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शुक्रवार, अक्टूबर 01, 2010

ड्रग ट्रायल पर सितम्बर में लिखी ६ खबरें

ड्रग ट्रायल की फाइल पहुंची सोनिया दरबार

- दिल्ली में विधिवत कार्रवाई शुरू
- शिकायतकर्ता ने उठाई सीबीआई जांच की मांग


बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) में मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बरती गई कौताही की पूरी फाइल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पहुंच गई है। उन्होंने इस पर विधिवत कार्रवाई भी शुरू कर दी है। शिकायतकर्ता ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है।

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे ने सोनिया गांधी को शिकायत भेज कर तमाम तथ्य उजागर किए थे। उन्हें सोमवार को कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद का एक पत्र मिला है। इसमें लिखा गया है कि मामले को सोनिया गांधी ने अत्यंत गंभीरता से लिया है और उन्होंने संबंधित पक्ष को कार्रवाई करने और इसकी जानकारी देने को कहा है।

दोषियों के बचाव में है राज्य सरकार
डॉ. राजे का आरोप है कि देश-दुनिया में जो मसला उठ चुका है, उसपर ठोस कार्रवाई करने के बजाए राज्य सरकार दोषियों को बचाने में लगी है। करीब दो महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक ईओडब्ल्यू ने अंतिम रिपोर्ट तैयार नहीं की है। इतना ही नहीं, विधानसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने जो कमेटी गठित करने की घोषणा की थी, उसकी अभी तक बैठक भी नहीं हुई है।

अमेरिकन सरकार भी मांग चुकी सफाई
'पत्रिकाÓ ने 14 जुलाई के अंक में 'मरीज को बना दिया चूहाÓ शीर्षक से खबर प्रकाशित कर खुलासा किया था कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में आने वाले गरीब और अनपढ़ मरीजों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके बाद मामला विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, आयकर, एमसीआई, आईसीएमआर तक पहुंचा। हाल ही में अमेरिकन सरकार के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने भी भारत सरकार को इस संबंध में पत्र लिखकर सफाई मांगी है।

यह किया उल्लंघन
- एमसीआई द्वारा तय की गई डॉक्टरों की 'मर्यादाओंÓ को लांघा।
- आईसीएमआर के मापदंडों का ताक में रखा।
- मरीजों को धोखे में रखकर ट्रायल में झोंका।
पत्रिका : २८ सितम्बर २०१०

भारतीय मरीज का डीएनए विदेश किसकी अनुमति से भेजा?

- ड्रग ट्रायल के लिए खून के नमूनों की विदेश यात्रा पर उठा सवाल
- आईसीएमआर ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को भेजा पत्र



बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को एक पत्र लिखा है। परिषद जानना चाहती है कि जिन भारतीय रोगियों पर ट्रायल किया गया है, उनके खून के नमूने किसकी इजाजत से विदेश भेजे गए? क्या इसमें नियमों का पालन हुआ है?

कॉलेज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया जिन डॉक्टरों ने ट्रायल किए है, उन्हें आईसीएमआर के पत्र के आधार पर जवाब-तलब किया जा रहा है। यह मसला बायोलॉजिकल प्रोडक्ट कानून से जुड़ा हुआ है। अभी तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया था। माना जा रहा है यह कॉलेज प्रबंधन और पूरे विभाग के लिए नई मुसीबत का कारण बनेगा। उधर, ट्रायल में लिप्त एक डॉक्टर ने 'पत्रिकाÓ को बताया जो दवा कंपनी ट्रायल करवाती है, वह अपनी उ'च क्षमता लेबोरेटरी में नमूनों को परखना चाहती है, यही वजह है कि नमूने विदेश भेजे जाते हैं। उन नमूनों का और क्या इस्तेमाल होता होगा, यह किसी को अंदाजा नहीं है।

आरटीआई से जुड़ा मसला
दरअसल, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता रोली शिवहरे ने आईसीएमआर से सवाल पूछा था कि ट्रायल से गुजर रहे मरीजों के खून, मूत्र, स्वाब आदि के नमूने जांच के लिए विदेश भेजे जाते हैं। इसकी अनुमति ली गई है या नहीं? यदि हां, तो किस कानून के तहत? इन सवालों के जवाब जब आईसीएमआर को नहीं मिले, तो उन्होंने मध्यप्रदेश स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभागों को पत्र लिखकर जानकारी चाही है।



पत्रिका : २६ सितम्बर २०१०
 

फिर से भेजो ड्रग ट्रायल के दस्तावेज

- यूएसएफडीए के संज्ञान के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग का मेडिकल कॉलेज को फरमान

यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा मध्यप्रदेश में हुए ड्रग ट्रायल पर संज्ञान लिए जाने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने नए सिरे से पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेजों से फिर से वे दस्तावेज भोपाल बुलवाए हैं, जिनमें ड्रग ट्रायल की जानकारी छुपी है। कॉलेज में इसको लेकर भारी गहमागहमी बनी हुई है।

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। विभागीय सूत्रों का कहना है पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर ली गई थी, परंतु अब दृश्य बदल गया है। विभाग ने विधानसभा सवालों के जवाब के लिए तैयार दस्तावेजों को एक बार फिर से खंगालना शुरू किया है।

पत्रिका : २२ सितम्बर २०१०

काले कारनामों पर पोत दी कालिख

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज में सूचना का अधिकार का माखौल
- कालिख पोत को जानकारी देने का संभवत: देश का पहला मामला


एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने सूचना का अधिकार कानून का माखौल उड़ाते हुए एकाउंट से जुड़े एक दस्तावेज पर जानबूझकर कालिख पोत दी। आवेदक को यह जानकारी देते हुए कालिख पोतने का जिक्र भी प्रबंधन ने किया है। सूचना का अधिकार का इस तरह से मजाक बनाने की संभवत: यह देश का पहला मामला है।

मामला बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाओं के मरीज पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से जुड़ा है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के सदस्य डॉ. आनंद राय ने कॉलेज के विभिन्न विभागों को ट्रायल के लिए मिले रुपए की ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी। मेडिसिन विभाग ने वर्ष 2010 की ऑडिट रिपोर्ट तो दी लेकिन कई महत्वपूर्ण आंकड़ों पर कालिख पोत दी। ऑडिट रिपोर्ट सरिता मूंदड़ा ने तैयार की है। मूंदड़ा के पते और फोन नंबर पर भी कालिख पोती गई है। साथ ही कवरिंग पत्र में यह भी लिख दिया कि आवेदन द्वारा चाही गई जानकारी से यह संबंधित नहीं है, इसलिए इस पर काले रंग का प्रयोग करके इसे अपठनीय बनाया गया है। उधर, आवेदक का कहना है मैंने संपूर्ण ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी, इसलिए उसका सीधा-सीधा मेरे आवेदन से संबंध है। ट्रायल के नाम पर हुए हेरफेर को छुपाने के लिए यह कार्रवाई की है। इसके विरूद्ध मैं संचालक चिकित्सा शिक्षा को अपील कर रहा हूं।

साढ़े 13 लाख का हिसाब छुपाया
ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट है कि 31 मार्च 2010 तक मेडिसिन विभाग की साइंटिफिक कमेटी के खाते में 13.47 लाख रुपए आए हैं। कालिख से यह छुपा लिया गया है कि यह किन लोगों में बंटा।



जानकारी छुपाने वाले विभाग पर गंभीर आरोप

मेडिसिन विभाग के डॉ. अनिल भराणी, डॉ. आशीष पटेल, पूर्व एचओडी डॉ. अशोक वाजपेयी पर गंभीर आरोप है कि इन्होंने राज्य सरकार को जानकारी दिए बगैर ट्रायल करके अकूत संपत्ति जुटाई है। डॉ. भराणी और डॉ. पटेल ने तो एक ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी बताने तक का खेल कर दिया है।

'संभवत: यह देश का पहला मामला है, जब जानकारी पर कालीख पोती गई है। नि:संदेह जानकारी छुपाने की कोशिश के चलते यह कदम उठाया होगा। वही जानकारी छुपाई जा सकती है, जिससे शांति भंग होने या देश की गोपनीयता को खतरा हो। हम इसे राष्टï्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाएंगे।
- रोली शिवहरे, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

'आवेदक को इसके विरूद्ध अपील करना चाहिए। साथ ही जिस दस्तावेज पर कालिख पोती गई है, उसके लिए फिर से आवेदन लगाना चाहिए।
- गौतम कोठारी, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

चौतरफा घिरे ड्रग ट्रायल वाले डॉक्टर

- विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग, एमसीआई, आयकर के साथ ही यूएसएफडीए ने लिया संज्ञान

बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा का मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) करने वाले एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर चौतरफा घिर गए हैं। लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो, मानवाधिकार आयोग, आयकर और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ ही यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (यूएसएफडीए) ने इसे बेहद गंभीर मानकर जांच शुरू कर दी है। यूएसएफडीए ने इस संबंध में भारत सरकार को पत्र भेजा है। 

