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शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

ईओडब्ल्यू ने छह डॉक्टरों से मांगा करोड़ों हिसाब

- एआईजी ने इंदौर में शुरू की जांच



बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) मामले में आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने सख्त रवैय्या अपनाते हुए छह डॉक्टरों से पाई-पाई का हिसाब मांगा है। इसके लिए डॉक्टरों को व्यक्तिगत रूप से बुलाया भी गया है। डॉक्टरों और उनके परिजन के बैंक खातों की जानकारियां भी जुटाई जा रही है।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नामक डॉक्टरों के संगठन के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में ट्रायल करने वाले छह डॉक्टरों के खिलाफ ईओडब्ल्यू आईजी के समक्ष भोपाल में शिकायत दर्ज करवाई थी। मामले की पड़ताल की जिम्मेदारी भोपाल पदस्थ डीआईजी प्रियंका मिश्रा को सौंपी गई है। बुधवार को वे इंदौर में ही थीं। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कॉलेज प्रबंधन से छहों डॉक्टरों की संपूर्ण जानकारी मांगी है। ट्रायल करवाने वाली कंपनी से मिलने वाले रूपए से लेकर मरीज के नाम पते तक पूछे गए हैं। शिकायत के मुताबिक छह डॉक्टरों ने सरकारी पद का दुरुपयोग करके मरीजों की जान जोखिम में डाली और अकूत संपत्ति जुटाई है।


छह डॉक्टर और दो करोड़ का हिसाब 

एक-
डॉ. हेमंत जैन, प्रोफेसर, शिशु रोग विभाग
राशि- 56  लाख
अवधि-  2005 से अब तक
मरीज- 1170
रोग - बच्चों में ब्रोंकराइटिस, पोलियो, बीपी, हेपेटाइटिस बी, टीटनेस।

दो-
डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग
राशि- 44 लाख
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज - 237
रोग- कोरोनरी सिंड्रोम, विटामिन से लकवा, सेकंड स्ट्रोक, स्टेबल एंजाइमा, हार्ट अटैक।


तीन-
डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग
राशि- 42 लाख
अवधि- 2007 से अब तक
मरीज - 39
रोग- पार्किंसन्स, सिवीयर डेमेंशिया, अलझाइमर।

चार-
डॉ. अशोक वाजपेयी, पूर्व एचओडी, मेडिसिन (हाल ही में वीआरएस)
राशि- 41.37 लाख
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज - 28
रोग- सीओपीडी, अस्थमा, निमोनिया।
(एसो. प्रोफेसर संजय अवासिया भी भागीदार)


पांच-
डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवायएच
राशि-4.5 लाख
अवधि- 2005 से 08 तक
मरीज - 43
रोग- सीओपीडी, डायबिटीक नेफ्रोपेथी। 


छह -
डॉ. पुष्पा वर्मा, प्रोफेसर, नेत्ररोग विभाग

राशि- अज्ञात
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज- 35 से अधिक
रोग- अज्ञात।



'ड्रग ट्रायल केस की जांच के लिए एक दल इंदौर में है। आर्थिक मामलों से जुड़े सभी पहलूओं की पड़ताल की जा रही है।Ó 
- अजय शर्मा, आईजी, ईओडब्ल्यू

News in Patrika on 13th August 2010 

बुधवार, अगस्त 11, 2010

बताओ, आपके अस्पताल में मानवाधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा?

- ड्रग ट्रायल मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग ने एमवायएच को भेजा नोटिस

बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का रोगियों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) पर राज्य मानवाधिकार आयोग ने सख्त रवैय्या अपना लिया है। आयोग ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल एमवायएच को नोटिस भेजकर पूछा है कि बताएं, ट्रायल के कारण आपके अस्पताल में आ रहे रोगियों के मानवाधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा? जवाब के लिए आयोग ने तीन सप्ताह की समय सीमा तय की है।

आयोग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक आयोग के अध्यक्ष पूर्व जस्टिस डीएम धर्माधिकारी और दो अन्य सदस्यों ने 'पत्रिकाÓ अखबार में प्रकाशित खबरों के आधार पर एमवायएच अधीक्षक को 30 जुलाई को पत्र भेजा है। आयोग की खबरों की कटिंग स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नामक एनजीओ द्वारा उपलब्ध हुई थी। ताज्जुब तो यह है कि एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को यह नोटिस आज तक प्राप्त नहीं हुआ है। वे कहते भी हैं मुझे इस तरह की कोई जानकारी नहीं है।



इन बिंदुओं पर मांगी है जानकारी
ट्रायल से मरीजों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है?
मरीजों की सुरक्षा का ख्याल कैसे रखा जा रहा है?
मरीज के मानवाधिकार की रक्षा के लिए क्या एहतियात बरती जाती है?

भला क्या जवाब देंगे, ट्रायल में लिप्त अधीक्षक
आयोग ने एमवायएच अधीक्षक को नोटिस दिया है, लेकिन अधीक्षक डॉ. भार्गव खुद ही ट्रायल में लिप्त हैं। वे सरकारी नौकरी करके अपने ट्रायल सेंटर 'ज्ञान पुष्पÓ पर ट्रायल करते हैं। वर्तमान में उनके केंद्र पर करीब एक हजार मरीज रजिस्टर्ड हैं, जो ट्रायल से गुजर रहे हैं।

News in Patrika on 10th August 2010

रविवार, जुलाई 25, 2010

ईओडब्ल्यू में जांच शुरू

 आईजी ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना



विदेशी दवा कंपनियों से मिलने वाले रुपए के लिए शुरू हुए ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में शामिल डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने जांच शुरू कर दी है। ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना है। फिलहाल जांच में सात डॉक्टरों के नाम हैं, जो आगे 50 से अधिक तक पहुंच सकते हैं।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति द्वारा ईओडब्ल्यू में शिकायत की गई थी। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया शिकायत को जांच में ले लिया गया है। प्रथम दृष्टया यह बेहद गंभीर मामला दिखता है। आरोपों सच साबित होने पर केस दर्ज किया जाएगा। संभवत: जांच इंदौर ऑफिस भेजी जाएगी।

शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे ने बताया एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया है। 


ये हैं आरोप
एक - सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित की।
दो-  सरकार की जानकारी के बगैर मरीजों की जान आफत में डाली।
तीन- ट्रायल से एमबीबीएस और एमडी/एमएस के छात्रों की पढ़ाई बाधित।
चार- बगैर जानकारी के अवैधानिक तरीके से विदेश यात्राएं की।
पांच - सरकारी खजाने में रुपए न डालकर खुद ने विभिन्न बैंकों में खाते खुलवाए।


लोकायुक्त में एक ओर शिकायत की तैयारी
शुक्रवार को लोकायुक्त में भेजी गई शिकायत के बाद अब दूसरी शिकायत की तैयारी है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति ने बताया डॉक्टरों के नाम से आईसीआईसीआई, एडीएफसी, आईडीबीआई, एचएसबीसी, सिटी बैंक के साथ ही कुछ सहकारी बैंकों में भी खाते हैं। इनकी जांच करने से पूरे लेन-देन की जानकारी मिल सकती है। ये डॉक्टर वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए रुपए भारत मंगवाते हैं। पहली शिकायत में करीब तीन दर्जन डॉक्टरों और अन्य को आरोपी बताया है


सीटीए की भी हो जांच
उधर, विधानसभा में मामला उठाने वाले विधायकों का कहना है 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को वे समझौते भी जगजाहिर करना चाहिए जिनका नाम क्लिनिकल ट्रायल्स एग्रीमेंट (सीटीए) होता है। इससे ही रुपए की असली जानकारी सामने आएगी।


पैसे के लिए बेच रहे देश : हजारे
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने इंदौर प्रवास के दौरान 'पत्रिकाÓ से चर्चा में कहा विदेशी कंपनियों के लिए जो लोग ड्रग ट्रायल कर रहे हैं, वे पैसे के लिए देश को बेच रहे हैं। उनसे देश को बचाना चाहिए। वे कंपनियों के मुनाफे के लिए ही इस काम में लगे हैं। शोध जैसी कोई बात इसमें नहीं है।

