट्रायल हुए हैं, जबकि जयपुर में तीन, 11, 36 और 70 ट्रायल हुए हैं।

मौतें भी हुई
ट्रायल जानलेवा होती हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। जन स्वास्थ्य अभियान जैसे कुछ संगठनों ने अपने स्त्रोतों से जो जानकारी जुटाई है, वह बेहद चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक 2007 में 132, 2008 में 229 और 2009 में 308 लोग ट्रायल का शिकार हुए हैं।

सुविधा से बना ली एथिकल कमेटी
ड्रग एंड कॉस्मेटिक अधिनियम के मुताबिक दवा प्रयोग के लिए एथिकल कमेटी से अनुमति लेना अनिवार्य होता है, लेकिन इन कमेटियों पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकारी क्षेत्र में कमेटियों में वे ही लोग सदस्य हैं जो ट्रायल कर रहे हैं, जबकि निजी क्षेत्र में कमेटी के सदस्यों के नाम ही जगजाहिर नहीं किए गए हैं।


कोई जानकारी नहीं

ड्रग ट्रायल के बारे में हमारे विभाग के पास कोई जानकारी नहीं है। न तो हमें ट्रायल की जानकारी है और न ही इससे प्रभावित होने वाले मरीजों की। मामले में कितनी राशि आती-जाती है, इसके बारे में भी कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
- राकेश श्रीवास्तव, ड्रग कंट्रोलर, मध्यप्रदेश

बस रजिस्ट्रेशन करते हैं

ट्रायल के लिए रजिस्ट्रेशन करना हमारा काम होता है। इसके बाद हम निगरानी नहीं करते हैं। ट्रायल के लिए एथिकल कमेटियां सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। कितना रूपया आता है, इसकी हमारे विभाग के पास कोई जानकारी नहीं होती।
- डॉ. आभा अग्रवाल, डिप्टी डायरेक्टर, क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया



News in Patrika on 18th July 2010

बेहद चतुराई से रोगी को बनाते सब्जेक्ट

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: फ्री दवाई का लालच देकर जीतते हैं भरोसा


विदेशी कंपनी की दवा को बाजार में उतारने से पहले उसे रोगियों पर आजमाने की विद्या 'ड्रग ट्रायलÓ का जाल बेहद चतुराई से फैलाया जाता है। रोगी को मुफ्त दवाई के लालच से फांसा जाता है और कहा जाता है कि उसे एक प्रोजेक्ट में हिस्सेदार बनाया जा रहा है। प्रोजेक्ट के कुछ कागजों पर उससे साइन लिए जाते हैं और शुरू हो जाती है ड्रग ट्रायल।

शहर के कुछ प्रबुद्ध डॉक्टरों ने 'पत्रिकाÓ को बताया जब कोई जरूरतमंद मरीज अस्पताल में आता है  तो उसे कहा जाता है कि डब्ल्यूएचओ भारत के गरीब मरीजों की मदद करता है और उसी से जुड़ा एक कार्यक्रम अस्पताल में चल रहा है। इस कार्यक्रम में आपको शामिल होना है, तो कुछ कागज साइन करना होंगे। इससे आपको मुफ्त दवा मिलना शुरू हो जाएगी। साथ ही जांचें भी फ्री होंगी। मरीज को लगता है इससे अच्छा क्या होगा। उसके राजी होते ही ताबड़तोड़ एक फाइल बनाई जाती है और उससे साइन करवा लिए जाते हैं। फाइल में मरीज का नाम खत्म हो जाता है और उसे एक नंबर दे दिया जाता है। यहीं से वह मरीज से 'सब्जेक्टÓ (विषय) बन जाता है और विदेशी दवा कंपनी की अज्ञात दवा से उसका इलाज शुरू होता है। यह ऐसी दवा होती है, जो केवल संबंधित डॉक्टर के पास ही होती है, बाजार में नहीं मिलती है।

चूंकि सब्जेक्ट से डॉक्टर को बेहद मोटी कमाई होती है, इसलिए उसका विशेष ध्यान रखा जाता है। समय समय पर उसे फोन करके अस्पताल बुलाते हैं। जांच करवाते हैं और कभी-कभी फलों का रस भी पिलाते हैं। कई बार इलाज के दौरान मरीज की तबीयत बिगड़ जाती है, तो कहा जाता है यह सामान्य बात है।