'पत्रिकाÓ ने ही ड्रग ट्रायल का खुलासा करके बताया था कि कॉलेज से जुड़े एमवाय अस्पताल और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में आने वाले रोगियों को अंधेरे में रखकर ट्रायल किए जा रहे हैं। इसके बाद मामला विधानसभा पहुंचा और मध्यप्रदेश सरकार ने कानूनी बंदिश के लिए एक कमेटी का गठन किया। चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुïख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनी यह कमेटी ट्रायल को नियंत्रित  करने के लिए केंद्र सरकार और दूसरे राज्यों के कानूनी प्रावधानों की पड़ताल कर रही है।

 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव
ड्रग ट्रायल से रा'य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज ले रहे थे। यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उजागर हुई है। सरकार ने विधानसभा को बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 ब'चे और 721 वयस्क हैं। जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुए हैं, उनके नाम अभी जाहिर नहीं किए गए हैं। आशंका है कि इनमें से कुछ की मौत हो चुकी है।

मरीज की सेहत और डॉक्टर के एकाउंट पर नजर

यूएसएफडीए
'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद रशिया टीवी ने एमवाय अस्पताल में ट्रायल को लेकर एक खबर अंतरराष्टï्रीय स्तर पर प्रसारित की थी। रिपोर्ट में जिक्र था कि अमेरिकन कंपनियों की शह पर यहां गरीब मरीजों पर प्रयोग हो रहे हैं। इसी पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश में हुए ट्रायल का विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

विधानसभा
विधायक पारस सकलेचा, प्रताप ग्रेवाल और प्रद्युम तोमर ने विधानसभा में पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो रहे ट्रायल को लेकर जो सवाल पूछे थे। उनके जवाब आज तक  सरकार ने नहीं दिए हैं। मानसून सत्र में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने कहा था ट्रायल को काबू करने के लिए सरकार कानून बनाना चाहती है।

ईओडब्ल्यू
स्वास्थ्य सेवा समर्पण सेवा समिति अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर भोपाल ईओडब्ल्यू ने डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. हेमंत जैन और डॉ. पुष्पा वर्मा के खिलाफ जांच शुरू कर रखी है। सभी डॉक्टरों के एकाउंट की जांच जारी है।

लोकायुक्त
ट्रायल करने वाले डॉक्टरों, एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और एथिकल कमेटी के सदस्यों के खिलाफ लोकायुक्त में भी शिकायत हो चुकी है। आरोप है कि सभी ने मिलकर गरीब और अनपढ़ मरीजों की जान जोखिम में डाली है। लोकायुक्त ने शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता को 14 अक्टूबर को भोपाल बुलाया है।

मानवाधिकार आयोग
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों पर संज्ञान लेकर  मप्र मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस डीएम धर्माधिकारी, सदस्य जस्टिस एके सक्सेना व जस्टिस वीके शुक्ल ने एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को नोटिस भेजा है। आयोग जानना चाहता है कि मरीजों के अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा।

आयकर
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर आयकर विभाग ने मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से उन सभी डॉक्टरों की आय का ब्यौरा मांगा है, जो ट्रायल में लिप्त हैं। विभाग की जिज्ञासा इसमें है कि कहीं डॉक्टरों ने बेनामी संपत्ति तो नहीं जुटा ली। 

एमसीआई

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को जो शिकायत भेजी गई थी, उसी पर मप्र के चिकित्सा शिक्षा संचालक से पूरा ब्यौरा मांगा गया है। सभी मेडिकल कॉलेज इसका जवाब तैयार कर रहे हैं। 'पत्रिकाÓ पूर्व में ही यह जानकारी प्रकाशित कर चुका है।



पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

ड्रग ट्रायल का एक ओर कागज ईओडब्ल्यू पहुंचा

मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल द्वारा एक ड्रग ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी पहुंचाने का दस्तावेज भी ईओडब्ल्यू पहुंच गया है। वहां इसे जांच में भी लिया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू इसे गंभीर आर्थिक अपराध मान रहा है, क्योंकि कॉलेज को कंपनी बताने की जानकारी कॉलेज प्रबंधन को नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने ही इसका खुलासा किया है।


एसबीआई सुने चार अफसरों का केस
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के चार अधिकारियों की याचिका का हाईकोर्ट ने निराकरण कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया है कि चूंकि अब इंदौर बैंक का विलय स्टेट ऑफ इंडिया में हो चुका है, इसलिए उनकी बात वहीं सुनी जाना चाहिए। चारों अधिकारियों का इंदौर बैंक ने तबादला कर दिया था। इसे ही चुनौती देने के लिए वे हाईकोर्ट गए थे। सिंगल बैंच ने इसे खारिज कर दिया था और मामला युगलपीठ में लंबित था।


 
पत्रिका : ०३ सितम्बर २०१०

शुक्रवार, सितंबर 03, 2010

व्हिसल ब्लोअर के पक्ष में उतरे मेडिकल छात्र

जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल उकसाने के आरोप में बर्खास्त किए गए एमजीएम मेडिकल कॉलेज के सीनियर रेसीडेंट डॉ. आनंद राय के पक्ष में 73 मेडिकल छात्र सामने आ गए हैं। ये सभी 2005 से 2007 की एमबीबीएस बेच के छात्र हैं। छात्रों ने डॉ. राय की बर्खास्तगी का कारण उनका व्हिसल ब्लोअर (भ्रष्टाचार सचेतक) होना बताया है।

छात्रों ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन को एक पत्र लिखा है। इसके मुताबिक डॉ. राय पर की गई कार्रवाई पूर्वाग्रह से ग्रसित है। उन्होंने व्यवस्था में रहकर कुछ डॉक्टरों द्वारा ड्रग ट्रायल के जरिए मरीजों के साथ हो रहे धोखे का खुलासा किया है, इसीलिए बाहर किया गया। छात्रों ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि कॉलेज काउंसिल की जिस बैठक में डॉ. राय को बाहर करने का निर्णय लिया है, उसमें 38 में से 16 सदस्य ही इसमें शामिल थे, जो कि कोरम का अभाव है। छात्रों ने डॉ. राय का निलंबन समाप्त करने की मांग की है।

हाईकोर्ट ने कॉलेज को दी पोस्ट भरने की छूट
डॉ. आनंद राय द्वारा दायर याचिका पर बुधवार को इंदौर हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को छूट दे दी कि वह नेत्र रोग विभाग में सीनियर रेसीडेंट के रिक्त पद को भर ले। पिछली सुनवाई में जस्टिस एससी शर्मा ने पद भरने पर रोक लगाई थी। शासकीय अधिवक्ता विवेक पटवा ने बताया कोर्ट ने पद भरने का आदेश देते हुए केस में अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद रखी है। उधर, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन 30 अगस्त को ही पद पर भर्ती के लिए साक्षात्कार ले चुका है। संभावना है कि शुक्रवार को पद भर लिया जाएगा। 

पत्रिका : ०२ सितम्बर २०१० 

ड्रग ट्रायल में सुस्ती का संक्रमण

- चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में कमेटी ही बना सका


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) के मामले में चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में महज एक कमेटी का गठन ही किया है। न तो इस कमेटी की बैठक हुई है और न ही अब तक किसी दूसरे राज्य के कानूनों का अध्ययन ही किया गया।
चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने 30 जुलाई को विधानसभा में तीन सदस्यों की कमेटी बनाकर राज्य में ड्रटग ट्रायल पर कानूनी बंदिश लगाने की घोषणा की थी। विभाग के प्रमुख सचिव और कमेटी चेयरमैन आईएस दाणी ने बुधवार को बताया कि कमेटी तीन के बजाए पांच सदस्यों की बनाई गई है। इसमें विधि विभाग के प्रमुख सचिव पीसी मीणा के साथ ही संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल और भोपाल के डॉ. एनआर भंडारी सदस्य हैं।


बंदिश नहीं होने से मरीजों की जान सांसत में
अभी तक राज्य में ड्रग ट्रायल की निगरानी की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। यही वजह है कि पिछले पांच वर्षों में बहुराष्टï्रीय कंपनियों ने राज्य के प्रतिष्ठित डॉक्टरों के जरिए मरीजों पर धड़ल्ले से दवाओं के ट्रायल किए। सरकारी के साथ ही निजी क्षेत्रों में अंधाधुंध ट्रायल हो रहे हैं। पांच वर्ष में मप्र के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हुए ट्रायल से ही 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव हुआ। इनमें से कुछ की मौत की भी आशंका है। विधायक पारस सकलेचा और प्रताप ग्रेवाल ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. हेमंत जैन, डॉ. सलिल भार्गव और डॉ. अशोक वाजपेयी की जांच कर रहा है।

पत्रिका: 02 सितंबर 2010


ड्रग ट्रायल का एक ओर कागज ईओडब्ल्यू पहुंचा
मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल द्वारा एक ड्रग ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी पहुंचाने का दस्तावेज भी ईओडब्ल्यू पहुंच गया है। वहां इसे जांच में भी लिया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू इसे गंभीर आर्थिक अपराध मान रहा है, क्योंकि कॉलेज को कंपनी बताने की जानकारी कॉलेज प्रबंधन को नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने ही इसका खुलासा किया है।