News in Patrika on 26th July 2010

लोकायुक्त भी पहुंची शिकायत

मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के साथ ही एथिकल कमेटी व सीटीआरआई को भी बनाया आरोपी
ईओडब्ल्यू भोपाल ने भी शुरू कर दी जांच

रोगी को चूहे की तरह प्रयोगशाला मानकर शुरू हुए दवा आजमाईश के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ में अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज फंसते दिख रहे हैं। आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) के बाद लोकायुक्त में भी शिकायत पहुंच चुकी है। इसमें एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े दो दर्जन से अधिक डॉक्टरों के साथ ही उस एथिकल कमेटी के सदस्यों को भी आरोपी बनाया गया है, जिन्होंने ट्रायल को हरी झंडी दी।

शपथपत्र पर की गई लोकायुक्त शिकायत में कहा गया है कि मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव ने एथिकल कमेटी के सदस्यों से साथ सांठगांठ करके मरीजों की जान खतरे में डाली है। इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार के नियमों का ध्यान नहीं रखा गया। विदेशी दवा कंपनियों से आर्थिक लाभ पाने के लिए गंभीर अनियमितताएं की गई। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने लोकायुक्त को यह भी बताया है कि ड्रग ट्रायल के संबंध में सूचना के अधिकार में कई जानकारियां मांगी गई, लेकिन हमेशा से ही इंकार किया जाता रहा। दस्तावेजों के लिए फिलहाल मामला मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष लंबित है। उधर, सूत्रों का कहना है ईओडब्ल्यू भोपाल में स्वास्थ्य सेवा समर्पण संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे द्वारा की गई शिकायत पर जांच शुरू कर दी है।

इन पर लगे आरोप
मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, ड्रग कंट्रोलर मप्र राकेश श्रीवास्तव, क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. आभा अग्रवाल, एथिकल कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव, कमेटी सदस्य कुट्टी मेनन, डॉ. जयंतीलाल भंडारी, रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये, एडवोकेट योगेश मित्तल, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, उपअधीक्षक डॉ. वीएस पाल, चाचा नेहरू अस्पताल अधीक्षक डॉ. शरद थोरा, चेस्ट सेंटर अधीक्षक डॉ. एम. हरगुनानी, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन, मेडिसिन एचओडी डॉ. जीबी रामटेके, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संजय अवासिया, मेडिसिन कंसलटेंट डॉ. अतुल शेंडे, डॉ. सोनल पगारे, पूर्व एचओडी मेडिसिन डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्ररोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, मनोरोग एचओडी डॉ. रामगुलाम राजदान, मनोरोग कंसल्टेंट डॉ. मनीष पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई के साथ ही जूनियर डॉक्टर सचिन सेठी, गौरव मोहन, प्रोमिता चौधरी, दीलिप सिंह, मयंक जैन, आशीष जैन, प्रज्ञा जैन, मीना ढोल, अब्दुल मंसूर एवं वरूण कटारिया।


News in Patrika on 25th July 2010

बगैर अनुमति मरीजों पर थोपी ट्रायल

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज की ड्रग ट्रायल अवैध
- क्लिनिकल ट्रायल एग्रीमेंट पर सात वर्ष से किसी भी डीन ने नहीं किए हस्ताक्षर


एमवाय अस्पताल, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय और चेस्ट सेंटर में जाने वाले गरीब और जरूरतमंद रोगियों (दूधमुंहे बच्चे भी शामिल) पर विदेशी कंपनियों की दवाइयों के ट्रायल बगैर प्रशासनिक अनुमति के थोपे गए। तीनों अस्पताल एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अधीन आते हैं और सात वर्ष से किसी भी डीन ने ट्रायल के समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैंï। क्लिनिकल ट्रायल एग्रीमेंट (सीटीए) नाम के इस समझौते पर स्पांसर कंपनी और ट्रायल करने वाले डॉक्टर के साथ ही संस्थान प्रमुख के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य संचालनालय ने ट्रायल को पारदर्शी बनाने के लिए सीटीए के संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जिस संस्थान में दवा आजमाईश होती है, उसकी जानकारी के लिए थ्रीपार्टी समझौता अनिवार्य है। संस्थान प्रमुख के हस्ताक्षर के बाद ही ट्रायल शुरू की जाना चाहिए। इस लिहाज से एमवायएच, चाचा नेहरू अस्पताल व चेस्ट सेंटर में होने वाले ट्रायल की जानकारी एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन को होना अनिवार्य है, परंतु वर्ष 2003 से अब तक किसी भी डीन ने सीटीए देखा तक नहीं है। फरवरी 2007 से पहले एमवायएच अधीक्षक रहे डॉ. डीके जैन ने जरूर कुछ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद के दोनों अधीक्षकों का कहना है हमने कभी किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए। 

इसलिए तो नहीं छुपाते समझौता
सीटीए में ट्रायल के लिए डॉक्टर को दी जाने वाली राशि के साथ ही यह भी बताया जाता है कि कब कितनी राशि किस एकाउंट नंबर में जाएगी। एक मरीज पर आने वाले खर्च, मरीज की बीमा पॉलिसी की राशि के साथ ही यह भी उल्लेख रहता है कि मरीज की तबीयत बिगडऩे पर उसका उपचार कैसे और कहां किया जाएगा।

उठते सवाल
- जब किसी जिम्मेदार अधिकारी ने अनुमति नहीं दी, तो ट्रायल कैसे किए जा रहे हैं?
- बगैर समझौते के किसी आधार पर गरीब मरीजों की जिंदगियों को खतरे में डाला गया?
- एथिकल कमेटी ने भी कभी समझौते के दस्तावेज देखने की कोशिश क्यों नहीं की?
- ट्रायल पर उठे सवालों के बावजूद अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग ने सीटीए दस्तावेज क्यों नहीं मांगे?



बोले डीन

'मैंने आज तक न तो सीटीए देखा है और न ही साइन किए हैं। ट्रायल करने वाले एथिकल कमेटी के सामने पेश होते हैं और वहीं से अनुमति ले लेते होंगे।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
(कार्यकाल- 29 जनवरी 2007 से 2 जनवरी 2008 तक और 12 फरवरी 2009 से अब तक)


'सीटीए पर हस्ताक्षर आमतौर पर एमवायएच वाले ही करते हैं। मुझे किसी हस्ताक्षर का अंदाज नहीं।Ó
- डॉ. अशोक वाजपेयी, पूर्व प्रभारी डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
(कार्यकाल- 2 जनवरी 2008 से 11 फरवरी 2009 तक)

'ड्रग ट्रायल से जुड़े किसी भी दस्तावेज मैंने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। न तो मैंने ट्रायल किए और न ही इसे बढ़ावा दिया।Ó
- डॉ. वीके सैनी, संचालक चिकित्सा शिक्षा, मप्र
(दिसंबर 2009 से 29 जनवरी 2007 तक कॉलेज डीन रहे)


बोले अधीक्षक
'ट्रायल के पहले सीटीए पर हस्ताक्षर किए जाते हैं, लेकिन एमवायएच मामले में आज तक हस्ताक्षर नहीं किए।Ó
- डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवायएच
(कार्यकाल- जुलाई 2008 से अब तक)


 'सीटीए के किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर की जानकारी मुझे नहीं है। ट्रायल के किसी कागज से मेरा नाता नहीं रहा।Ó
- डॉ. सीवी कुलकर्णी, एचओडी, पैथोलॉजी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
(फरवरी 2007 से जुलाई 2008 तक एमवायएच अधीक्षक)


'मैंने कुछ समझौतों पर साइन किए थे। वैसे करना डीन को थे, लेकिन ट्रायल हमारे यहां होते थे, इसलिए मैंने किए।Ó
- डॉ. डीके जैन, पूर्व अधीक्षक, एमवायएच
(फरवरी 2007 से पूर्व करीब दो वर्ष तक अधीक्षक रहे)




