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रविवार, अगस्त 01, 2010

निजी अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल का धोखा

ड्रग ट्रायल
कई अस्पतालों में धड़ल्ले से निशाना बन रहे मरीज
स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है कोई जानकारी











बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का परीक्षण (ड्रग ट्रायल) केवल सरकारी एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में ही नहीं हो रहा है। कई निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में भी यह काम जोरों पर है। ऐसा भी नहीं है कि किसी एक बीमारी के रोगियों पर ही ट्रायल चल रहे हैं। दिल के ऑपरेशन में लगने वाले स्टेंट से लेकर इनहेलर तक और डायबिटीज से लेकर कैंसर तक के रोगियों तक पर प्रयोग हो रहे हैं। 

भारत सरकार के क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया (सीटीआरआई) का रिकॉर्ड बताता है कि मप्र में सबसे अधिक ट्रायल इंदौर में किए जा रहे हैं। पिछले चार वर्ष (२००६-२००९) के आंकड़ों पर गौर करें तो मप्र में ८३ दवाओं के ट्रायल किए गए इनमें से ५६ ट्रायल इंदौर में हुए, जबकि २७ ट्रायल भोपाल सहित प्रदेश के अन्य शहरों में किए गए।

निजी अस्पतालों में हो रहे ड्रग ट्रायल के बारे में विभाग के पास कोई जानकरी उपलब्ध नहीं है। नियम देखकर इनके बारे में पड़ताल की जाएगी।
- डॉ. शरद पंडित, सीएमएचओ, इंदौर

ये हैं कुछ निजी डॉक्टर

1. डॉ. सुनील एम. जैन
अस्पताल- टोटल (डायबिटीज थॉयरॉइड हॉरमोन रिसर्च इंस्टीट्यूट)
कंपनी - बोईरिंगर इंगेल्हिम फार्मास्यूटिकल्स सहित कुछ अन्य कंपनियां
उत्पाद - बीआई १३५६ (५ एमजी) सहित कुछ अन्य उत्पाद
बीमारी - डायबिटीक मरीजों में ग्लायकेमिक

२. डॉ.गोविंद एन.मालपानी
अस्पताल-  सुयश
कंपनी - ल्यूपिन
उत्पाद - एलएलएल २०११, नेसल स्प्रे
बीमारी - माइग्रेन


3. डॉ.एके पटेल
अस्पताल-  चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - पेल्सीटेक्सल, सिस्प्लेटिन (किमोथेरेपिक एजेंट)
बीमारी - स्मॉल सेल लंग केंसर 


4. डॉ. सुशील भाटिया
अस्पताल- चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - मायकोबैक्टेरियम विथ डॉसिटेक्साल
बीमारी - प्रोस्टेट केंसर

5. डॉ.गिरीश के कवठेकर
 अस्पताल  - सीएचएल अपोलो अस्पताल
 कंपनी  - इन्फीनियम-कोर
 उत्पाद   - कोरोनरी स्टेंट
 बीमारी  - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


6. डॉ.विनोद सोमानी
अस्पताल -  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


7. डॉ. शैलेंद्र त्रिवेदी
अस्पताल-  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


8. डॉ. नितीन मोदी
अस्पताल- सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


9. डॉ. बीएस ठाकुर
अस्पताल-  गे्रटर कैलाश
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स व जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 


10. डॉ. अतुल शेंडे
अस्पताल - मानव ट्रेड सेंटर स्थित क्लिनिक
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स और जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 

11. डॉ. प्रवर पासी
अस्पताल- ग्रेटर कैलाश 
कंपनी - बायोजेन आइडेक
उत्पाद - १२५ एमसीजी, बीआईआईबी ०१७
बीमारी - मल्टीपल सिरोसिस

( खबर शैलेष दीक्षित से साभार)

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आंध्रप्रदेश के कानून पर कमेटी की निगाह 
 प्रमुख सचिव के साथ डीएमई और डॉ. छपरवाल भी शामिल

बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के परीक्षण (ड्रग ट्रायल) को प्रदेश में काबू करने के लिए नियमावली बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यी कमेटी की निगाह आंध्रप्रदेश के कानून पर है। वहां ड्रग ट्रायल को प्रतिबंधित किया गया है। कमेटी संभवत: एक माह में रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी।

स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने शुक्रवार को विधानसभा में कमेटी गठित करने की घोषणा की थी। शनिवार को 'पत्रिकाÓ से चर्चा में उन्होंने बताया चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनाई कमेटी में संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी और एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल सदस्य रहेंगे।