बीमा करवाते हैं, लेकिन क्लेम नहीं दिलवाते
ट्रायल के नियमों के मुताबिक रोगी उर्फ सब्जेक्ट का बीमा करवान अनिवार्य है। डॉक्टर इसका पालन करते हैं, लेकिन जब रोगी की तबीयत बिगड़ती है या उसकी मौत हो जाती है, तो उसे क्लेम नहीं दिलवाया जाता है। दरअसल, क्लेम देने की स्थिति में परिजन पूछ सकते हैं दवा के कारण मौत हुई है क्या? यही वजह है कि इससे बचने के लिए यह तरीका अपनाया जाता है। बीच में मौत होने पर डॉक्टर सब्जेक्ट नंबर वही रहने देते हैं और मरीज बदल देते हैं।

निजी बैंकों में आती रकम
ट्रायल से आने वाली राशि आमतौर पर निजी बैंकों के जरिए आती है, ताकि सरकार एकदम से निगरानी न कर सके। इसके लिए ट्रायल करने वाले डॉक्टरों ने पति या पत्नी या बच्चों के नाम से खाते खुलवा रखे हैं। 


बचने के लिए यह करें मरीज
- डॉक्टर से बीमारी और दवा दोनों के बारे में पूरी जानकारी लें।
- किसी कागज पर साइन करवाएं तो उसकी फोटोकॉपी अवश्य लें।
- मुफ्त में ऐसी ही दवाई लें, जो बाजार में भी बिकती हो।
- इलाज के दौरान तबीयत बिगड़े तो किसी दूसरे डॉक्टर से संपर्क करें।
- कोई जोर-जबरदस्ती करे तो ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करें।


हर डॉक्टर नहीं करता ट्रायल
ट्रायल में शहर के चंद डॉक्टर ही शामिल हैं, शेष डॉक्टर सेवा के इस पवित्र पेशे का मान बढ़ा रहे हैं। वरिष्ठ डॉक्टरों की राय है कि ट्रायल करने वालों के कारण पूरी बिरादरी कटघरे में है और इनसे लोगों को सचेत किया जाना जरूरी है।



चीफ जस्टिस तक शिकायत
- ड्रग ट्रायल के विरोध में सक्रिय हुआ डॉक्टरों का संगठन

ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ शनिवार को राष्टï्रपति, राज्यपाल, मप्र के चीफ जस्टिस और मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेज दी गई। डॉक्टरों से जुड़े एक संगठन ने यह पहल की है। संगठन का कहना है कि चंद डॉक्टरों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम हो रही है। डॉक्टरी सेवा का पेशा है और ट्रायल एक धंधा है। इससे मनुष्यों के अधिकारों का हनन हो रहा है।

संगठन का नाम स्वास्थ्य समर्पण सेवा है, जिसके सभी सदस्य मेडिको (डॉक्टर) हैं। संगठन प्रमुख डॉ. आनंदसिंह राजे ने बताया ड्रग ट्रायल के जरिए मरीजों की जान जोखिम में डाली जा रही है। इससे संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन का अधिकार खतरे में है। ट्रायल में कई किस्म की आर्थिक अनियममितताएं भी होती हैं। यही वजह है कि सभी स्थानों पर शिकायत भेजी गई है। इस मामले में राज्य सरकार का रूख बेहद लजर है, जबकि राज्य के लोग खतरे में है।

पत्रिका की खबरों का आधार
संगठन ने शिकायत में पत्रिका की खोजपरक खबरों का जिक्र भी किया है। डॉ. राजे ने बताया अखबार ने इस मुद्दे को छेड़कर समूचे चिकित्साजगत के कान खड़े कर दिए हैं। कई डॉक्टरों को पता ही नहीं था कि इलाज के नाम पर यह गोरखधंधा भी चल रहा है।

News in Patrika on 18th July 2010

एमवायएच अधीक्षक ने खोला ट्रायल अस्पताल

तभी तो नहीं होती दूसरों पर कार्रवाई सरकार को रखा अंधेरे में

एमवायएच में आने वाले गरीब और जरूरतमंद मरीजों को चूहा मानकर विदेशी कंपनियों की दवाइयों का इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए जिम्मेदार डॉक्टर ही इस गोरखधंधे में लिप्त है। अस्पताल अधीक्षक ने ड्रग ट्रायल के लिए अपने घर के पास एक रिसर्च सेंटर खोला और इसमें धड़ल्ले से ट्रायल होती है। इसके लिए उन्होंने न तो सरकार के अनुमति ली है और न ही कमाई का खुलासा किया। 

एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव 76, धार कोठी पर ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर फॉर चेस्ट एंड एलर्जी डिसीसेज नाम का सेंटर खोला है। क्लीनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (सीटीआरआई) के रिकॉर्ड के मुताबिक डॉ. भार्गव वर्तमान में पांच ड्रग ट्रायल कर रहे हैं। ट्रायल प्रोजेक्ट दो करोड़ से अधिक के होने का अनुमान है।
सरकार को भेजी झूठी जानकारी
डॉ. भार्गव ने राज्य सरकार को बताया है कि उन्होंने 2005 से 08 तक सीओपीडी और डायबिटीक नेफ्रोपेथी से जुड़े ट्रायल में 43 मरीजों पर 4.5 लाख रुपए का कारोबार किया, जबकि सीटीआरआई का रिकॉर्ड उनकी कलाई खोल रहा है।