ड्रग ट्रायल पर तैयार नहीं हुआ जवाब
-  रोगियों को प्रयोगशाला बनाने का मामले में बेहद सावधानी बरत रही सरकार


मरीजों को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करने के गोरखधंधे 'ड्रग ट्रायलÓ के बारे में सरकार की पास पहले से कोई जानकारी मौजूद नहीं थी, इसका खुलासा भी अब हो गया है। एक विधायक द्वारा करीब 20 दिन पहले जो प्रश्न विधानसभा में जवाब के लिए लगाया था, उसका जवाब तय तारीख तक तैयार ही नहीं हो सका। सरकार ने विधायक को आश्वस्त किया है कि शीघ्र ही उत्तर पटल पर रख दिया जाएगा।

सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल, रतलाम के पारस सकलेचा और ग्वालियर के प्रद्धुम तोमर ऐसे विधायक हैं जिन्होंने राज्य में पहली बार ड्रग ट्रायल के विषय को उछाला है। तीनों ने ही इंदौर एमजीएम मेडिकल कॉलेज में जारी ड्रग ट्रायल, इसकी अनुमति, इसमें जुड़े डॉक्टर, मरीज, रुपए का लेन-देन, केंद्र-राज्य सरकार की भूमिका जैसे सवाल पूछे हैं। करीब दो सप्ताह से कॉलेज जानकारी जुटा रहा है। शुक्रवार को ग्रेवाल को जवाब मिलना था। उन्होंने जब सदन में इसकी मांग की, तो बताया गया फिलहाल जवाब तैयार नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि इस मामले में सरकार की जानकारी शून्य थी और कई बिंदु ऐसे हैं, जिनके बारे में कोई माकूल जवाब ही नहीं मिल रहा है। इसी के चलते बेहद फूंक-फूंककर कदम उठाए जा रहे हैं। इधर, एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत का कहना है भोपाल से मांगी गई हर जानकारी भेज दी गई है। सभी प्रश्नों के बिंदुवार जवाब दिए गए हैं।
News in Patrika on 24th July 2010

मरीजों को नहीं दिए सहमति पत्र

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के कायदों का जमकर उल्लंघन

पूरे देश में मरीजों को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने अक्टूबर 2006 में जो मापदंड जारी किए थे, उनका इंदौर के डॉक्टरों ने जमकर उल्लंघन किया है। मरीजों को जो जानकारी दी जाना चाहिए, वह दिए बगैर ही दवा और टीकों का प्रयोग शुरू कर दिया गया। इसमें कई रोगियों की जान पर भी बन आई।

आईसीएमआर की 120 पेज की पुस्तक में जो कायदे बनाए हैं, उनकी जानकारी ही कई डॉक्टरों को नहीं है। ट्रायल करने वाले एक डॉक्टर ने बताया हमें तो बस हेलेंस्की घोषणा और स्पांसर कंपनी द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हैं। एक अन्य का कहना है ट्रायल एक बार क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया में रजिस्टर्ड होने के बाद कोई कुछ पूछता ही नहीं है, इसलिए गाइडलाइन पढऩे की आवश्यकता नहीं है। ताज्जुब की बात तो यह है कि इस गाइडलाइन के बारे में अब तक एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्तव को भी जानकारी नहीं थी। उन्होंने बताया मामला उठा है तो गाइडलाइन निकलवाकर अध्ययन कर रहा हूं। अब इसके आधार पर तुलना की जाएगी।


जो किया जाना था, परंतु किया नहीं

- सहमति पत्र की एक कॉपी मरीज को देना।
- मरीज का बीमा करके पॉलिसी उसे देना।
- दवा के साइड इफेक्ट का पूरा खुलासा करना।
- मरीज के अनपढ़ होने पर दो शिक्षित गवाहों के हस्ताक्षर।
- थर्ड पार्टी एग्रीमेंट की गारंटी अर्थात ट्रायल एमवायएच में होने की स्थिति में अधीक्षक का पत्र
- जिस बात पर मरीज सवाल पूछे, उसे सहमति पत्र में अंडर लाइन करने लिखना।
- कोई लिखित सहमित न दे, तो ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करना।
- मानसिक रोगियों के परिजन से कानूनी अनुमति के बगैर जांच नहीं करना। 



प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
आईसीएमआर ने स्पष्ट किया है कि मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की डिक्लेरेशन को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार कर दिया है।





ट्रायल इंदौर में, ईसी पूणे में
- ड्रग ट्रायल के गोखधंधे में निमयों को रखा ताक पर 



विदेशी कंपनी द्वारा मरीजों पर दवा आजमाइश के खेल ड्रग ट्रायल में भारत सरकार के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है। डॉक्टरों ने निजी कंपनियों से रुपए लेने की जल्दबाजी में यह भी नहीं देखा कि उन्हें जांचने वाली एथिकल कमेटी कहां की है। ट्रायल के ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें डॉक्टर इंदौर के हैं और कमेटी पूणे, बैंग्लूर, चैन्नई की। कमेटी के सामने हाजिर की जरूरत इन डॉक्टरों ने नहीं समझी।

मानसिक रोगियों पर किए गए ट्रायल में ऐसा ही किया गया। एमवायएच के उप अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ने पूणे में कंपनी द्वारा गठित की गई एथिकल कमेटी से अनुमति ली। इसके लिए वे कभी पूणे गए भी नहीं। यही हाल एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव का भी रहा। उन्होंने ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर पर दमा रोगियों पर जो ट्रायल की हैं, उनके लिए इंदौर के बाहर की एथिकल कमेटी से अनुमति ली।

कॉलेज के कर्मचारी भी चपेट में
मेडिकल कॉलेज के कुछ कर्मचारियों पर डॉक्टरों द्वारा ट्रायल करने की जानकारी मिली है। कॉलेज के एकाउंट सेक्शन में कार्यरत एक व्यक्ति पर चेस्ट सेंटर में ट्रायल की गई। वह दमे का रोगी है।




विधानसभा बहस के लिए ध्यानाकर्षण

 ड्रग ट्रायल पर बहस के लिए दो विधायकों ने गुरुवार को विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी से मुलाकात की है। विधायकों का कहना है कि इस मुद्दे पर अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए क्योंकि यह हर प्रदेशवासी से जुड़ा मुद्दा है। इंदौर एक के विधायक सुदर्शन गुप्ता ने बताया रतलाम के विधायक पारस सकलेचा के साथ मैंने इस मसले पर चर्चा करवाने की आग्रह किया है। विधानसभा अध्यक्ष सैद्धांतिक तौर पर इसके लिए राजी भी हो गए हैं।

विशेषाधिकार हनन की तैयारी
ड्रग ट्रायल में लिप्त कुछ डॉक्टर सरकार को झूठी जानकारी देकर या किसी प्रकार के लेख छपवाकर विधानसभा एवं नागरिकों को भ्रमित करने की कोशिश में लगे हैं। एक जागरूक विधायक ने 'पत्रिकाÓ को बताया जब कोई प्रश्न किसी सदस्य ने पूछा है तो उस पर सदन के पटल पर चर्चा होने तक किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डाला जा सकता है। विषय से जुड़ा कोई व्यक्ति ऐसा करता है तब तो यह सीधे-सीधे विशेषाधिकार हनन का मामला है। ड्रग ट्रायल में भी ऐसी कोशिशें हो रही हैं, जिन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।



News in Patrika on 23th July 2010

इलाज के नाम पर करोड़ों का घालमेल

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: ईओडब्ल्यू पहुंचा मामला


ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा अब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) पहुंच गया है। डॉक्टरों से ही जुड़े एक संगठन ने शिकायत की है कि गरीब मरीजों को निशाना बनाकर एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर से जुड़े अस्पतालों में ऐसी दवाइयों का आजमाइश हो रही है, जो बाजार में उतरी ही नहीं है। राज्य सरकार की जानकारी के बगैर इलाज के नाम पर डॉक्टरों ने करोड़ों का घालमेल किया है। इसकी विस्तृत जांच करके भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और ड्रग एंड कास्मेटिक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाए।