उधर, दाणी ने बताया फिलहाल ड्रग ट्रायल के संबंध में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट लागू किया गया है। अध्ययन करने के बाद ही स्पष्ट होगा कि राज्य सरकार इस बारे में क्या कर सकती है? दोनों अन्य सदस्यों के साथ शीघ्र ही बैठक की जाएगी। कोशिश रहेगी कि एक महीने में रिपोर्ट बनाकर दे दी जाए। डॉ. छपरवाल ने बताया फिलहाल मुझे कमेटी के सदस्य बनाए जाने की जानकारी नहीं मिली है। मौजूदा कानूनों और गाइडलाइन का अध्ययन करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।



सीबीआई, एमसीआई को भी शिकायत
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) में जांच शुरू होने के साथ ही एमजीएम मेडिकल कॉलेज के ड्रग ट्रायल की शिकायत सीबीआई और एमसीआई को भी पहुंच चुकी है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने बताया दोनों स्थानों पर शपथ पत्र के साथ शिकायत की गई है।

शनिवार, जुलाई 31, 2010

दवा कंपनियां अटका देती हैं कानून

Drug Trial : A Money Game to treat Man as Guinea-pig


साढ़े चार वर्ष से केंद्र सरकार नहीं कर सकी फैसला
 आईसीएमआर की सिफारिश के बावजूद संसद नहीं पहुंच सका  बिल 

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित की गई दवाओं और टीकों के लोगों पर ïपरीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए भारत सरकार के पास भी एक कानून (बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल) साढ़े चार वर्ष से अटका हुआ है। इस देरी का कारण अरबों रुपए के बजट वाली दवा कंपनियों को माना जाता है। ताज्जुब तो यह है कि इस कानून को संसद में पेश करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) कई बार सिफारिश कर चुकी है।

नागरिकों को अनजान दवाइयों के प्रभाव से बचाने के लिए 2005 में केंद्र सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया। इसी के बाद ड्रग ट्रायल करने का कार्य विधिवत शुरू हुआ। इसके पहले बगैर किसी नियंत्रण या जानकारी के ट्रायल होते थे, किंतु एक्ट में संशोधन भी बेहद लचर साबित हुआ। न तो इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है और न ही किसी भी डॉक्टर पर निगरानी करने की कोई व्यवस्था। यही वजह है कि दवा कंपनियों ने तेजी से देशभर में पांव पसारे और उन डॉक्टरों का चयन किया जिन पर मरीजों को अटूट भरोसा रहता है। डॉक्टरों ने भी 'शोधÓ के नाम पर धड़ाधड़ रोगियों को प्रयोगशाला बनाना शुरू कर दिया। आईसीएमआर को इसकी भनक लगी तो अक्टूबर 2006 में 120 पेज की एक गाइडलाइन जारी की गई। इसका भी देशभर में जमकर उल्लंघन हुआ।

गाइडलाइन बनाने के बीच में ही आईसीएमआर ने बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल का खाका तैयार किया। इसे जनवरी 2006 में विधि विभाग के पास भेजा गया। वहां से इसे मंजूरी भी मिल गई, लेकिन इसके बाद से यह फाइलों में खो गया।

कानून के बगैर काबू संभव नहीं
आईसीएमआर निदेशक डॉ. वीएम कटोच ने 'पत्रिकाÓ से चर्चा में बताया जब तक कानून नहीं लाया जाएगा, ड्रग ट्रायल्स पर काबू पाना कठिन है। हम केवल गाइडलाइन जारी कर सकते हैं, उसके पालन करवाने को लेकर कोई तंत्र मौजूद नहीं है।

एमसीआई ने भी बदले नियम
आईसीएमआर की तरह ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भी ड्रग ट्रायल घपले की जानकारी मिल चुकी थी। यही वजह कि एमसीआई सचिव डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को पत्र लिखकर इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन की जानकारी दी थी। इसमें सभी डॉक्टरों से कहा गया था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। 