हां, मेरा ही है ज्ञानपुष्प सेंटर

प्र- ज्ञानपुष्प सेंटर से आपका क्या ताल्लुक है?
उ- वह मेरा ही है और मैं वहां प्रेक्टिस करता हूं।
प्र- आपको तो प्रेक्टिस की अनुमति नहीं है?
उ- मैं नॉन प्रेक्टिसिंग एलाउंस नहीं लेता हूं, इसलिए प्रेक्टिस करता हूं।
प्र- इस पर ड्रग ट्रायल्स होते हैं?
उ- हां, कुछ होता है, लेकिन इसकी जानकारी आपको किसने दी।
प्र- वहां पांच ट्रायल चल रहे हैं और सरकार को जानकारी नहीं दी गई?
उ- सरकार ने बस सरकारी अस्पताल की जानकारी मांगी, जो दे दी है। पांच ट्रायल चल रहे हैं।
प्र- क्या आप अस्पताल में चल रहे ट्रायल को बचा रहे हैं?
उ- नहीं, इस बारे में मैं डीन से बात कर रहा हूं। वे कहेंगे तो कार्रवाई होगी।
(एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव से चर्चा)


दमा रोगियों पर डॉ. भार्गव का दांव
- मार्च 2009 से फैलाया जाल 
एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव दमा के रोगियों पर ट्रायल करते हैं। वैसे तो वे 2005 से ही इस मामले में जुड़े हैं, लेकिन मार्च 2009 से ïवे पूरी तरह इस कारोबार में जुट गए।

डॉ. भार्गव के पांच ट्रायल

एक -
7 मार्च 2009 से सिवीयर अस्थमा रोगियों पर सिप्ला कंपनी के लिए इन्हेलर का ट्रायल। स्वयं प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर। अंडर में देश के दूसरे 14 अस्पतालों में ट्रायल जारी।

दो -
21 अप्रैल 2009 से सिवीयर अस्थमा रोगियों पर यूके की मुंडीफार्मा कंपनी के लिए ट्रायलशुरू किया। इसमें प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. विवेक मल्होत्रा है।

तीन-
2 मई 2009 से सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव्ह पल्मोनरी डिसीस) रोग के लिए विदेशी कंपनी बोहरिंगर इंगेलहिम फार्मास्यूटिकल्स कंपनी की गोली और इन्हेलर का ट्रायल शुरू किया। डॉ. पूजा अग्रवाल उनकी प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर है।

चार -
6 जून 2009 से ब्रोंकियल अस्थमा के लिए केडिला हेल्थकेयर के लिए 10 मिली ग्राम की गोली का प्रयोग शुरू किया। डॉ. रविंद्र मित्तल उनके प्रिंसीपल इन्वेसिटगेटर हैं।

पांच -
14 अप्रैल 2010 से अस्थमा रोगियों के लिए यूके की कंपनी मुंडीफार्मा रिसर्ज के लिए ट्रायल शुरू किया। डॉ. अताली शेख उनकी प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर है।

अपराध पर अपराध
- पूर्णकालिक अधीक्षक होने के नाते प्रायवेट प्रेक्टिस की अनुमति नहीं फिर भी कर रहे ड्रग ट्रायल।
- खुद लिप्त इसलिए एमवाय अस्पताल को भी खुले आम ट्रायल का केंद्र बनने दिया।
- सरकार को भेजे संपंत्ति के ब्यौरे में ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर का जिक्र नहीं किया।

दूसरों को संरक्षण
एमवायएच के कई कमरों में गुपचुप तरीके से ट्रायल का धंधा चल रहा है। 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बावजूद प्रबंधन इन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। माना जा रहा है कि डॉ. भार्गव के संरक्षण में ही यह कारोबार फल-फूल रहा है।