पत्रिका: 0३ सितंबर 2010

मंगलवार, अगस्त 31, 2010

ड्रग ट्रायल के लिए मेडिकल कॉलेज को बता दिया स्पांसर कंपनी

एमवाय अस्पताल में हायरपरटेंशन के रोगियों पर हो रहा प्रयोग


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) के लिए एमवाय अस्पताल के दो डॉक्टरों ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी बना दिया। ये डॉक्टर किसी दवा कंपनी के लिए अस्पताल में आने वाले हायपर टेंशन के रोगियों पर टेडलाफिल नामक दवा का प्रयोग कर रहे हैं। कान खड़े करने वाला तथ्य यह है कि कॉलेज को पता ही नहीं है कि उसे स्पांसर बना दिया गया है।

मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल ने 1 जुलाई 2010 को केंद्र सरकार के क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) में प्लोमोनरी हायपर टेंशन के 60 मरीजों पर प्रयोग के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया। डॉ. भराणी प्रमुख जबकि डॉ. पटेल सहयोगी इन्वेस्टिगेटर हैं। दोनों डॉक्टर रोगियों को टेडलाफिल नाम की दवा देकर उसका असर जांच रहे हैं।

किसके पास रहेंगे वित्तीय अधिकार?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्पांसर व्यक्ति या संस्था ट्रायल पर होने वाले समस्त खर्च के लिए जवाबदेह होती है। ट्रायल के बाद दवा को बाजार में उतारने के पहले उसके वित्तीय अधिकार स्पांसर कंपनी ही बेचती है। दवा उत्पाद से जुड़े जानकारों के मुताबिक आम तौर पर किसी दवा के अधिकार करोड़ों में बेचे जाते हैं। अहम सवाल यही है कि इस ट्रायल के नतीजों के वित्तीय अधिकार किसके पास रहेंगें और उन्हें कौन बेचेगा?

आर्थिक अपराध की श्रेणी में शामिल
किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने संस्थान को कंपनी की तौर पर पेश करके कहीं से रुपए कमाना आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है। सरकार यदि मामले की तह तक जाए, तो यह बड़ी आर्थिक गड़बड़ी साबित होगा।


सूचना का अधिकार में भी नहीं दे रहे जानकारी
इस संबंध में संबंधित डॉक्टरों ने चर्चा करना चाही तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया। डॉ. पटेल चाहते थे कि इस संबंध में कोई भी जानकारी लिखित में ही दी जा सकती है। 'पत्रिकाÓ ने सूचना का अधिकार का इस्तेमाल किया गया, तो मेडिसिन विभाग ने लिखित में दिया कि गोपनीयता की शर्त के कारण यह जानकारी नहीं दी जा सकती है।


मर्ज और दवा दोनों ही खतरनाक

मर्ज: रूक जाती है फेफड़े की रक्तवाहिनी
दिल से खून को पूरे शरीर में ले जाने वाली रक्त नलिकाएं पल्मोनरी वैसल्स (धमनियां) कहलाती हैं। फेफड़ों में मौजूद धमनियों में जब रूकावट आती है तो ब्लड प्रेशर बढ़ता है और दिल के दाएं हिस्से में तेज दर्द उठता है। कभी कभी इसे दिल की धड़कन हमेशा के लिए रूक जाती है। इसे ही प्लमोनरी हायरपर टेंशन (पीएचटी) कहते हैं।

दवा: नपुंसक बना सकती है टेडलाफिल 
- पुरुष जननांग छह घंटे तक उत्तेजित अवस्था में आ सकता है। इससे ताजिंदगी नपुंसक होने का खतरा भी रहता है।
- 0.1 प्रतिशत मरीजों में रंग पहचानने की शक्ति समाप्त हो जाती है। वे नीले-हरे रंग में अंतर नहीं कर पाते। 
- चेहरे पर सूजन, शरीर में झुनझुनी, थकान और दर्द हो सकता है।
- ब्लड प्रेशर में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव, अचानक हार्ट अटैक, बेहोशी, सांस की गति बढऩा भी संभव है।
- पांच प्रतिशत रोगियों में अत्यधिक पीठ या कमर का दर्द होता है। 


मैं कुछ नहीं बता सकता
क्या आप टेडलाफिल के ड्रग ट्रायल की जानकारी देंगे?
मौखिक कुछ नहीं दूंगा, लिखित में मांगे।
परंतु सीटीआरआई ने तो आपको जनता के सवालों का जवाब देने के लिए जिम्मेदार बताया है?
वह सही है, लेकिन मैं आपको मौखिक कुछ नहीं बता सकता।
मुझे सिर्फ इतना बता दें कि क्या ट्रायल के लिए कॉलेज को स्पांसर बनाया गया है?
कहना, मैं आपको कुछ नहीं बता सकता।
(डॉ. आशीष पटेल से  चर्चा)

'किसी को तो बताना ही था स्पांसरÓ 
टेडलाफिल दवा के ट्रायल में मेडिकल कॉलेज को स्पांसर क्यों बनाया गया?
सीटीआरआई में किसी को स्पांसर बताना जरूरी था, इसलिए ऐसा कर दिया।
इसमें वित्तीय मदद कहां से मिल रही है?
उसकी जरूरत ही नहीं है। दूसरे ट्रायल चल रहे हैं, तो यह भी साथ में हो रहा है। इससे जूनियर्स को सीखने को मिलेगा।
वित्तीय अधिकार किसे बेचे जाएंगे?
इसकी कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एक कंपनी ने कहा और हम ट्रायल कर रहे हैं, इसमें वित्तीय अधिकार की बात ही कहां आई?
(डॉ. अनिल भराणी से चर्चा)


मुझे इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। मैं इसकी जांच करूंगा और फिर ही कोई कोई टिप्पणी कर सकूंगा।
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

पत्रिका: ३० अगस्त २०१० 

बुधवार, अगस्त 25, 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला

Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।

सोमवार, अगस्त 23, 2010

व्हिसल ब्लोअर की सफाई ?

चिन्मय मिश्र 
 
ये  किस तरह का समय है, जब पेड़ों के बारे में बात करना लगभग अपराध है।

मध्यप्रदेश में चल रही जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल की आड़ में डॉ. आनंद राय की बर्खास्तगी उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए चेतावनी है, जो प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। डॉ. राय ने इंदौर के महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय व महाराजा यशवन्त राव अस्पताल में बिना अनुमति के बहुराष्ट्रीय दवाई कंपनियों के लिए किए जा रहे ड्रग ट्रायल का पर्दाफाश किया था। उनकी बर्खास्तगी के आदेश को मीडिया के लिए भी एक चेतावनी माना जा सकता है। क्योंकि डॉ. राय द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन को अंतत: मीडिया ने ही व्यापक समाज तक पहुंचाया था। इसलिए यह आदेश मीडिया को भी उसकी हैसियत बताने का तरीका है कि वे भले ही समाज हित के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दें, लेकिन प्रशासन वही करेगा जो कि उसके स्वयं के हित में है।

इस आदेश का अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हड़ताल की वजह से जहां अन्य जूनियर डॉक्टर्स को 15 दिनों के लिए निलंबित किया गया है, वहीं डॉ. राय के अनुसार उन्होंने हड़ताल की अवधि में भी ओपीडी और इमरजेंसी विभाग में अपनी सेवाएं दी थी। इसके बावजूद सूत्रों का कहना है कि उन्हें 'बेहतरीÓ के लिए बर्खास्त किया गया है। सवाल उठता है कि यह किसकी बेहतरी के लिए किया गया है? हड़ताल के दौरान भी अपना काम करना क्या 'बेहतरी  की श्रेणी में नहीं आता? दरअसल बात बहुत दूर तक जा रही है। एक ओर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली तो चर्चा में थी ही, वहीं दूसरी ओर मई में प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा चार बहुराष्ट्रीय दवाई कंपनियों  नोवारिटस, बीएमएस, इलिलिली और फाइजर के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ बैठक में भारतीय दवाई निर्माताओं का मानना है कि देश में निर्मित 'जेनेरिकÓ दवाइयों के कारण भारत व तीसरी दुनिया के देशों और कुछ हद तक विकसित देशों में भी दवाई की कीमतें काबू में रहती हैं। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात मान ली जाती है, तो आम आदमी को जीवनरक्षक दवाइयों के लिए काफी अधिक मूल्य देना होगा।

इसी दौरान मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर के लिए सरकारी तौर पर चंदा इकठ्ठा  करना भी गंभीर मामला है। कहा जा रहा है कि पिछले वर्ष तत्कालीन कलेक्टर ने 'मनोकामना अभिषेक योजना के माध्यम से 4.5 करोड़ रुपये इकठ्ठा किए थे और इस बार तो जिलेभर में  मनोकामना अभिषेक वर्ष २०१० समारोहित कर पांच करोड़ रुपये इकठ्ठा करने की योजना है। इस हेतु सरकारी अधिकारियों को नोडल ऑफिसर नियुक्त कर दिया गया है और रसीद कट्टे छपवाकर 'टारगेटÓ तय कर वितरित कर दिए गए हैं।