मप्र नर्सिंगहोम एक्ट भी अधूरा
मप्र सरकार ने 17 जनवरी 2007 से नर्सिंगहोम एक्ट लागू किया है। इसमें भी ड्रग ट्रायल को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं है। यही वजह है कि राज्य सरकार को अब तक यह पता नहीं है कि निजी अस्पतालों में कौन डॉक्टर किस मरीज पर किस दवा का प्रयोग कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में करीब 60 डॉक्टर ट्रायल में लिप्त हैं। सीएमएचओ डॉ. शरद पंडित ने बताया फिलहाल किसी भी अस्पताल की एथिकल कमेटी की जानकारी हमें नहीं है। यह मामला पहली बार प्रकाश में आया है। अब वरिष्ठ कार्यालय के ध्यान में लाया जाएगा। 


एक मरीज पर मिलते दो से पांच लाख
ड्रग ट्रायल के खेल में धन के प्रभाव को इसी से मापा जा सकता है कि अधिकांश कंपनियां ट्रायल करने वाले डॉक्टर को एक मरीज के एवज में दो से पांच लाख रुपए तक देती है। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही वर्ष 2008-09 में डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया को दमे के रोगियों पर मोमेटासोन और फॉरमेट्रोल नामक दवा को दो मरीजों पर इस्तेमाल करने पर 6 लाख 36 हजार रुपए मिले थे। डॉ. अपूर्व पुराणिक को डोनेपेझिजल एआर दवा के प्रयोग के लिए प्रति मरीज 1.10 लाख रुपए मिले।


उम्रकैद से कम नहीं

चिकित्सा क्षेत्र में तरक्की हो इसके लिए ड्रग ट्रायल की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इससे गुजरने वाले मरीजों के हितों की रक्षा कौन करेगा? उन डॉक्टरों पर निगरानी का तंत्र क्या हो, इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया था। देर से ही सही, कायदे-कानून की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल, सवाल विश्वास का है। वह विश्वास जो मरीज अपने डॉक्टर की आंख में देखता है, उसे भगवान मानता है। चंद डॉक्टरों की हरकतों से अगर समूचे चिकित्सा  जगत की साख संकट में पड़ जाए तो यह ठीक नहीं होगा। ड्रग ट्रायल से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच-पड़ताल में चौंकाने वाले और दु:खद पहलू सामने आए। सरकार की भी कलई खुल गई। निजी अस्पतालों की दूर उसे तो यह भी पता नहीं कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ड्रग ट्रायल के नाम पर मरीजों के साथ क्या हो रहा है। ऐसे हालात में आंख पर पट्टी बांधकर ड्रग ट्रायल की पैरोकारी करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि इस अराजकता से आखिर लाभ किसे है? इस तकनीकी विषय पर आम आदमी की कम जानकारी का धंधेबाजों ने जमकर फायदा उठाया है। राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी इस विषय में बहुत गंभीर नहीं दिखती। ट्रायल में धंधेबाजों की घुसपैठ को देखकर भारतीय चिकित्सा और अनुसंधान परिषद ने चार साल पहले कानून संशोधन सुझाए।   

विधि विभाग की अनुमति भी मिल गई, इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए आज तक सख्त कानून के लिए कोई संशोधन नहीं किया गया। यही वजह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा ड्रग ट्रायल भारत में हो रहे हैं। मप्र सरकार को ड्रग ट्रायल पर बेहद सख्त नियम कानून बनाने होंगे। दोषी डॉक्टर को उम्रकैद से कम का प्रावधान न हो। नियमों का उल्लंघन करने वाले की डिग्री छीनी जानी चाहिए।
News in PATRIKA ON 31th July 2010

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

हमें मरीज की जानकारी नहीं रहती

Justice PD Mulaye
  

ड्रग ट्रायल मामले में एथिकल कमेटी सदस्य जस्टिस मूले की साफगोई
स्वास्थ्य राज्य मंत्री हार्डिया ने गड़बड़ी की जिम्मेदारी कमेटी पर डाली


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों का एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले रोगियों पर धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के मामले में रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये की साफगोई से पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है। ट्रायल को मंजूरी देने वाली कॉलेज की एथिकल कमेटी के सदस्य मूल्ये ने कहा है कि हमें मरीजों की कोई जानकारी नहीं रहती है। रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज देखकर कमेटी केवल अनुमति देती है। इसके बाद डॉक्टर मरीजों के साथ क्या करते हैं, इसके लिए न तो कमेटी जिम्मेदार है और न ही वह इसकी निगरानी करती है।

बुधवार दोपहर भोपाल में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा कि इंदौर के मेडिकल कॉलेज की कमेटी में जस्टिस मूल्ये जैसे लोग शामिल हैं, इसलिए वहां हो रहे ट्रायल पर शंका नहीं की जा सकती है। इस बयान पर 'पत्रिकाÓ ने जस्टिस मूल्ये से विस्तार से चर्चा की।