 स्वास्थ्य समर्पण सेवा संगठन द्वारा भोपाल स्थित ईओडब्ल्यू मुख्यालय में शिकायत की गई है। संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे ने बताया ट्रायल के नाम पर काला धन राज्य में आ रहा है। ट्रायल करने वाले डॉक्टरों और उनके परिजन के बैंक खातों की जांच की जाए, तो हकीकत उजागर हो सकती है। चूंकि राज्य में ईओडब्ल्यू ही आर्थिक अपराध से जुड़े मामले सुलझाता है, इसलिए शिकायत की।

जीने का अधिकार संकट में
 स्वदेशी जागरण मंच ने शुरू किया विरोध


ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच ने बुधवार को विरोध शुरू कर दिया। मंच ने ट्रायल को जीवन जीने के अधिकार की राह में अड़चन बताया है। इस कार्य में लिप्त डॉक्टरों के विरूद्ध एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में संगठन चरणबद्ध आंदोलन करेगा।

मंच के कार्यकर्ताओं ने अपर आयुक्त गौतमसिंह को राष्टï्रपति एवं राज्यपाल के नाम पांच बिंदुओं का ज्ञापन सौंपा। महानगर संयोजक सुरेश बिजौलिया, विभाग संयोजक बलराम वर्मा एवं महानगर सहसंयोजक मनोज लोढ़े ने बताया मेडिकल हब की शक्ल लेते इंदौर में कुछ डॉक्टर मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। विदेशी कंपनियों की आड़ में मरीज पर जानलेवा प्रयोग किए जा रहे हैं। बारिकी से पूरे मामले की जांच की जाए तो सारा मामला सामने आ सकता है। केंद्र सरकार को चाहिए क्विंटल्स व बायोटेक नाम की स्पांसर कंपनियों को तत्काल प्रतिबंधित करे और राज्य सरकार को चाहिए कि वह तत्काल एक नियामक आयोग गठन करे जो मामले की पड़ताल कर सके। 


अब खंगाल रहे गाइडलाइन
- मरीजों पर प्रयोग करने से पहले तो नहीं दिया ध्यान
- पलट रहे आईसीएमआर, एम्स के नियमों की किताबें



पांच वर्षों से अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाइश (ड्रग ट्रायल) करने वाले डॉक्टर अब उस नैतिक गाइडलाइन की तलाश में है, जो उनका बचाव कर सके। इसके लिए वे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की उन किताबों के पन्ने पलट रहे हैं जिसमें ड्रग ट्रायल के कायदे तय किए गए हैं।

'पत्रिकाÓ द्वारा ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे का खुलासा करने और सरदारपुर, रतलाम व ग्वालियर के विधायकों द्वारा विधानसभा में मामला उठाने के बाद डॉक्टरों को नियमों की याद आई है। अब तक वे क्विंटल्स और बायोटेक जैसी स्पांसर कंपनियों द्वारा तय दिशा में काम करते थे। उन्होंने कभी आईसीएमआर के उन नियमों की परवाह नहीं की जो मनुष्य को प्रयोगशाला बनाने से बचाते हैं।

दो धारी तलवार!
आईसीएमआर के मापदंड दो धारी तलवार की तरह हैं। ट्रायल करने वाले डॉक्टर इसमें अपने बचाव की बातें ढूंढ रहे हैं, जबकि चिकित्सा शिक्षा विभाग डॉक्टरों को कटघरे में खड़े करने के तथ्य।


News in Patrika on 22th July 2010

इनहेलर के ट्रायल से हुआ मोतियाबिंद !

दमे की तकलीफ लेकर 2008 में एमवायएच आया था मरीज
कुछ ही दिन में दूसरी बीमारी ने जकड़ा

एक ऐसा मरीज सामने आया है जिस पर एमवायएच में ड्रग ट्रायल (ऐसी दवा से उपचार जो बाजार में नहीं मिलती) हुआ। मरीज दमे का रोगी था और उपचार के दौरान उस पर डॉक्टरों ने इनहेलर का प्रयोग किया। इसकी वजह से उसे मोतियाबिंद हो गया। मोतियाबिंद का उपचार भी एमवायएच के नेत्ररोग विभाग में ही हुआ।

मरीज को नुकसान होने की आशंका के चलते उसका नाम पता प्रकाशित नहीं किया जा रहा है। दस्तावेज बताते हैं कि दमा की शिकायत पर 2008 में जब मरीज एमवाय अस्पताल पहुंचा तो मेडिसीन विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक वाजपेयी ने उसे फार्मेटेरोल और मोमेटासोन दवा से बना इनहेलर दिया। साथ ही कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाए। इनहेलर के प्रयोग के साथ ही उसे नेत्र रोग विभाग भी भेजा गया, जहां उसकी आंखों की जांच नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. पुष्पा वर्मा ने की। उपचार शुरू होने के बाद उसे चेस्ट सेंटर शिफ्ट कर दिया गया। बाद में जब भी वह अस्पताल आता, जूनियर डॉक्टर मोटर साइकिल पर बैठाकर उसे एमवायएच से चेस्ट सेंटर ले जाया जाते। कुछ दिन बाद मरीज को मोतियाबिंद हो गया। कारण पूछा तो बताया गया उम्र बढऩे से ऐसा हो जाता है।

डॉक्टरों को मिले 27.54 लाख
सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि इनहेलर के इस ट्रायल के बदले प्लो रिसर्च इंस्टीट्यूट ने डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया के खाते में 27.54 लाख रुपए जमा कराए। इसका कुछ हिस्सा दूसरे डॉक्टरों को भी मिला। ट्रायल करीब दो दर्जन मरीजों पर किया गया। वर्ष 07-08 में 1.70 लाख, 08-09 में 11.08 लाख और 09-10 में 11.76 लाख का भुगतान डॉक्टरों को हुआ।


हां, साइड इफेक्ट होते थे
'डॉ. अशोक वाजपेयी के मार्गदर्शन में इनेहलर का ट्रायल किया था। इनहेलर से आंख संबंधी साइड इफेक्ट होते थे, इसीलिए मरीजों को नेत्र रोग विभाग भेजा जाता था। वहां की एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा ट्रायल में साथ थीं और मरीजों को जांचती थी। मरीज का नाम जाने बगैर यह नहीं बता सकता हूं कि मोतियाबिंद हुआ या नहीं।Ó
- डॉ. संजय अवासिया, एसोसिएट प्रोफेसर, मेडिसीन विभाग


डॉ. पुष्पा वर्मा की पोल खुली
डॉ. संजय अवासिया के बयान से नेत्र रोग विभाग की एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा की पोल भी खुल गई है। उन्होंने हाल ही में सरकार को जानकारी भेजी है कि वे किसी ट्रायल में शामिल नहीं रही।

रतलाम के डॉक्टर ने पूछा सवाल
एमवायएच के सूत्र बताते हैं इस ड्रग ट्रायल के संबंध में रतलाम के एक डॉक्टर ने सूचना के अधिकार में जानकारी मांगी, जो उसे नहीं दी गई। डॉक्टर ने इसके लिए चार रिमाइंडर भी भेजे, परंतु बात नहीं बनी। बाद में डॉक्टर ने क्या कार्रवाई की, इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है। 

News in Patrika on 21th July 2010

तय हो नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी

ड्रग ट्रायल को लेकर आगे आए चिकित्सकीय संगठन


शहर में चल रहे ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में लिप्त डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे चुनिंदा डॉक्टरों की वजह से चिकित्सा पेशे से जुड़े वे डॉक्टर भी बदनाम हो रहे हैं, जिनकी ट्रायल में कोई भूमिका नहीं है। एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छापरवाल इसके लिए पूरी तरह से इथिकल कमेटी को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि इथिकल कमेटी को ट्रायल से गुजर रहे प्रत्येक मरीज की जानकारी जुटाई जाना चाहिए। ट्रायल कई कडिय़ों से होकर गुजरता है। सभी कडिय़ां ईमानदारी से काम करें, जिसकी भी भूमिका संदिग्ध हो, उसकी ईमानदारी से जांच कराई जाना चाहिए। मरीजों का कंसेंट फॉर्म सूचनात्मक न होकर जानकारीपरक होना चाहिए, ताकि वह अपने भले-बुरे का निर्धारण कर सके। वहीं आईएमए के अध्यक्ष डॉ. अनिल बंडी का कहना है कि नियमों का पालन नहीं करने वाले डॉक्क्टरों की भूमिका को संदिग्ध माना जा सकता है। वे मानते हैं कि मरीजों को ट्रायल की जानकारी देना नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है। ट्रायल कर रहे डॉक्टर यदि ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह गैरकानूनी है।