सरसरी तौर पर देखने में उक्त दोनों मामलों में कोई समानता नजर नहीं आएगी, परन्तु गहराई से देखने पर समझ में आता है कि दोनों मामलों में शासन-प्रशासन अपनी तरह से मूल्य व मानक तय कर रहा है। 'व्हिसल ब्लोअरÓ बिल को अभी कैबिनेट से ही सहमति मिली है, अतएव प्रशासन में रहकर भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की अभी खैर नहीं है। इस अधिनियम के अभाव में सूचना का अधिकार कानून को लेकर अमित जेठवा जैसे भ्रष्टाचार उजागर करने वालों का हश्र हम देख चुके हैं।

सरकारें भी चाहती हैं कि व्हिसल ब्लोअर अधिनियम पारित होने से पहले जितनी 'सफाईÓ संभव हो कर ली जाए परन्तु यह विध्वंसकारी परिपाटी है जिससे सार्वजनिक क्षेत्र को बचाया जाना चाहिए। दहशत फैलाने की कोशिशों के समक्ष चुप बैठना भी समझदारी नहीं है।


चिन्मय मिश्र  सामाजिक कार्यकर्ता  हैं.
पत्रिका : २३ अगस्त २०१०

शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

ड्रग ट्रायल से 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट

- विधानसभा के दस्तावेज में मंत्री ने मंजूर की सच्चाई

बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज के लिए गए थे।

यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उपलब्ध है। चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने विधानसभा में यह जानकारी दी थी। उन्होंने यह भी बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 बच्चे और 721 वयस्क हैं।

कुछ की मौत की आशंका
आशंका है कि जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुआ है, उनमें से कुछ की मौत भी हुई होगी। वैसे भी, सूचना का अधिकार में प्राप्त एक दस्तावेज में जबलपुर के कैंसर अस्पताल में एक महिला रोगी की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इंदौर के चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैन ने भी मंजूर किया है कि ट्रायल के दौरान एक बच्चे की मौत हुई थी और इसकी जानकारी एथिकल कमेटी को दे दी गई थी।

सूची का वादा किया था, पर नहीं दी
रतलाम के विधायक पारस सकलेचा ने बताया 30 जुलाई को ट्रायल के मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बहस के आखिर में चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री ने वादा किया था कि सभी मरीजों की सूची दी जाएगी, किंतु अब तक यह प्राप्त नहीं हुई है। इसके लिए चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी से भी चर्चा की है। 

पत्रिका: १९ अगस्त २०१० 

सोमवार, अगस्त 02, 2010

कौन सच्चा अमेरिका या भारत ?

अमेरिका की कंपनियों के इंदौर में 99 ट्रायल हुए, लेकिन भारत सरकार को 56 की ही जानकारी


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का इंसानों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भारत सरकार के आंकड़े कटघरे में हैं। ट्रायल का रजिस्ट्रेशन करने वाली भारत की सरकारी संस्था क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया और अमेरिका के राष्टरीय स्वास्थ्य संस्थान के आंकड़ों में भारी अंतर है। भारत सरकार को जानकारी है कि इंदौर में अब तक 56 ट्रायल हुए हैं, जबकि अमेरिका सरकार कहती है इंदौर में 99 ट्रायल हुए हैं। इसके अलावा दूसरे देश भी हैं, जहां की विकसित दवाइयां इंदौर में परखी गई हैं।

अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ नाम का सरकारी विभाग है। इसकी वेबसाइट पर दर्ज है कि अमेरिका की कंपनियों से भारत में 1432 ट्रायल किए हैं। इनमें से 176 जयपुर में और 47 भोपाल में हुए हैं। इधर, भारत के सीटीआरआई की वेबसाइट बताती है जयपुर में 121 ट्रायल हुए हैं, जबकि भोपाल की कोई जानकारी ही उपलब्ध नहीं है। दोनों ही वेबसाइट 2 अगस्त तक अपडेटेड हैं। 

निगरानी तंत्र नहीं होने का नतीजा
इस नई जानकारी से यह बात साफ होती है कि ट्रायल रुपए हासिल करने के खातिर ही हो रही है, न कि शोध के लिए। कई कंपनियां भारत सरकार को बगैर जानकारी दिए ट्रायल करवा रही हैं। चूंकि ट्रायल की निगरानी का तंत्र ही देश में मौजूद नहीं है, इसलिए कई कंपनियां जमकर लोगों को शिकार बना रही हैं।



ईओडब्ल्यू की जांच इंदौर पहुंची
ड्रग ट्रायल में शामिल सात डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) द्वारा भोपाल में शुरू की गई जांच, सोमवार को इंदौर पहुंच गई। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति की शिकायत की जांच के लिए ईओडब्ल्यू डीआईजी प्रियंका मिश्रा यहां आई और कुछ जरूरी दस्तावेजों को बटोरकर भोपाल रवाना हो गई। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ईओडब्ल्यू जांच के घेरे में हैं। इन पर सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने का आरोप है।



३ अगस्त २०१० को पत्रिका में प्रकाशित खबर

शनिवार, जुलाई 31, 2010

दवा कंपनियां अटका देती हैं कानून

Drug Trial : A Money Game to treat Man as Guinea-pig


साढ़े चार वर्ष से केंद्र सरकार नहीं कर सकी फैसला
 आईसीएमआर की सिफारिश के बावजूद संसद नहीं पहुंच सका  बिल 

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित की गई दवाओं और टीकों के लोगों पर ïपरीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए भारत सरकार के पास भी एक कानून (बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल) साढ़े चार वर्ष से अटका हुआ है। इस देरी का कारण अरबों रुपए के बजट वाली दवा कंपनियों को माना जाता है। ताज्जुब तो यह है कि इस कानून को संसद में पेश करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) कई बार सिफारिश कर चुकी है।

नागरिकों को अनजान दवाइयों के प्रभाव से बचाने के लिए 2005 में केंद्र सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया। इसी के बाद ड्रग ट्रायल करने का कार्य विधिवत शुरू हुआ। इसके पहले बगैर किसी नियंत्रण या जानकारी के ट्रायल होते थे, किंतु एक्ट में संशोधन भी बेहद लचर साबित हुआ। न तो इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है और न ही किसी भी डॉक्टर पर निगरानी करने की कोई व्यवस्था। यही वजह है कि दवा कंपनियों ने तेजी से देशभर में पांव पसारे और उन डॉक्टरों का चयन किया जिन पर मरीजों को अटूट भरोसा रहता है। डॉक्टरों ने भी 'शोधÓ के नाम पर धड़ाधड़ रोगियों को प्रयोगशाला बनाना शुरू कर दिया। आईसीएमआर को इसकी भनक लगी तो अक्टूबर 2006 में 120 पेज की एक गाइडलाइन जारी की गई। इसका भी देशभर में जमकर उल्लंघन हुआ।

गाइडलाइन बनाने के बीच में ही आईसीएमआर ने बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल का खाका तैयार किया। इसे जनवरी 2006 में विधि विभाग के पास भेजा गया। वहां से इसे मंजूरी भी मिल गई, लेकिन इसके बाद से यह फाइलों में खो गया।

कानून के बगैर काबू संभव नहीं
आईसीएमआर निदेशक डॉ. वीएम कटोच ने 'पत्रिकाÓ से चर्चा में बताया जब तक कानून नहीं लाया जाएगा, ड्रग ट्रायल्स पर काबू पाना कठिन है। हम केवल गाइडलाइन जारी कर सकते हैं, उसके पालन करवाने को लेकर कोई तंत्र मौजूद नहीं है।

एमसीआई ने भी बदले नियम
आईसीएमआर की तरह ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भी ड्रग ट्रायल घपले की जानकारी मिल चुकी थी। यही वजह कि एमसीआई सचिव डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को पत्र लिखकर इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन की जानकारी दी थी। इसमें सभी डॉक्टरों से कहा गया था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। 

मप्र नर्सिंगहोम एक्ट भी अधूरा
मप्र सरकार ने 17 जनवरी 2007 से नर्सिंगहोम एक्ट लागू किया है। इसमें भी ड्रग ट्रायल को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं है। यही वजह है कि राज्य सरकार को अब तक यह पता नहीं है कि निजी अस्पतालों में कौन डॉक्टर किस मरीज पर किस दवा का प्रयोग कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में करीब 60 डॉक्टर ट्रायल में लिप्त हैं। सीएमएचओ डॉ. शरद पंडित ने बताया फिलहाल किसी भी अस्पताल की एथिकल कमेटी की जानकारी हमें नहीं है। यह मामला पहली बार प्रकाश में आया है। अब वरिष्ठ कार्यालय के ध्यान में लाया जाएगा। 