ट्रेन का टिकट देते हैं, यात्रा की जानकारी नहीं

प्र- एथिकल कमेटी में आप क्या देखते हैं?
उ- हम संबंधित विभाग और कंपनी की अनुमति देखते हैं। इससे अधिक कुछ नहीं।
प्र- जिन शर्तों पर अनुमति देते हैं, उनका पालन कौन करवाता है?
उ- यह हमारा काम नहीं है। हम प्राथमिक अनुमति देते हैं। ट्रायल बाद में शुरू होता है। न तो हम अस्पताल जाते हैं और न ही उस क्लिनिक में जहां ट्रायल का काम चलता है।
प्र- आपको कितने रुपए मिलते हैं?
उ- एक बैठक के 1000 रुपए मिलते हैं। अब तक 12-13 बैठकों में गया हूं।
प्र- आपको नहीं लगता कि ट्रायल में पारदर्शिता बढ़ाई जाना चाहिए?
उ- उसका मुझे कुछ मालूम नहीं। यह काम कॉलेज का है। हम तो केवल कागज देखते हैं।
प्र- मरीजों के साथ क्या हो रहा है, इस पर आपकी कितनी नजर रहती है?
उ- हमारी कमेटी ट्रेन का टिकट देती है। इसके बाद यात्रा शुरू होती है। टिकट देने वाले को बाकी यात्रा की जानकारी नहीं रहती।
प्र- मंत्री हार्डिया कह रहे हैं, आप हैं तो ट्रायल में शंका नहीं की जा सकती?
उ- हम अनुमति देने तक सीमित हैं, इसके बाद क्या होता है, जानकारी नहीं रहती है।
(रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये से चर्चा)



कॉलेज के भीतर से उठे विरोध के स्वर

ड्रग ट्रायल के खुलासे के बाद कुछ डॉक्टरों ने पूरे मामले को ठंडा करने की कोशिश शुरू की, लेकिन इसका विपरीत प्रभाव हुआ। कॉलेज के भीतर से ही कुछ डॉक्टरों ने विरोध शुरू कर दिया है। ट्रायल के घेरे में आए डॉक्टर चाहते हैं कि पूरा कॉलेज उनका साथ दे, परंतु दूसरे सभी लोगों का कहना है जिसने गलती की है वह स्वयं अपनी लड़ाई लड़े।

'ड्रग ट्रायल मसले से पूरे कॉलेज की बदनामी हो रही है। हम चाहते हैं कि इस पूरे मामले को पूरे चिकित्सा जगत से जोड़कर नहीं देखा जाए। जिसने गलती की है, उसे सजा अवश्य मिलना चाहिए। साथ ही इस विषय से जुड़ी सभी भ्रांतियां भी दूर की जाना चाहिए।Ó
- विक्रांत भूरिया, अध्यक्ष, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन

'भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा ड्रग ट्रायल के लिए तय किए गए मापदंडों का एमजीएम मेडिकल कॉलेज में पालन नहीं हुआ है। बहुराष्टï्रीय कंपनियां भारत के लोगों को निशाना बना रही है और ताज्जुब की बात तो यह है कि केंद्र व राज्य सरकार ने इसके लिए कोई निगरानी तंत्र तक नहीं बनाया। मरीजों के हित में ट्रायल बंद किया जाना चाहिए।Ó
- डॉ. आनंद राय, अध्यक्ष, मप्र रेसीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन

'चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के लिए ड्रग ट्रायल अनिवार्य है, लेकिन देश में इसके संबंध में बने कानून पर पुनर्विचार करना चाहिए। कानून में कई कमियां है, इसी कारण ट्रायल का दुरुपयोग हो रहा है। अंग प्रत्यारोपण जैसा सख्त कानून लागू किया जाना चाहिए ताकि ट्रायल पर पूरा नियंत्रण रहे।Ó
- डॉ. सुमित शुक्ला, उपाध्यक्ष, मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन

'जिन डॉक्टरों पर मरीजों के दुरुपयोग का आरोप लगा है, उन्हें कॉलेज से दूर करके पूरे मामले की जांच की जाना चाहिए। डॉक्टरों पर आरोप सिद्ध न हो तो उन्हें फिर से कॉलेज बुलाया जा सकता है। फिलहाल वे रहे तो जांच प्रभावित हो सकती है क्योंकि वैसे ही ट्रायल मामले में पारदर्शिता की बेहद कमी है।Ó
- शिवाकांत वाजपेयी, अध्यक्ष, मप्र रेडियोग्राफर्स एसोसिएशन