ऐसे काम से पेशे की बदनामी

यह बात सौ फीसदी सही है कि कुछ डॉक्टरों के गलत ढंग से ड्रग ट्रायल करने के कारण शहर के अन्य चिकित्सकों की बदनामी हो रही है। निर्धारित मापदंडों और मरीज को विश्वास में लेकर उसे पूरी जानकारी देकर ही ट्रायल किया जाना चाहिए। यह वास्तव में मरीज का अधिकार भी है। 
डॉ. जीएस पटेल, पूर्व अध्यक्ष इंडियन पीडिएट्रिक एसोसिएशन

मरीजों से ट्रायल की बात छिपा रहे हैं, मतलब डॉक्टर कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। जनहित में किए जाने वाले इस काम के पहले मरीजों को ट्रायल के साथ दवा और उसके साइड इफेक्ट, इंश्योरेंस की जानकारी भी दी जाना चाहिए। चुनिंदा डॉक्टरों के कारण होम्योपैथी व अन्य पैथियां भी बदनाम न हो, इसका ट्रायल कर रहे डॉक्टरों को ध्यान रखना चाहिए।
डॉ. एके द्विवेदी, अध्यक्ष, होम्योपैथी एसोसिएशन

ड्रग ट्रायल कर रहे चिकित्सकों को चाहिए कि वे मरीजों को ट्रायल वाली दवाओं से होने वाले नुकसान और फायदे के बारे में भी बताएं। साइड इफेक्ट होने पर मरीजों के कानूनी अधिकारों की भी जानकारी दी जाना चाहिए। चिकित्सकों की भूमिका पूरी तरह पारदर्शी हो।
डॉ. ओपी तिवारी, सदस्य, एमसीआई



News in Patrika on 20th July 2010

बेहद चतुराई से रोगी को बनाते सब्जेक्ट

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: फ्री दवाई का लालच देकर जीतते हैं भरोसा


विदेशी कंपनी की दवा को बाजार में उतारने से पहले उसे रोगियों पर आजमाने की विद्या 'ड्रग ट्रायलÓ का जाल बेहद चतुराई से फैलाया जाता है। रोगी को मुफ्त दवाई के लालच से फांसा जाता है और कहा जाता है कि उसे एक प्रोजेक्ट में हिस्सेदार बनाया जा रहा है। प्रोजेक्ट के कुछ कागजों पर उससे साइन लिए जाते हैं और शुरू हो जाती है ड्रग ट्रायल।

शहर के कुछ प्रबुद्ध डॉक्टरों ने 'पत्रिकाÓ को बताया जब कोई जरूरतमंद मरीज अस्पताल में आता है  तो उसे कहा जाता है कि डब्ल्यूएचओ भारत के गरीब मरीजों की मदद करता है और उसी से जुड़ा एक कार्यक्रम अस्पताल में चल रहा है। इस कार्यक्रम में आपको शामिल होना है, तो कुछ कागज साइन करना होंगे। इससे आपको मुफ्त दवा मिलना शुरू हो जाएगी। साथ ही जांचें भी फ्री होंगी। मरीज को लगता है इससे अच्छा क्या होगा। उसके राजी होते ही ताबड़तोड़ एक फाइल बनाई जाती है और उससे साइन करवा लिए जाते हैं। फाइल में मरीज का नाम खत्म हो जाता है और उसे एक नंबर दे दिया जाता है। यहीं से वह मरीज से 'सब्जेक्टÓ (विषय) बन जाता है और विदेशी दवा कंपनी की अज्ञात दवा से उसका इलाज शुरू होता है। यह ऐसी दवा होती है, जो केवल संबंधित डॉक्टर के पास ही होती है, बाजार में नहीं मिलती है।

चूंकि सब्जेक्ट से डॉक्टर को बेहद मोटी कमाई होती है, इसलिए उसका विशेष ध्यान रखा जाता है। समय समय पर उसे फोन करके अस्पताल बुलाते हैं। जांच करवाते हैं और कभी-कभी फलों का रस भी पिलाते हैं। कई बार इलाज के दौरान मरीज की तबीयत बिगड़ जाती है, तो कहा जाता है यह सामान्य बात है।


बीमा करवाते हैं, लेकिन क्लेम नहीं दिलवाते
ट्रायल के नियमों के मुताबिक रोगी उर्फ सब्जेक्ट का बीमा करवान अनिवार्य है। डॉक्टर इसका पालन करते हैं, लेकिन जब रोगी की तबीयत बिगड़ती है या उसकी मौत हो जाती है, तो उसे क्लेम नहीं दिलवाया जाता है। दरअसल, क्लेम देने की स्थिति में परिजन पूछ सकते हैं दवा के कारण मौत हुई है क्या? यही वजह है कि इससे बचने के लिए यह तरीका अपनाया जाता है। बीच में मौत होने पर डॉक्टर सब्जेक्ट नंबर वही रहने देते हैं और मरीज बदल देते हैं।

निजी बैंकों में आती रकम
ट्रायल से आने वाली राशि आमतौर पर निजी बैंकों के जरिए आती है, ताकि सरकार एकदम से निगरानी न कर सके। इसके लिए ट्रायल करने वाले डॉक्टरों ने पति या पत्नी या बच्चों के नाम से खाते खुलवा रखे हैं। 


बचने के लिए यह करें मरीज
- डॉक्टर से बीमारी और दवा दोनों के बारे में पूरी जानकारी लें।
- किसी कागज पर साइन करवाएं तो उसकी फोटोकॉपी अवश्य लें।
- मुफ्त में ऐसी ही दवाई लें, जो बाजार में भी बिकती हो।
- इलाज के दौरान तबीयत बिगड़े तो किसी दूसरे डॉक्टर से संपर्क करें।
- कोई जोर-जबरदस्ती करे तो ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करें।


हर डॉक्टर नहीं करता ट्रायल
ट्रायल में शहर के चंद डॉक्टर ही शामिल हैं, शेष डॉक्टर सेवा के इस पवित्र पेशे का मान बढ़ा रहे हैं। वरिष्ठ डॉक्टरों की राय है कि ट्रायल करने वालों के कारण पूरी बिरादरी कटघरे में है और इनसे लोगों को सचेत किया जाना जरूरी है।



चीफ जस्टिस तक शिकायत
- ड्रग ट्रायल के विरोध में सक्रिय हुआ डॉक्टरों का संगठन

ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ शनिवार को राष्टï्रपति, राज्यपाल, मप्र के चीफ जस्टिस और मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेज दी गई। डॉक्टरों से जुड़े एक संगठन ने यह पहल की है। संगठन का कहना है कि चंद डॉक्टरों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम हो रही है। डॉक्टरी सेवा का पेशा है और ट्रायल एक धंधा है। इससे मनुष्यों के अधिकारों का हनन हो रहा है।

संगठन का नाम स्वास्थ्य समर्पण सेवा है, जिसके सभी सदस्य मेडिको (डॉक्टर) हैं। संगठन प्रमुख डॉ. आनंदसिंह राजे ने बताया ड्रग ट्रायल के जरिए मरीजों की जान जोखिम में डाली जा रही है। इससे संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन का अधिकार खतरे में है। ट्रायल में कई किस्म की आर्थिक अनियममितताएं भी होती हैं। यही वजह है कि सभी स्थानों पर शिकायत भेजी गई है। इस मामले में राज्य सरकार का रूख बेहद लजर है, जबकि राज्य के लोग खतरे में है।