ताबड़तोड़ हुई एथिकल कमेटी की बैठक

- खंगाले नियम कायदे, हिसाब की जानकारी भी मांगी
अप्रमाणिक दवाई गरीब और अनपढ़ मरीजों पर आजमाने के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ को अनुमति देने वाली एमजीएम मेडिकल कॉलेज की एथिकल कमेटी की शुक्रवार दोपहर करीब एक बजे ताबड़तोड़ बैठक हुई। कमेटी के स्वतंत्र सदस्यों ने कॉलेज में चल रहे ट्रायल के बारे में विस्तार से जानकारी मांगी और नियम भी खंगाले। करीब दो घंटे की विस्तृत चर्चा के बाद कमेटी मरीजों को अपने हाल पर छोड़कर रवाना हो गई।
पर्यावरणविद् कुट्टी मेनन, अर्थशास्त्री डॉ. जयंतीलाल भंडारी और एडवोकेट योगेश मित्तल के साथ ही कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव भी बैठक में पहुंचे। गोपनीयता रखने के लिए बैठक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के बजाए एमवायएच के चौथी मंजिल स्थित मेडिसीन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी के कक्ष में हुई। डॉ. भराणी ही कमेटी के सचिव भी हैं। कमेटी ड्रग ट्रायल पर उठ रहे सवालों के जवाब जानना चाहती थी। ट्रायल के नाम पर आने वाली राशि और मरीजों से मुलाकात के प्रश्न भी उठे। कमेटी में आम आदमी शामिल नहीं होने की जिज्ञासा पर ट्रायल कर रहे डॉक्टरों ने समïझाया आम आदमी मतलब नॉन मेडिको (जो डॉक्टर नहीं है) होता है। ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट की अनदेखी करके कमेटी भी संतुष्ट हो गई। कमेटी को यह भी बताया गया कि जिन मरीजों पर प्रयोग होता है, उनमें केवल बीपीएल ही नहीं है, कुछ मध्यमवर्गीय लोगों भी शामिल हैं। विधानसभा के सवालों में उलझे होने का बहाना बनाकर अस्पताल अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव बैठक में नहीं पहुंचे। 
पर्यावरणविद् मेनन ने 'पत्रिकाÓ को बताया वैसे तो पहले भी बैठकें होती रही हैं, लेकिन आज हम लोग मीडिया में उठ रहे सवालों के जवाब तलाशने के लिए एकत्रित हुए थे। इसमें सभी विषयों पर चर्चा हुई है। हम मानते हैं कि इसमें और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है। डॉ. भंडारी ने बताया मैं वैज्ञानिक शोध के पक्ष में हूं और कमेटी में भी यही बात उठी। कुछ बातें कमेटी जानना चाहती थी, जिनके ट्रायल करने वाले सदस्यों ने संतोषजनक जवाब दिए हैं।

आंखों के रोगी भी निशाना
- डॉ. पुष्पा वर्मा के नाम ट्रायल रजिस्टर्ड, काम शुरू नहीं फिर भी हुआ रुपए का आदान प्रदान
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. पुष्पा वर्मा ने राज्य सरकार को जानकारी दी है कि वे ड्रग ट्रायल नहीं करती हैं, लेकिन उनके खाते में ट्रायल के नाम पर रुपए का आदान-प्रदान हुआ है। उधर, भारत सरकार का रिकॉर्ड कहता है कि वे 2005 से एमवायएच में आने वाले नेत्र रोगियों पर ट्रायल कर रही हैं। मई 2010 में भी उन्होंने क्यूंटल्स रिसर्च इंडिया मुबंई से टेक्सास की एल्कोन रिसर्च कंपनी के आईड्राप की ट्रायल हाथ में ली है। इस ड्राप की बूंदे वे कंजेक्टेवाइटिस के रोगियों पर आजमाती हैं। उन्होंने 10 नवंबर 2005 और 7 फरवरी 2006 को कुछ सहमति पत्रों पर मरीजों के हस्ताक्षर भी लिए हैं। उनके द्वारा 8 दिसंबर 2007 का क्वंटेल्स रिसर्च इंडिया कंपनी के सीनियर क्लीनिकल रिसर्च एसोसिएट फ्रांसिस विज को लिखे पत्र में इसका जिक्र है। डॉ. वर्मा को इस काम के लिए कुछ राशि भी प्राप्त हुई है।

रुपया तो ट्रेनिंग का मिला था
प्र. ट्रायल से आप इंकार कर रही हैं, जबकि रिकॉर्ड कुछ ओर कहता है?
उ. मैंने ट्रायल के लिए आवेदन दिया था, लेकिन अनुमति नहीं मिली।
प्र. दवा कंपनी ने आपको राशि भी दी है ?
उ. वे तो ट्रेनिंग कार्यक्रम के लिए मिले थे। प्रोजेक्ट तो आया ही नहीं।
प्र. सीटीआरआई ने 21 मई 2010 से आपको एडनोवायरल कंजक्टेवाइटिस में इन्वेस्टिगेटर बताया है?
उ. वह सही है, लेकिन मैंने अभी तक ट्रायल शुरू नहीं किया है। मेरे पास एक भी मरीज रजिस्टर्ड नहीं है।
(डॉ. पुष्पा वर्मा से चर्चा)
 News in Patrika on 17th July 2010