विधानसभा में आज उठेगा मुद्दा
शुक्रवार को विधानसभा में 'पत्रिकाÓ द्वारा उठाए गए ड्रग ट्रायल के मुद्दे पर बहस होगी। रतलाम के विधायक पारस सकलेचा, सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल, इंदौर के सुदर्शन गुप्ता, मंदसौर के यशपालसिंह सिसौदिया समेत करीब सात विधायकों ने इस मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव दर्ज करवाया है।

News in PATRIKA on 30th July 2010

बुधवार, जुलाई 21, 2010

दवा आजमाइश के खेल में गुम रोगी

 बिगड़ी तबीयत दुरस्त करवाने के इरादे से डॉक्टर की शरण में जाने वाले रोगी खतरे में है। खतरा भी उस डॉक्टर से जिसे वह भगवान मान रहा है। डॉक्टर मरीज पर मरीज पर ऐसी दवा आजमाने की जल्दी में है, जो बाजार में आई ही नहीं। दवा बनाने वाली विदेशी कंपनी दवा आजमाईश (ड्रग ट्रायल) के एवज में डॉक्टर को मोटी रकम देती है। इस रकम के लालच में डॉक्टर मरीज को चूहा मानकर आजमाईश में जुट चुके हैं। यह काम सरकारी के साथ ही प्रायवेट अस्पतालों और क्लिनिकों में धड़ल्ले से चल रहा है। 


हिंदुस्तानियों को चूहा मानकर विदेशी कंपनियां ड्रग ट्रायल के नाम पर गुमनाम दवाइयों का प्रयोग करके देश के चंद डॉक्टरों की जेबें भर रही हैं, लेकिन केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों के पास इसका कोई लेखा-जोखा उपब्ध नहीं है। देशभर में ट्रायल करने वाले डॉक्टरों की न तो पड़ताल की गई और न ही इसके लिए कोई व्यवस्था बनी है, जबकि ये डॉक्टर देश के गरीब और अनपढ़ मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में ट्रायल का भारत में 1500 करोड़ का कारोबार जारी है, जो 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ तक पहुंच जाएगा। 

बात मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी और तेजी से मेडिकल हब के रूप में विकसित होते शहर इंदौर की करें तो पता चलता है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले मरीज यहां के डॉक्टरों की नजर में चूहे से ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। देशी-विदेशी दवा कंपनियों में निर्माणाधीन दवा और टीके मरीजों पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। कंपनियां डॉक्टरों को चुनती हैं और इसके बाद शुरू हो जाता है खेल। पांच वर्ष में ही छह डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के नाम पर 1170 बच्चों समेत 1521 मरीजों पर प्रयोग करके दो करोड़ का कारोबार किया। सूत्रों के मुताबिक, कई ऐसी दवाओं के प्रयोग भी हो रहे हैं जिन्हें भारत सरकार से अनुमति नहीं है। वैसे तो निगरानी के लिए एथिकल कमेटी (नैतिक समति) है, पर उसे दवाओं व कंपनियां के नाम की ही जानकारी दी जाती है। मरीज, राशि और हिसाब की जानकारी उसे कम ही होती है। कमेटी की अनदेखी का फायदा उठाकर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैनï ने ५६ लाख कमाए और ब्रोंकाइटिस, पोलियो, बीपी, हेपेटाइटिस बी, टिटनेस से पीडि़त बच्चों पर प्रयोग कर दिए। दिल के रोगी मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, न्यूरोलॉजी से पीडि़त डॉ. अपूर्व पुराणिक, दमे के रोगी डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. संजय अवासिया व डॉ. सलिल भार्गव, आंखों का मर्ज लेकर आए डॉ. पुष्पा वर्मा और हड्डी चटकने के कारण अस्पताल पहुंचे डॉ. प्रदीप भार्गव के लिए कमाई का जरिया बने। सभी ने दवा आजमाई और लाखों रुपए जुटा लिए। यही हाल निजी अस्पतालों का भी है। टोटल, सीएचएल अपोलो, चोइथराम, चरक, ग्रेटर कैलाश जैसे अस्पतालों में यह धंधा जोरों पर है। कुछ मनोचिकित्सक तो अपने क्लिनिक से यह काम चला रहे हैं।