पत्रिका की खबरों का आधार
संगठन ने शिकायत में पत्रिका की खोजपरक खबरों का जिक्र भी किया है। डॉ. राजे ने बताया अखबार ने इस मुद्दे को छेड़कर समूचे चिकित्साजगत के कान खड़े कर दिए हैं। कई डॉक्टरों को पता ही नहीं था कि इलाज के नाम पर यह गोरखधंधा भी चल रहा है।

News in Patrika on 18th July 2010

एमवायएच अधीक्षक ने खोला ट्रायल अस्पताल

तभी तो नहीं होती दूसरों पर कार्रवाई सरकार को रखा अंधेरे में

एमवायएच में आने वाले गरीब और जरूरतमंद मरीजों को चूहा मानकर विदेशी कंपनियों की दवाइयों का इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए जिम्मेदार डॉक्टर ही इस गोरखधंधे में लिप्त है। अस्पताल अधीक्षक ने ड्रग ट्रायल के लिए अपने घर के पास एक रिसर्च सेंटर खोला और इसमें धड़ल्ले से ट्रायल होती है। इसके लिए उन्होंने न तो सरकार के अनुमति ली है और न ही कमाई का खुलासा किया। 

एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव 76, धार कोठी पर ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर फॉर चेस्ट एंड एलर्जी डिसीसेज नाम का सेंटर खोला है। क्लीनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (सीटीआरआई) के रिकॉर्ड के मुताबिक डॉ. भार्गव वर्तमान में पांच ड्रग ट्रायल कर रहे हैं। ट्रायल प्रोजेक्ट दो करोड़ से अधिक के होने का अनुमान है।
सरकार को भेजी झूठी जानकारी
डॉ. भार्गव ने राज्य सरकार को बताया है कि उन्होंने 2005 से 08 तक सीओपीडी और डायबिटीक नेफ्रोपेथी से जुड़े ट्रायल में 43 मरीजों पर 4.5 लाख रुपए का कारोबार किया, जबकि सीटीआरआई का रिकॉर्ड उनकी कलाई खोल रहा है।

हां, मेरा ही है ज्ञानपुष्प सेंटर

प्र- ज्ञानपुष्प सेंटर से आपका क्या ताल्लुक है?
उ- वह मेरा ही है और मैं वहां प्रेक्टिस करता हूं।
प्र- आपको तो प्रेक्टिस की अनुमति नहीं है?
उ- मैं नॉन प्रेक्टिसिंग एलाउंस नहीं लेता हूं, इसलिए प्रेक्टिस करता हूं।
प्र- इस पर ड्रग ट्रायल्स होते हैं?
उ- हां, कुछ होता है, लेकिन इसकी जानकारी आपको किसने दी।
प्र- वहां पांच ट्रायल चल रहे हैं और सरकार को जानकारी नहीं दी गई?
उ- सरकार ने बस सरकारी अस्पताल की जानकारी मांगी, जो दे दी है। पांच ट्रायल चल रहे हैं।
प्र- क्या आप अस्पताल में चल रहे ट्रायल को बचा रहे हैं?
उ- नहीं, इस बारे में मैं डीन से बात कर रहा हूं। वे कहेंगे तो कार्रवाई होगी।
(एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव से चर्चा)


दमा रोगियों पर डॉ. भार्गव का दांव
- मार्च 2009 से फैलाया जाल 
एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव दमा के रोगियों पर ट्रायल करते हैं। वैसे तो वे 2005 से ही इस मामले में जुड़े हैं, लेकिन मार्च 2009 से ïवे पूरी तरह इस कारोबार में जुट गए।

डॉ. भार्गव के पांच ट्रायल

एक -
7 मार्च 2009 से सिवीयर अस्थमा रोगियों पर सिप्ला कंपनी के लिए इन्हेलर का ट्रायल। स्वयं प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर। अंडर में देश के दूसरे 14 अस्पतालों में ट्रायल जारी।

दो -
21 अप्रैल 2009 से सिवीयर अस्थमा रोगियों पर यूके की मुंडीफार्मा कंपनी के लिए ट्रायलशुरू किया। इसमें प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. विवेक मल्होत्रा है।

तीन-
2 मई 2009 से सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव्ह पल्मोनरी डिसीस) रोग के लिए विदेशी कंपनी बोहरिंगर इंगेलहिम फार्मास्यूटिकल्स कंपनी की गोली और इन्हेलर का ट्रायल शुरू किया। डॉ. पूजा अग्रवाल उनकी प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर है।

चार -
6 जून 2009 से ब्रोंकियल अस्थमा के लिए केडिला हेल्थकेयर के लिए 10 मिली ग्राम की गोली का प्रयोग शुरू किया। डॉ. रविंद्र मित्तल उनके प्रिंसीपल इन्वेसिटगेटर हैं।

पांच -
14 अप्रैल 2010 से अस्थमा रोगियों के लिए यूके की कंपनी मुंडीफार्मा रिसर्ज के लिए ट्रायल शुरू किया। डॉ. अताली शेख उनकी प्रिंसीपल इन्वेस्टिगेटर है।

अपराध पर अपराध
- पूर्णकालिक अधीक्षक होने के नाते प्रायवेट प्रेक्टिस की अनुमति नहीं फिर भी कर रहे ड्रग ट्रायल।
- खुद लिप्त इसलिए एमवाय अस्पताल को भी खुले आम ट्रायल का केंद्र बनने दिया।
- सरकार को भेजे संपंत्ति के ब्यौरे में ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर का जिक्र नहीं किया।

दूसरों को संरक्षण
एमवायएच के कई कमरों में गुपचुप तरीके से ट्रायल का धंधा चल रहा है। 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बावजूद प्रबंधन इन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। माना जा रहा है कि डॉ. भार्गव के संरक्षण में ही यह कारोबार फल-फूल रहा है।



ताबड़तोड़ हुई एथिकल कमेटी की बैठक

- खंगाले नियम कायदे, हिसाब की जानकारी भी मांगी
अप्रमाणिक दवाई गरीब और अनपढ़ मरीजों पर आजमाने के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ को अनुमति देने वाली एमजीएम मेडिकल कॉलेज की एथिकल कमेटी की शुक्रवार दोपहर करीब एक बजे ताबड़तोड़ बैठक हुई। कमेटी के स्वतंत्र सदस्यों ने कॉलेज में चल रहे ट्रायल के बारे में विस्तार से जानकारी मांगी और नियम भी खंगाले। करीब दो घंटे की विस्तृत चर्चा के बाद कमेटी मरीजों को अपने हाल पर छोड़कर रवाना हो गई।
पर्यावरणविद् कुट्टी मेनन, अर्थशास्त्री डॉ. जयंतीलाल भंडारी और एडवोकेट योगेश मित्तल के साथ ही कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव भी बैठक में पहुंचे। गोपनीयता रखने के लिए बैठक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के बजाए एमवायएच के चौथी मंजिल स्थित मेडिसीन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी के कक्ष में हुई। डॉ. भराणी ही कमेटी के सचिव भी हैं। कमेटी ड्रग ट्रायल पर उठ रहे सवालों के जवाब जानना चाहती थी। ट्रायल के नाम पर आने वाली राशि और मरीजों से मुलाकात के प्रश्न भी उठे। कमेटी में आम आदमी शामिल नहीं होने की जिज्ञासा पर ट्रायल कर रहे डॉक्टरों ने समïझाया आम आदमी मतलब नॉन मेडिको (जो डॉक्टर नहीं है) होता है। ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट की अनदेखी करके कमेटी भी संतुष्ट हो गई। कमेटी को यह भी बताया गया कि जिन मरीजों पर प्रयोग होता है, उनमें केवल बीपीएल ही नहीं है, कुछ मध्यमवर्गीय लोगों भी शामिल हैं। विधानसभा के सवालों में उलझे होने का बहाना बनाकर अस्पताल अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव बैठक में नहीं पहुंचे। 
पर्यावरणविद् मेनन ने 'पत्रिकाÓ को बताया वैसे तो पहले भी बैठकें होती रही हैं, लेकिन आज हम लोग मीडिया में उठ रहे सवालों के जवाब तलाशने के लिए एकत्रित हुए थे। इसमें सभी विषयों पर चर्चा हुई है। हम मानते हैं कि इसमें और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है। डॉ. भंडारी ने बताया मैं वैज्ञानिक शोध के पक्ष में हूं और कमेटी में भी यही बात उठी। कुछ बातें कमेटी जानना चाहती थी, जिनके ट्रायल करने वाले सदस्यों ने संतोषजनक जवाब दिए हैं।