एक मरीज पर मिलते दो से पांच लाख
ड्रग ट्रायल के खेल में धन के प्रभाव को इसी से मापा जा सकता है कि अधिकांश कंपनियां ट्रायल करने वाले डॉक्टर को एक मरीज के एवज में दो से पांच लाख रुपए तक देती है। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही वर्ष 2008-09 में डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया को दमे के रोगियों पर मोमेटासोन और फॉरमेट्रोल नामक दवा को दो मरीजों पर इस्तेमाल करने पर 6 लाख 36 हजार रुपए मिले थे। डॉ. अपूर्व पुराणिक को डोनेपेझिजल एआर दवा के प्रयोग के लिए प्रति मरीज 1.10 लाख रुपए मिले।


उम्रकैद से कम नहीं

चिकित्सा क्षेत्र में तरक्की हो इसके लिए ड्रग ट्रायल की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इससे गुजरने वाले मरीजों के हितों की रक्षा कौन करेगा? उन डॉक्टरों पर निगरानी का तंत्र क्या हो, इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया था। देर से ही सही, कायदे-कानून की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल, सवाल विश्वास का है। वह विश्वास जो मरीज अपने डॉक्टर की आंख में देखता है, उसे भगवान मानता है। चंद डॉक्टरों की हरकतों से अगर समूचे चिकित्सा  जगत की साख संकट में पड़ जाए तो यह ठीक नहीं होगा। ड्रग ट्रायल से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच-पड़ताल में चौंकाने वाले और दु:खद पहलू सामने आए। सरकार की भी कलई खुल गई। निजी अस्पतालों की दूर उसे तो यह भी पता नहीं कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ड्रग ट्रायल के नाम पर मरीजों के साथ क्या हो रहा है। ऐसे हालात में आंख पर पट्टी बांधकर ड्रग ट्रायल की पैरोकारी करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि इस अराजकता से आखिर लाभ किसे है? इस तकनीकी विषय पर आम आदमी की कम जानकारी का धंधेबाजों ने जमकर फायदा उठाया है। राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी इस विषय में बहुत गंभीर नहीं दिखती। ट्रायल में धंधेबाजों की घुसपैठ को देखकर भारतीय चिकित्सा और अनुसंधान परिषद ने चार साल पहले कानून संशोधन सुझाए।   

विधि विभाग की अनुमति भी मिल गई, इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए आज तक सख्त कानून के लिए कोई संशोधन नहीं किया गया। यही वजह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा ड्रग ट्रायल भारत में हो रहे हैं। मप्र सरकार को ड्रग ट्रायल पर बेहद सख्त नियम कानून बनाने होंगे। दोषी डॉक्टर को उम्रकैद से कम का प्रावधान न हो। नियमों का उल्लंघन करने वाले की डिग्री छीनी जानी चाहिए।
News in PATRIKA ON 31th July 2010

गुरुवार, जुलाई 29, 2010

ड्रग ट्रायल में जा चुकी एक जान



 जबलपुर में कैंसर मरीज की हुई थी मौत
 भोपाल, ग्वालियर में भी अनियमितताएं


बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के दौरान प्रदेश में एक महिला मरीज की जान जा चुकी है। जबलपुर के कैंसर अस्पताल में इस मरीज का उपचार चल रहा था। उधर, इंदौर के बाद भोपाल और ग्वालियर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल की अनियमितताएं सामने आई हैं।

जबलपुर में अगस्त 2008 में कैंसर रोगियों पर ड्रग ट्रायल शुरू  हुआ था। रेडियोथेरेपी की प्रोफेसर डॉ. पुष्पा किरार और डॉ. अमित जोतवानी ने पेट के कैंसर (कार्टिनोमा स्टमक) के चार रोगियों पर दवा का प्रयोग शुरू किया था। चूंकि यह ट्रायल प्लेसिबो (इलाज के बीच में दवा बंद करके दूसरे मरीजों से तुलना करना) था, इसलिए एक महिला रोगी पर सारी दवाइयां बंद कर दी गईं। इसी दौरान उसकी मौत हुई।

प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मुताबिक मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में चिकित्सा जगत की विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की घोषणा को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार किया है।


'वह बहुत गंभीर थीÓ

 क्या आपने कोई ट्रायल किया है?
 हां, 2008 में शुरू किया था, लेकिन चार मरीजों के बाद ही बंद कर दिया।

बंद क्यों कर दिया?
ïकॉलेज की मान्यता और हमारी डिग्री के कारण कंपनी ने इंकार कर दिया था।

सूचना के अधिकार में आपने जानकारी दी है कि चार में से एक की मौत हो गई?
ïहां, मौत हुई थी। वह महिला बहुत गंभीर अवस्था में थी। चूंकि ट्रायल प्लेसिबो था, इसलिए कुछ मरीजों को दवा नहीं दी जाती है। उसे भी नहीं दी थी।

मौत के कारण ही ट्रायल बंद तो नहीं हुआ?
हमारे यहां इंदौर जैसा मामला नहीं है। मैं खुद भी ट्रायल करना नहीं चाहती थी, इसलिए बंद कर दिया।
(डॉ. पुष्पा किरार से सीधी बात)


भोपाल का हाल
ईसी अहमदाबाद में, ट्रायल भोपाल में

गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के सर्जरी एचओडी डॉ. एमसी सोनगरा और डॉ. नितिन वर्मा ने 2008 में मूत्र रोग से पीडि़त 40 लोगों पर कैडिला कंपनी की दवा का प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने अहमदाबाद की एक निजी एथिकल कमेटी (ईसी) से मंजूरी ली। आईसीएमआर की गाइडलाइन के मुताबिक यदि सरकारी कॉलेज में एथिकल कमेटी मौजूद हो, तो बाहर की किसी कमेटी से अनुमति नहीं ली जा सकती है।


ग्वालियर में बड़ा कारोबार
3500 लोगों पर थोपा ट्रायल, कमेटी भी अधूरी 

वर्ष 2005 में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में किए गए संशोधन के मुताबिक ट्रायल को मंजूरी देने वाली एथिकल कमेटी में एक आम आदमी समेत पांच बाहरी व्यक्ति होना आवश्यक है। ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी में दो लोग बाहर हैं और इनमें भी आम आदमी नहीं है। यहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्मेंद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए। इसमें करीब 3500 रोगियों को चुना गया।



ईओडब्ल्यू में बयान शुरू
 ड्रग ट्रायल मामले में तीन सप्ताह में पूरी होगी प्रारंभिक जांच

मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण करने (ड्रग ट्रायल) के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने भोपाल में बुधवार से बयान लेना शुरू कर दिया है। ब्यूरो ने सबसे पहले शिकायतकर्ता से वे दस्तावेज हासिल किए हैं, जिनके आधार पर शिकायत की गई। 

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम संगठन ने ईओडब्ल्यू में शिकायत की है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर के सात डॉक्टरों ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों से सांठगांठ करके ड्रग ट्रायल शुरू किया। इसके एवज में उन्हें अकूत संपत्ति हासिल की। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया जांच का दायित्व असिस्टेंट आईजी प्रियंका शर्मा को सौंपा है। उन्होंने शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे के बयान दर्ज कर लिए हैं। करीब तीन सप्ताह में जांच का कार्य समाप्त कर लिया जाएगा। जिन डॉक्टरों पर आरोप हैं, उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

ईओडब्ल्यू आईजी के मुताबिक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल के खिलाफ शिकायत मिली है।


दोषियों पर होगी कार्रवाई : मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भोपाल में मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा ड्रग ट्रायल मामले में ईओडब्ल्यू में शिकायत हुई है और वहां जांच भी शुरू हो गई है। जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 


देर रात तक उलझा रहा एमजीएम

एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में हुए ड्रग ट्रायल मामले में संभवत: गुरुवार को विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाया जाएगा। इसकी तैयारी में रात करीब 9.30 बजे तक कॉलेज में कार्य जारी थी। कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के साथ ही कुछ प्रोफेसर और प्रशासनिक अधिकारी जुटे थे, ताकि भोपाल मुख्यालय से पूछे गए हर सवाल का 'माकूलÓ जवाब दे सकें। उधर, भोपाल में संचालक चिकित्सा शिक्षा और प्रमुख सचिव में भी देर रात तक इस मसले पर कार्य चलने की जानकारी मिली है।

News i n PATRIKA on 29th July 2010

बुधवार, जुलाई 28, 2010

एमसीआई को थी ट्रायल घपले की भनक


- देशभर के मेडिकल कॉलेजों को भेजे थे नोटिस
- सात माह बाद भी किसी अफसर ने नहीं दिया ध्यान

 
अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाईश के घपले की मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भनक लग चुकी थी। इसी कारण सात माह पहले देश के सभी मेडिकल कॉलेजों को एक पत्र लिखा गया था। पत्र में कहा था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। अफसोस जनक यह है कि चिकित्सा शिक्षा की इस सर्वोच्च संस्था को एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर जैसे संस्थानों ने कोई तवज्जो नहीं दी। ï

एमसीआई सचिव रिटायर्ड कर्नल डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को लिखा था कि ट्रायल से आर्थिक लाभ उठाने के लिए डॉक्टर मरीजों को निशाना बना रहे हैं, इसलिए इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन आवश्यक हो गया है। इस संशोधन के बताए अनुसार ही अब कॉलेजों के डॉक्टरों को बरताव करना अनिवार्य है।