लगभग ऐसा ही दृश्य दूसरे शहरों और राज्यों का भी है। दरअसल, विदेशी कंपनियों ने क्विंटल और बायोटेक जैसी स्पांसर एजेंसियों के जरिए तीन वर्ष में पूरे देश में नेटवर्क फैला लिया है। केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं देश में चारों चरणों तक के ट्रायल चलते हैं। सभी जानलेवा हैं, लेकिन फेज वन और टू अधिक खतरनाक हैं। वर्ष 2009 में ही फेज वन की 33 और फेज टू की 53 ट्रायल हुई हैं। सबसे अधिक कारोबार महाराष्टï्र में हो रहा है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश दूसरे-तीसरे स्थान पर हैं। शहरों में बैंगलूरु सबसे आगे है। पूणे और मुंबई इसके बाद आते हैं। इन शहरों में बड़े पैमाने पर ड्रग ट्रायल किए जाते हैं। विदेशी कंपनियों ने मप्र में इंदौर और राजस्थान में जयपुर को गढ़ बनाया है। वर्ष 2006 से 2009 तक इंदौर में क्रमश: तीन, दो, 13 और 38 ट्रायल हुए हैं, जबकि जयपुर में तीन, 11, 36 और 70 ट्रायल हुए हैं। 

वैसे, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने मरीजों का दवा आजमाइश से बचाने के लिए 2006 में गाइडलाइन बनाई थी। इसमें जिक्र था कि जिस मरीज पर दवा का प्रयोग शुरू होगा, उसे पूरी जानकारी दी जाएगी। यह भी बताया जाएगा कि दवा के विपरीत प्रभाव से उसकी जान भी जा सकती है। अफसोस इस गाइडलाइन का रत्तीभर भी पालन देश में नहीं हो रहा है। राशि ही इतनी मोटी मिलती है कि डॉक्टर बगैर सोचे-समझे प्रयोग करना शुरू कर देता है। केंद्र सरकार द्वारा गठित क्लिनिकल ट्राइल्स रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) में रजिस्ट्रेशन करवाने और दवा कंपनी की मदद के लिए बनाई जाने वाली एथिकल कमेटी से अनुमति लेने के बाद डॉक्टर धड़ाधड़ प्रयोग शुरू कर देता है। उसे किसी का डर भी नहीं है, क्योंकि उसकी निगरानी का न तो राज्यों ने और न ही केंद्र ने कोई इंतजाम किया है। मप्र के ड्रग कंट्रोलर राकेश श्रीवास्तव कहते हैं कि उन्हें न तो ट्रायल की जानकारी है और न ही इससे प्रभावित होने वाले मरीजों की। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया तो पूछते हैं यह ड्रग ट्रायल क्या होता है?  सीटीआरआई की उप संचालक डॉ. आभा अग्रवाल का व्यक्तव्य भी चौंकाता है। वे कहती हैं ट्रायल के लिए रजिस्ट्रेशन करना हमारा काम होता है। इसके बाद हम निगरानी नहीं करते हैं। ट्रायल के लिए एथिकल कमेटियां सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। कितनी राशि आती है और कैसे डॉक्टर को मिलती है, इसकी कोई जानकारी नहीं। यह भी पता नहीं है कि दवा आजमाइश से मरीज पर क्या असर होता है।

डॉक्टर इस बात को जानते हैं कि ट्रायल जानलेवा होती हैं, लेकिन वे इसे हमेशा से ही छुपाते रहे हैं। मौतों की आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। जन स्वास्थ्य अभियान जैसे कुछ संगठनों ने अपने स्त्रोतों से जो जानकारी जुटाई है, वह चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक देशभर में वर्ष 2007 में 132, 2008 में 229 और 2009 में 308 लोगों की ट्रायल के दौरान मौत हुई है।

दवा आजमाइश के इस खेल में सबसे बड़ा सवाल मानव के जीवन जीने के अधिकार का है। कुछ डॉक्टर उसका यह हक छीन रहे हैं और मनुष्य को इसका पता भी नहीं चलता। रुपए के खातिर शुरू हुआ यह खेल समय रहते रुकना चाहिए। बेहद जरूरी है कि भारत सरकार अपने नागरिकों को दलाल रूपी डॉक्टरों से बचाने के लिए सख्त कानून बनाए। वर्ष 2005 की तरह ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन करने से हल नहीं निकलेगा क्योंकि उस संशोधन के बाद तो ट्रायल को बढ़ावा मिला।