आंखों के रोगी भी निशाना
- डॉ. पुष्पा वर्मा के नाम ट्रायल रजिस्टर्ड, काम शुरू नहीं फिर भी हुआ रुपए का आदान प्रदान
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. पुष्पा वर्मा ने राज्य सरकार को जानकारी दी है कि वे ड्रग ट्रायल नहीं करती हैं, लेकिन उनके खाते में ट्रायल के नाम पर रुपए का आदान-प्रदान हुआ है। उधर, भारत सरकार का रिकॉर्ड कहता है कि वे 2005 से एमवायएच में आने वाले नेत्र रोगियों पर ट्रायल कर रही हैं। मई 2010 में भी उन्होंने क्यूंटल्स रिसर्च इंडिया मुबंई से टेक्सास की एल्कोन रिसर्च कंपनी के आईड्राप की ट्रायल हाथ में ली है। इस ड्राप की बूंदे वे कंजेक्टेवाइटिस के रोगियों पर आजमाती हैं। उन्होंने 10 नवंबर 2005 और 7 फरवरी 2006 को कुछ सहमति पत्रों पर मरीजों के हस्ताक्षर भी लिए हैं। उनके द्वारा 8 दिसंबर 2007 का क्वंटेल्स रिसर्च इंडिया कंपनी के सीनियर क्लीनिकल रिसर्च एसोसिएट फ्रांसिस विज को लिखे पत्र में इसका जिक्र है। डॉ. वर्मा को इस काम के लिए कुछ राशि भी प्राप्त हुई है।

रुपया तो ट्रेनिंग का मिला था
प्र. ट्रायल से आप इंकार कर रही हैं, जबकि रिकॉर्ड कुछ ओर कहता है?
उ. मैंने ट्रायल के लिए आवेदन दिया था, लेकिन अनुमति नहीं मिली।
प्र. दवा कंपनी ने आपको राशि भी दी है ?
उ. वे तो ट्रेनिंग कार्यक्रम के लिए मिले थे। प्रोजेक्ट तो आया ही नहीं।
प्र. सीटीआरआई ने 21 मई 2010 से आपको एडनोवायरल कंजक्टेवाइटिस में इन्वेस्टिगेटर बताया है?
उ. वह सही है, लेकिन मैंने अभी तक ट्रायल शुरू नहीं किया है। मेरे पास एक भी मरीज रजिस्टर्ड नहीं है।
(डॉ. पुष्पा वर्मा से चर्चा)
 News in Patrika on 17th July 2010

बाले-बाले होते ड्रग ट्रायल के फैसले

एथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी भी कर रहे ट्रायल
एमजीएम मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी की बुनावट पर उठे सवाल


अप्रमाणिक दवाई मरीजों पर आजमाने के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ को अनुमति देने वाली एमजीएम मेडिकल कॉलेज की एथिकल कमेटी भी सवालों के घेरे में है। इस कमेटी के सचिव ऐसे डॉक्टर हैं, जो स्वयं ड्रग ट्रायल में शामिल हैं, जबकि ड्रग एवं कास्मेटिक एक्ट के मुताबिक ऐसा नहीं किया जा सकता।
 
एथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी है। वे मेडिसीन विभाग के प्रोफेसर भी हैं। वे 2005 से अब तक 237 मरीजों पर करीब 44 लाख की ट्रायल कर चुके हैं। दिल के रोगियों पर हो रहे उनके ट्रायल में डॉ. अपूर्व पुराणिक, आशीष पटेल, सोनल पगारे भी भागीदार रहे हैं।

आम आदमी भी नहीं रखा
कानून में स्पष्ट है कि कमेटी में पांच नॉन मेडिको (जो डॉक्टर न हों) प्रतिनिधि रहें। इसमें एक आम आदमी होना चाहिए। वर्तमान में रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये, पर्यावरणविद कुट्टी मेनन, अर्थशास्त्री डॉ. जयंतीलाल भंडारी एवं एडवोकेट योगेश मित्तल चार ही सदस्य हैं। सामान्य व्यक्ति कोई नहीं है।

आज तक नहीं देखे मरीज
ट्रायल करने वाले डॉक्टरों ने आज तक किसी मरीज से कमेटी सदस्यों से मुलाकात नहीं करवाई है। कुट्टी मेनन कहते हैं केवल दवा और दवा कंपनियों की जानकारी दी जाती है। आज तक किसी मरीज से नहीं मिले। 

गोपनीयता का हथकंडा
ट्रायल के गोरखधंधे का खुलासा किए जाने के बाद इसमें लिप्त लोगों ने गोपनीयता को अपना हथियार बनाना शुरू कर दिया है। एथिकल कमेटी ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन को पत्र लिखकर गुहार लगाई है कि ट्रायल की पूरी जानकारी देने को लोग तैयार हैं, लेकिन जानकारी गोपनीय रखी जाए। कमेटी के इस प्रस्ताव से सेंट्रल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) के उस नियम का मजाक उड़ रहा है, जिसका गठन ही ट्रायल को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए हुआ। 

अपने ट्रायल में वोट नहीं करता
जब मेरे ड्रग ट्रायल के बारे में विचार होता है, तो मैं राय नहीं देता हूं और न ही किसी मसले पर वोट ही करता हूं। कमेटी में एक सामान्य व्यक्ति का जो प्रस्ताव है, उसका अर्थ नॉन-मेडिको होता है और ऐसे व्यक्ति को हमने कमेटी में रखा है। वह फार्मेकोलॉजी का प्रोफेसर भी हो सकता है और कोई सामाजिक सदस्य भी।
- डॉ. अनिल भराणी, सचिव, एथिकल कमेटी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज


क्या करें...में उलझा एमजीएम
दो जिज्ञासु विधायकों के सवालों से एमजीएम मेडिकल कॉलेज में भारी उथल-पुथल हो गई है। ड्रग ट्रायल से जुड़े सवालों के जवाब से प्रोफेसरों को कैसे बचाएं, इसी गहमागहमी में गुरुवार को रात आठ बजे तक मेडिकल कॉलेज में काम चलता रहा। संभवत: शुक्रवार सुबह एक व्यक्ति को जानकारी से साथ भोपाल रवाना किया जाएगा। कॉलेज चाहता था कि फैक्स से जानकारी भेजी जाए, लेकिन संचालक चिकित्सा शिक्षा ने ऐसा करना से इंकार कर दिया। मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत ने इस बारे में कुछ भी कहने से इंकार किया।

News in Patrika on 16th July 2010

बुधवार, जुलाई 21, 2010

ये कैसे अस्पताल

एमवायएच, चेस्ट सेंटर और चाचा नेहरू अस्पताल में प्रशासन की अनुमति के बगैर संचालित हो रहे ऑफिस
कई बाहरी लोग महीनों से कर रहे काम, फैक्स, टेलिफोन की भी नहीं ली अनुमति
ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा

निर्माणाधीन केमिकल फार्मूले (दवा) के मरीजों पर प्रयोग के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े तीन अस्पतालों में ऐसे दफ्तर खुले हैं, जो ड्रग ट्रायल के केंद्र हैं। इनमें करीब तीन दर्जन लोग काम करते हैं, जिन्हें ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टर ही तनख्वाह देते हैं। इन दफ्तरों में कम्प्यूटर, स्केनर, प्रिंटर के साथ ही फैक्स और अलग से लैंड लाइन फोन भी लगे हैं। इस सबकुछ के लिए किसी से भी इजाजत नहीं ली गई।
कैमरा देखते ही भागखड़े हुए