'मेरे पास इस तरह के निर्देश आए थे और इसकी जानकारी सभी विभागाध्यक्षों को दे दी गई थी। अब उन्होंने इसका पालन नहीं किया तो कार्रवाई की जाएगी।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर

छह बिंदु जिनका उल्लंघन हुआ

एक-
कोई भी डॉक्टर किसी दवा कंपनी से कोई उपहार नहीं लेगा।
दो-
कोई भी डॉक्टर या उसके परिवार का सदस्य किसी दवा कंपनी के खर्चे से यात्रा नहीं करेगा।
तीन-
ट्रायल की स्थिति में कोई भी डॉक्टर पारदर्शी तरीके से ही कंपनी से रुपए लेगा।
चार-
ट्रायल शुरू करने के पहले ही जनता को विज्ञापन जैसे माध्यम से राशि की जानकारी देना होगी।
पांच-
जो मरीज स्वेच्छा से ट्रायल में शामिल हों, उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा का इंतजाम करना होगा।
छह-
दवा कंपनी से किए गए समझौते में ट्रायल के परिणाम को प्रकाशित करने का अधिकार लेना।


डीजीपी को भी भेजी शिकायत
लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के बाद ड्रग ट्रायल करने वाले मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस महानिदेशक के पास भी शिकायत हुई है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, एथिकल कमेटी अध्यक्ष डॉ. केडी भार्गव के साथ ही करीब चालीस डॉक्टरों और कमेटी सदस्यों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और गैर इरादतन हत्या जैसे आरोप दर्ज करने की मांग की है।

भोपाल ईओडब्ल्यू करेगा जांच
स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति संगठन द्वारा की गई शिकायत पर भोपाल पदस्थ असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल प्रियंका मिश्रा को जांच का जिम्मा सौंपा गया है। उन्होंने इसकी पड़ताल भी शुरू कर दी है। पहले माना जा रहा था कि जांच ईओडब्ल्यू के इंदौर दफ्तर से शुरू होगी। शिकायत में डॉ. हेमंत जैन, डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. पुष्पा वर्मा और डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया गया है।





आजाद ने मांगे इंदौर ड्रग ट्रायल के तथ्य
- 'पत्रिकाÓ की खबरों पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने लिया संज्ञान
- भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से भी की चर्चा





केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्री गुलाम नबी आजाद ने इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ïïविकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण किए जाने को लेकर 'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों को गंभीरता से लिया है। इस संबंध में उन्होंने मंत्रालय से सभी जरूरी तथ्य मांगे हैं। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है।

अधिकारी ने बतायाï इंदौर के एमवाय अस्पताल, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय और चेस्ट सेंटर में पिछले कुछ साल से मरीजों पर दवाओं का धोखे से परीक्षण किए जाने की जानकारी मिली है, जिसे आजाद ने गंभीरता से लिया है। आजाद ने इस संबंध में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच से भी चर्चा की। आईसीएमआर मापदंडों के आधार पर ही दवाइयों के क्लिनिकल परीक्षण होते हैं।  


News in PATRIKA on 28th July 2010

रविवार, जुलाई 25, 2010

ईओडब्ल्यू में जांच शुरू

 आईजी ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना



विदेशी दवा कंपनियों से मिलने वाले रुपए के लिए शुरू हुए ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में शामिल डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने जांच शुरू कर दी है। ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना है। फिलहाल जांच में सात डॉक्टरों के नाम हैं, जो आगे 50 से अधिक तक पहुंच सकते हैं।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति द्वारा ईओडब्ल्यू में शिकायत की गई थी। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया शिकायत को जांच में ले लिया गया है। प्रथम दृष्टया यह बेहद गंभीर मामला दिखता है। आरोपों सच साबित होने पर केस दर्ज किया जाएगा। संभवत: जांच इंदौर ऑफिस भेजी जाएगी।

शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे ने बताया एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया है। 


ये हैं आरोप
एक - सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित की।
दो-  सरकार की जानकारी के बगैर मरीजों की जान आफत में डाली।
तीन- ट्रायल से एमबीबीएस और एमडी/एमएस के छात्रों की पढ़ाई बाधित।
चार- बगैर जानकारी के अवैधानिक तरीके से विदेश यात्राएं की।
पांच - सरकारी खजाने में रुपए न डालकर खुद ने विभिन्न बैंकों में खाते खुलवाए।


लोकायुक्त में एक ओर शिकायत की तैयारी
शुक्रवार को लोकायुक्त में भेजी गई शिकायत के बाद अब दूसरी शिकायत की तैयारी है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति ने बताया डॉक्टरों के नाम से आईसीआईसीआई, एडीएफसी, आईडीबीआई, एचएसबीसी, सिटी बैंक के साथ ही कुछ सहकारी बैंकों में भी खाते हैं। इनकी जांच करने से पूरे लेन-देन की जानकारी मिल सकती है। ये डॉक्टर वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए रुपए भारत मंगवाते हैं। पहली शिकायत में करीब तीन दर्जन डॉक्टरों और अन्य को आरोपी बताया है


सीटीए की भी हो जांच
उधर, विधानसभा में मामला उठाने वाले विधायकों का कहना है 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को वे समझौते भी जगजाहिर करना चाहिए जिनका नाम क्लिनिकल ट्रायल्स एग्रीमेंट (सीटीए) होता है। इससे ही रुपए की असली जानकारी सामने आएगी।


पैसे के लिए बेच रहे देश : हजारे
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने इंदौर प्रवास के दौरान 'पत्रिकाÓ से चर्चा में कहा विदेशी कंपनियों के लिए जो लोग ड्रग ट्रायल कर रहे हैं, वे पैसे के लिए देश को बेच रहे हैं। उनसे देश को बचाना चाहिए। वे कंपनियों के मुनाफे के लिए ही इस काम में लगे हैं। शोध जैसी कोई बात इसमें नहीं है।

News in Patrika on 26th July 2010

मरीजों को नहीं दिए सहमति पत्र

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के कायदों का जमकर उल्लंघन

पूरे देश में मरीजों को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने अक्टूबर 2006 में जो मापदंड जारी किए थे, उनका इंदौर के डॉक्टरों ने जमकर उल्लंघन किया है। मरीजों को जो जानकारी दी जाना चाहिए, वह दिए बगैर ही दवा और टीकों का प्रयोग शुरू कर दिया गया। इसमें कई रोगियों की जान पर भी बन आई।

आईसीएमआर की 120 पेज की पुस्तक में जो कायदे बनाए हैं, उनकी जानकारी ही कई डॉक्टरों को नहीं है। ट्रायल करने वाले एक डॉक्टर ने बताया हमें तो बस हेलेंस्की घोषणा और स्पांसर कंपनी द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हैं। एक अन्य का कहना है ट्रायल एक बार क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया में रजिस्टर्ड होने के बाद कोई कुछ पूछता ही नहीं है, इसलिए गाइडलाइन पढऩे की आवश्यकता नहीं है। ताज्जुब की बात तो यह है कि इस गाइडलाइन के बारे में अब तक एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्तव को भी जानकारी नहीं थी। उन्होंने बताया मामला उठा है तो गाइडलाइन निकलवाकर अध्ययन कर रहा हूं। अब इसके आधार पर तुलना की जाएगी।


जो किया जाना था, परंतु किया नहीं

- सहमति पत्र की एक कॉपी मरीज को देना।
- मरीज का बीमा करके पॉलिसी उसे देना।
- दवा के साइड इफेक्ट का पूरा खुलासा करना।
- मरीज के अनपढ़ होने पर दो शिक्षित गवाहों के हस्ताक्षर।
- थर्ड पार्टी एग्रीमेंट की गारंटी अर्थात ट्रायल एमवायएच में होने की स्थिति में अधीक्षक का पत्र
- जिस बात पर मरीज सवाल पूछे, उसे सहमति पत्र में अंडर लाइन करने लिखना।
- कोई लिखित सहमित न दे, तो ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करना।
- मानसिक रोगियों के परिजन से कानूनी अनुमति के बगैर जांच नहीं करना। 



प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
आईसीएमआर ने स्पष्ट किया है कि मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की डिक्लेरेशन को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार कर दिया है।





ट्रायल इंदौर में, ईसी पूणे में
- ड्रग ट्रायल के गोखधंधे में निमयों को रखा ताक पर 



विदेशी कंपनी द्वारा मरीजों पर दवा आजमाइश के खेल ड्रग ट्रायल में भारत सरकार के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाने का मामला सामने आया है। डॉक्टरों ने निजी कंपनियों से रुपए लेने की जल्दबाजी में यह भी नहीं देखा कि उन्हें जांचने वाली एथिकल कमेटी कहां की है। ट्रायल के ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें डॉक्टर इंदौर के हैं और कमेटी पूणे, बैंग्लूर, चैन्नई की। कमेटी के सामने हाजिर की जरूरत इन डॉक्टरों ने नहीं समझी।