एक
चेस्ट सेंटर के एक कोने में बने कमरा नंबर छह में पल्मोनरी फंक्शन लेब में ड्रग ट्रायल होता है। इसमें किसी को झांककर देखने की अनुमति भी नहीं है। कैमरा देखते ही काम कर रहे संजयसिंह चौहान ने कमरा बंद कर लिया और मेडिसिन विभाग के जूनियर डॉक्टर को बुलाने भागा। डॉक्टर ने कहा इन्हें कमरे में मत जाने देना। संजय ने बताया मैं यहां डॉक्टर साहब का काम करता हूं।

दो
एमवाय अस्पताल की तल मंजिल स्थित डॉ. अपूर्ण पुराणिक के चेंबर के बाहर वाले कमरे में बक्सों के ठेर रखे हुए हैं। विदेशों से दवाइयां इन्हीं में पैक होकर यहां पहुंचती है। उनके कर्मचारियों ने बताया अंदर तो फैक्स और टेलिफोन भी लगे हैं। इसकी जानकारी एमवायएच अस्पताल प्रबंधन को दे रखी है।

तीन
एमवायएच की चौथी मंजिल के कमरा नंबर 419 बी में तीन से चार एवजी काम करते हैं। कमरे का दरवाजा खुलते ही बंद हो जाता है। कैमरा देखते ही राकेश नाम के कर्मचारी ने कहा यहां फोटो मत खींचो। उसने अपने चेहरे को हाथ से दबाने की कोशिश भी की। बाहर निकलते हुए अरविंद खुद को ईसीजी टेक्नीशिन बताता है। फोटो लेने पर भागकर पास के ही एक कमरे में जाकर वहां मौजूद जूनियर डॉक्टरों को बताता है। वे बाहर आकर मोबाइल लगाना शुरू कर देते हैं।

 चार
चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के कमरा नंबर 14 में दो युवतियां और चार युवक कार्यरत थे। वहां से फाइलों से भरे बक्सों को बाहर किया जा रहा था। मौजूद आशीष दुबे ने विरोध किया आप किसकी अनुमति से फोटो खींच रहे हैं। जब उनसे प्रतिप्रश्न हुआ आप किसकी अनुमति से यहां काम कर रहे हो, तो वे चुप हो गए। उन्होंने तत्काल कर्मचारी को कहा कमरा बंद कर लो।


संजय नाम का कोई व्यक्ति हमारा कर्मचारी नहीं है और न ही किसी को फैक्स या टेलीफोन लगाने की अनुमति दी गई है।
- डॉ. एम. हरगुनानी, अधीक्षक, चेस्ट सेंटर

हमारे यहां वैक्सीन पर ड्रग ट्रायल हो रहा है और इसी के दस्तावेजी काम के लिए कुछ नॉन मेडिको लोग काम करे हैं। वे हमारे कर्मचारी नहीं है।
- डॉ. शरद थोरा, अधीक्षक, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय

मुझे जानकारी नहीं है कि अस्पताल में कोई गैर व्यक्ति भी कार्यरत है। अस्पताल में किसी ने अलग से फैक्स या टेलिफोन लगा रखे हैं, तो यह अवैधानिक है। मुझसे किसी ने भी इजाजत नहीं ली है।
- डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवाय अस्पताल

मुझे अभी तक किसी ने जानकारी नहीं दी है। इस संबंध में मैं अस्पताल अधीक्षकों से पूछताछ करूंगा।
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

उठते सवाल
- अस्पताल के मरीजों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?
- महीनों से अनजान लोग अस्पताल में काम कर रहे हैं, फिर भी अनदेखी क्यों की गई?
- दफ्तरों में हो रहे बिजली खर्च के लिए कौन है जिम्मेदार?




शोध के नाम पर धोखा


एमजीएम मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टर ड्रग ट्रायल को अपने शोध का विषय बताकर पेश कर रहे हैं। कॉलेज की ही एक प्रोफेसर ने इसकी पुरजोर विरोध भी किया है। उन्होंने कहा है यह शोध नहीं है, बस ट्रायल है। इसमें पीजी छात्रों को नहीं जुडऩा चाहिए।
जनवरी 2009 में कॉलेज काउंसिल की बैठक में थीसिस रिव्यू कमेटी की चेयरमैन डॉ. प्रीति तनेजा ने ड्रग ट्रायल का मसला उठाते हुए कहा था कि पीजी छात्र ट्रायल को रिसर्च की तरह पेश कर रहे हैं, जबकि इसकी इजाजत नहीं है। इस पर तत्काल बंदिश लगना चाहिए। डॉ. तनेजा का विरोध कुछ दिन चर्चा में रहा और बाद में इस कार्य में शामिल कुछ प्रोफेसर ने कॉलेज डीन कक्ष के सामने वाले हॉल में रंगरोगन, टाइल्स और कुलर का इंतजाम करवाकर मामला शांत कर दिया।

इन विभागों में सबसे अधिक ट्रायल
मेडिसिन, आर्थोपेडिक्स, नेत्ररोग, शिशु रोग, न्यूरोलॉजी, चेस्ट और सर्जरी विभागों में ड्रग ट्रायल सर्वाधिक होते हैं। कैंसर अस्पताल में भी कुछ कंपनियों के प्रस्ताव लंबित हैं।

दवा कंपनियां व संस्थाएं
पेनेशिया बायोटेक, मर्क शॉप एण्ड डोम, नोवर्टिस, एलजी लाइफ साइंस, जॉन्सन एण्ड जॉन्सन, सिरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, क्रूसिल, नोवर्टिस, फॉरेडिल, इनहेल्ड मोमेटेसोन फ्यूरेट, फॉर्मेट्रॉल कॉम्बीनेशन और फॉर्मेट्रॉल, टेलावेंसीन वर्सेस वेन्सोमायसिन, ऑस्ट्रेलियन मेडिकल काउंसिल, सेंट जोंस मेडिकल कॉलेज बैंग्लूरू, मैक मास्टर यूनिवर्सिटी कनाड़ा, केडिला फार्मास्यूटिकल्स, बीएमएस, पीपीडी, सर्वियर, ड्यूक मेडिकल यूनिवर्सिटी, सेंक्यो फार्मा डेवलपमेंट, नोवर्टिस।


एक प्रोफेसर उठा चुकी हैं मुद्दा
जनवरी 2009 में कॉलेज काउंसिल की बैठक में थीसिस रिव्यू कमेटी की चेयरमैन डॉ. प्रीति तनेजा ने ड्रग ट्रायल का मसला उठाते हुए कहा था कि पीजी छात्र ट्रायल को रिसर्च की तरह पेश कर रहे हैं, जबकि इसकी इजाजत नहीं है। इस पर तत्काल बंदिश लगना चाहिए। यह बात कुछ दिन चर्चा में रही और बाद में सांठगांठ में शामिल कुछ डॉक्टरों ने कॉलेज डीन कक्ष के सामने वाले हॉल में रंगरोगन, टाइल्स और कुलर का इंतजाम करवा दिया।

एक वर्ष में दस जूडॉ को विदेश यात्रा
ड्रग ट्रायल के धंधे में विदेशों में जाकर दवा के असर की रिपोर्ट पेश करना होती है। सरकारी सेवा में होने के कारण सिनीयर कंसल्टेंट बगैर अनुमति के नहीं जा सकते हैं, इसलिए वे अपने मातहत पढ़ाई कर रहे जूनियर डॉक्टरों को भेजते हैं। सूत्रों के मुताबिक एक वर्ष में दस से अधिक जूडॉ विदेश जा चुके हैं। डॉ. सचिन सेठी, गौरव मोहन, प्रोमिता चौधरी, दीलिप सिंह, मयंक जैन, आशीष जैन, प्रज्ञा जैन, मीना ढोले, अब्दुल मंसूर, वरुण कटारिया इनमें शामिल हैं। इनमें से कुछ अब कॉलेज छोड़ चुके हैं।


(14 जुलाई को पत्रिका में प्रकाशित)
- रिपोर्टर शैलेष दीक्षित से सहयोग