मानसिक रोगियों पर किए गए ट्रायल में ऐसा ही किया गया। एमवायएच के उप अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ने पूणे में कंपनी द्वारा गठित की गई एथिकल कमेटी से अनुमति ली। इसके लिए वे कभी पूणे गए भी नहीं। यही हाल एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव का भी रहा। उन्होंने ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर पर दमा रोगियों पर जो ट्रायल की हैं, उनके लिए इंदौर के बाहर की एथिकल कमेटी से अनुमति ली।

कॉलेज के कर्मचारी भी चपेट में
मेडिकल कॉलेज के कुछ कर्मचारियों पर डॉक्टरों द्वारा ट्रायल करने की जानकारी मिली है। कॉलेज के एकाउंट सेक्शन में कार्यरत एक व्यक्ति पर चेस्ट सेंटर में ट्रायल की गई। वह दमे का रोगी है।




विधानसभा बहस के लिए ध्यानाकर्षण

 ड्रग ट्रायल पर बहस के लिए दो विधायकों ने गुरुवार को विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी से मुलाकात की है। विधायकों का कहना है कि इस मुद्दे पर अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए क्योंकि यह हर प्रदेशवासी से जुड़ा मुद्दा है। इंदौर एक के विधायक सुदर्शन गुप्ता ने बताया रतलाम के विधायक पारस सकलेचा के साथ मैंने इस मसले पर चर्चा करवाने की आग्रह किया है। विधानसभा अध्यक्ष सैद्धांतिक तौर पर इसके लिए राजी भी हो गए हैं।

विशेषाधिकार हनन की तैयारी
ड्रग ट्रायल में लिप्त कुछ डॉक्टर सरकार को झूठी जानकारी देकर या किसी प्रकार के लेख छपवाकर विधानसभा एवं नागरिकों को भ्रमित करने की कोशिश में लगे हैं। एक जागरूक विधायक ने 'पत्रिकाÓ को बताया जब कोई प्रश्न किसी सदस्य ने पूछा है तो उस पर सदन के पटल पर चर्चा होने तक किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डाला जा सकता है। विषय से जुड़ा कोई व्यक्ति ऐसा करता है तब तो यह सीधे-सीधे विशेषाधिकार हनन का मामला है। ड्रग ट्रायल में भी ऐसी कोशिशें हो रही हैं, जिन्हें कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।



News in Patrika on 23th July 2010

इलाज के नाम पर करोड़ों का घालमेल

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: ईओडब्ल्यू पहुंचा मामला


ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा अब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) पहुंच गया है। डॉक्टरों से ही जुड़े एक संगठन ने शिकायत की है कि गरीब मरीजों को निशाना बनाकर एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर से जुड़े अस्पतालों में ऐसी दवाइयों का आजमाइश हो रही है, जो बाजार में उतरी ही नहीं है। राज्य सरकार की जानकारी के बगैर इलाज के नाम पर डॉक्टरों ने करोड़ों का घालमेल किया है। इसकी विस्तृत जांच करके भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और ड्रग एंड कास्मेटिक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाए।

 स्वास्थ्य समर्पण सेवा संगठन द्वारा भोपाल स्थित ईओडब्ल्यू मुख्यालय में शिकायत की गई है। संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे ने बताया ट्रायल के नाम पर काला धन राज्य में आ रहा है। ट्रायल करने वाले डॉक्टरों और उनके परिजन के बैंक खातों की जांच की जाए, तो हकीकत उजागर हो सकती है। चूंकि राज्य में ईओडब्ल्यू ही आर्थिक अपराध से जुड़े मामले सुलझाता है, इसलिए शिकायत की।

जीने का अधिकार संकट में
 स्वदेशी जागरण मंच ने शुरू किया विरोध


ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच ने बुधवार को विरोध शुरू कर दिया। मंच ने ट्रायल को जीवन जीने के अधिकार की राह में अड़चन बताया है। इस कार्य में लिप्त डॉक्टरों के विरूद्ध एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में संगठन चरणबद्ध आंदोलन करेगा।

मंच के कार्यकर्ताओं ने अपर आयुक्त गौतमसिंह को राष्टï्रपति एवं राज्यपाल के नाम पांच बिंदुओं का ज्ञापन सौंपा। महानगर संयोजक सुरेश बिजौलिया, विभाग संयोजक बलराम वर्मा एवं महानगर सहसंयोजक मनोज लोढ़े ने बताया मेडिकल हब की शक्ल लेते इंदौर में कुछ डॉक्टर मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। विदेशी कंपनियों की आड़ में मरीज पर जानलेवा प्रयोग किए जा रहे हैं। बारिकी से पूरे मामले की जांच की जाए तो सारा मामला सामने आ सकता है। केंद्र सरकार को चाहिए क्विंटल्स व बायोटेक नाम की स्पांसर कंपनियों को तत्काल प्रतिबंधित करे और राज्य सरकार को चाहिए कि वह तत्काल एक नियामक आयोग गठन करे जो मामले की पड़ताल कर सके। 


अब खंगाल रहे गाइडलाइन
- मरीजों पर प्रयोग करने से पहले तो नहीं दिया ध्यान
- पलट रहे आईसीएमआर, एम्स के नियमों की किताबें



पांच वर्षों से अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाइश (ड्रग ट्रायल) करने वाले डॉक्टर अब उस नैतिक गाइडलाइन की तलाश में है, जो उनका बचाव कर सके। इसके लिए वे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की उन किताबों के पन्ने पलट रहे हैं जिसमें ड्रग ट्रायल के कायदे तय किए गए हैं।

'पत्रिकाÓ द्वारा ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे का खुलासा करने और सरदारपुर, रतलाम व ग्वालियर के विधायकों द्वारा विधानसभा में मामला उठाने के बाद डॉक्टरों को नियमों की याद आई है। अब तक वे क्विंटल्स और बायोटेक जैसी स्पांसर कंपनियों द्वारा तय दिशा में काम करते थे। उन्होंने कभी आईसीएमआर के उन नियमों की परवाह नहीं की जो मनुष्य को प्रयोगशाला बनाने से बचाते हैं।

दो धारी तलवार!
आईसीएमआर के मापदंड दो धारी तलवार की तरह हैं। ट्रायल करने वाले डॉक्टर इसमें अपने बचाव की बातें ढूंढ रहे हैं, जबकि चिकित्सा शिक्षा विभाग डॉक्टरों को कटघरे में खड़े करने के तथ्य।


News in Patrika on 22th July 2010

एमवायएच उपअधीक्षक भी ट्रायल में लिप्त

जानकारी छुपाने वालों में डॉ. वीएस पाल शामिल
मनोरोगियों पर आजमाई रामेलटियोन दवा


एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव के बाद उपअधीक्षक डॉ. वीएस पाल द्वारा भी ड्रग ट्रायल की जानकारी छुपाने की बात सामने आई है। उन्होंने सरकार को ट्रायल नहीं करने की जानकारी दी है, जबकि क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) रिकॉर्ड के मुताबिक 2009 में उन्होंने मनोरोगियों पर ट्रायल किया है। उन्होंने खुद को एमजीएम मेडिकल कॉलेज का प्रोफेसर बताकर ट्रायल अलंकार पाइंट गीता भवन चौराहा स्थित प्रायवेट क्लिनिक पर की।

सीटीआरआई की 29 जून 2010 को अपडेट की गई जानकारी बताती है 9 दिसंबर 2009 को गुरगांव के प्रो. कंचन त्यागी के अधीन देश के 16 डॉक्टरों ने रेनबैक्सी कंपनी के लिए रामेलटियोन दवा का ट्रायल शुरू किया। इसमें डॉ. पाल के साथ ही मनोरोग कंसलटेंट डॉ. अभय पालीवाल भी उनके साथ रहे। डॉ. पाल ने ट्रायल के लिए पूणे स्थित एथिकल कमेटी से ट्रायल की अनुमति ली थी। 

इन्होंने भी छुपाई जानकारी
नेत्ररोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, ïमनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. रामगुलाम राजदान, कंसलटेंट डॉ. मनीष पालीवाल, कंसलटेंट डॉ. उज्जवल सरदेसाई और मेडिसीन के डॉ. अतुल शेंडे ने जानकारी छुपाई है।


'बहुत पुराना मामला हैÓ

क्या आपने किसी दवा का ट्रायल किया है ?
- नहीं तो।
सीटीआरआई रिकॉर्ड बताता है आपने रामेलटियोन दवा इस्तेमाल की?
- पुरानी बात होगी, क्योंकि यह दवा तो अब बाजार में आ चुकी है।
आपने किस एथिकल कमेटी से इजाजत ली थी?
- वह बाहर की थी, लेकिन मैंने ट्रायल नहीं किया है।
सरकारी रिकॉर्ड में तो आपका नाम है?
वह हो सकता है। कई बार चर्चा चलती है, लेकिन काम शुरू नहीं हो पाता।
(डॉ. वीएस पाल से चर्चा) 



मेडिकल कॉलेज डीन की भोपाल से खिंचाई
- ड्रग ट्रायल के गोरखधंधों मामले में सरकार ने लताड़ा


विदेशी दवा कंपनियों से मोटी रकम कमाने के लिए अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाइश (ड्रग ट्रायल) करने वाले डॉक्टरों के कारण बदनाम हुए एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन को सरकार ने जमकर लताड़ लगाई है। सरकाार ने उनसे ड्रग ट्रायल से जुड़े सभी मुद्दों पर विस्तृत जवाब मांगा है। यह भी पूछा है कि उनकी नाक के नीचे ट्रायल का धंधा चलता रहा, फिर भी उन्हें इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली?

'पत्रिकाÓ द्वारा ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे के खुलासे से मामले में सरकार की अज्ञानता जाहिर हुई है। कॉलेज से जुड़े एमवायएच, चाचा नेहरू अस्पताल और चेस्ट सेंटर में मरीजों पर दवा आजमाइश होती है। इसकी सरकार को कानों-कान खबर नहीं है। सूत्रों के मुताबिक डीन डॉ. एमके सारस्तव से सरकार बेहद नाराज हैं, क्योंकि उनकी जानकारी के बगैर कई डॉक्टर ट्रायल कर रहे हैं। इससे मरीजों के साथ ही कॉलेज की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। सूत्रों का कहना है कि चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव आईएस दाणी पूरे घटनाक्रम से बेहद खफा हैं।

एथिकल कमेटी भंग करने की तैयारी
सूत्रों का कहना है एमजीएम मेडिकल कॉलेज की एथिकल कमेटी को भंग करने की तैयारी है। इस कमेटी के सहयोग के कारण ही डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के धंधे का विस्तार किया है।

वह बाबूगिरी तो यह क्या?
एथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी ने कॉलेज काउंसिल की एक बैठक में कहा था मैं किसी कमेटी में नहीं रहूंगा क्योंकि मैं बाबूगिरी नहीं करना चाहता। यही वजह है कि उन्हें किसी कमेटी में नहीं रखा जाता है। वे कोई जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहते हैं। ड्रग ट्रायल के खुलासे के बाद कॉलेज एक प्रोफेसर ने बताया उन्हें जब बाबूगिरी पसंद नहीं है, तो एथिकल कमेटी की सदस्यता छोड़ क्यों नहीं देते। 

फिर आया ड्रग ट्रायल का सवाल
विधानसभा में इस बार मानो ड्रग ट्रायल से जुड़े सवालों की बरसात हो रही है। मंगलवार को फिर से एक सवाल कॉलेज पहुंचा। इसमें भी कमोबेश वही जानकारी मांगी गई जो पूर्व में मांगी जा चुकी है। पांच वर्षाें में हुई ट्रायल, लिप्त डॉक्टर, सरकार की अनुमति , विदेश यात्रा के साथ ही रुपए का हिसाब भी इसमें पूछा गया है। इसका जवाब तैयार करने के लिए शाम सात बजे तक मशक्कत जारी रही। 


इंदौर का मुद्दा उठाएंगे बाहरी विधायक
- ड्रग ट्रायल में हमारे जनप्रतिनिधियों की बड़ी चूक
- रतलाम, सरदारपुर व ग्वालियर के विधायकों ने खोला मोर्चा



इंदौर के लिए इंदौर के जनप्रतिनिधि कितने सजग और जागरूक है, इसकी कलाई ड्रग ट्रायल के मौजूदा मुद्दे से खुल रही है। जिले में नौ विधायक हैं और इन्हें इस बात से कोई सरोकार ही नहीं कि प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवायएच में आने वाले मरीजों की सेहत के साथ डॉक्टर खिलवाड़ कर रहे हैं। कैलाश विजयवर्गीय व महेंद्र हार्डिया को मंत्री होने के नाते छोड़ भी दिया जाए तो शेष सात विधायक इस मसले पर क्या कर रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।

हालांकि, इंदौर को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। प्रदेश के तीन दूसरे विधायक इंदौर की चिंता कर रहे हैं। रतलाम के पारस सकलेचा, सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल और ग्वालियर के प्रद्धुम्नसिंह तोमर ऐसे विधायक हैं, जिन्हें राज्यभर के मरीजों की फिक्र है। सकलेचा भाजपा से ही हैं, जबकि ग्रेवाल व तोमर कांग्रेस से। तीनों ने ही ड्रग ट्रायल से जुड़े मुद्दे को विधानसभा में प्रश्न के जरिए उठा दिया है।

मंत्री को जानकारी ही नहीं
इंदौर पांच के विधायक महेंद्र हार्डिया स्वास्थ्य राज्य मंत्री हैं और उन्हें यह पता ही नहीं है कि ड्रग ट्रायल क्या होता है। उन्होंने हाल ही में कहा है कि इसकी जानकारी मैं उन्हीं डॉक्टरों से लूंगा, जो ट्रायल कर रहे हैं।

इंदौर के विधायक
सुदर्शन गुप्ता, रमेश मेंदोला, अश्विन जोशी, मालीन गौड़, जीतू जिराती, सत्यनारायण पटेल और तुलसी सिलावट।


 

News in Patrika on 21th July 2010

इनहेलर के ट्रायल से हुआ मोतियाबिंद !

दमे की तकलीफ लेकर 2008 में एमवायएच आया था मरीज
कुछ ही दिन में दूसरी बीमारी ने जकड़ा

एक ऐसा मरीज सामने आया है जिस पर एमवायएच में ड्रग ट्रायल (ऐसी दवा से उपचार जो बाजार में नहीं मिलती) हुआ। मरीज दमे का रोगी था और उपचार के दौरान उस पर डॉक्टरों ने इनहेलर का प्रयोग किया। इसकी वजह से उसे मोतियाबिंद हो गया। मोतियाबिंद का उपचार भी एमवायएच के नेत्ररोग विभाग में ही हुआ।

मरीज को नुकसान होने की आशंका के चलते उसका नाम पता प्रकाशित नहीं किया जा रहा है। दस्तावेज बताते हैं कि दमा की शिकायत पर 2008 में जब मरीज एमवाय अस्पताल पहुंचा तो मेडिसीन विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक वाजपेयी ने उसे फार्मेटेरोल और मोमेटासोन दवा से बना इनहेलर दिया। साथ ही कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाए। इनहेलर के प्रयोग के साथ ही उसे नेत्र रोग विभाग भी भेजा गया, जहां उसकी आंखों की जांच नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. पुष्पा वर्मा ने की। उपचार शुरू होने के बाद उसे चेस्ट सेंटर शिफ्ट कर दिया गया। बाद में जब भी वह अस्पताल आता, जूनियर डॉक्टर मोटर साइकिल पर बैठाकर उसे एमवायएच से चेस्ट सेंटर ले जाया जाते। कुछ दिन बाद मरीज को मोतियाबिंद हो गया। कारण पूछा तो बताया गया उम्र बढऩे से ऐसा हो जाता है।

डॉक्टरों को मिले 27.54 लाख
सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि इनहेलर के इस ट्रायल के बदले प्लो रिसर्च इंस्टीट्यूट ने डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया के खाते में 27.54 लाख रुपए जमा कराए। इसका कुछ हिस्सा दूसरे डॉक्टरों को भी मिला। ट्रायल करीब दो दर्जन मरीजों पर किया गया। वर्ष 07-08 में 1.70 लाख, 08-09 में 11.08 लाख और 09-10 में 11.76 लाख का भुगतान डॉक्टरों को हुआ।


हां, साइड इफेक्ट होते थे
'डॉ. अशोक वाजपेयी के मार्गदर्शन में इनेहलर का ट्रायल किया था। इनहेलर से आंख संबंधी साइड इफेक्ट होते थे, इसीलिए मरीजों को नेत्र रोग विभाग भेजा जाता था। वहां की एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा ट्रायल में साथ थीं और मरीजों को जांचती थी। मरीज का नाम जाने बगैर यह नहीं बता सकता हूं कि मोतियाबिंद हुआ या नहीं।Ó
- डॉ. संजय अवासिया, एसोसिएट प्रोफेसर, मेडिसीन विभाग


डॉ. पुष्पा वर्मा की पोल खुली
डॉ. संजय अवासिया के बयान से नेत्र रोग विभाग की एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा की पोल भी खुल गई है। उन्होंने हाल ही में सरकार को जानकारी भेजी है कि वे किसी ट्रायल में शामिल नहीं रही।

रतलाम के डॉक्टर ने पूछा सवाल
एमवायएच के सूत्र बताते हैं इस ड्रग ट्रायल के संबंध में रतलाम के एक डॉक्टर ने सूचना के अधिकार में जानकारी मांगी, जो उसे नहीं दी गई। डॉक्टर ने इसके लिए चार रिमाइंडर भी भेजे, परंतु बात नहीं बनी। बाद में डॉक्टर ने क्या कार्रवाई की, इसकी जानकारी नहीं मिल सकी है। 

News in Patrika on 21th July 2010

तय हो नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी

ड्रग ट्रायल को लेकर आगे आए चिकित्सकीय संगठन


शहर में चल रहे ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में लिप्त डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे चुनिंदा डॉक्टरों की वजह से चिकित्सा पेशे से जुड़े वे डॉक्टर भी बदनाम हो रहे हैं, जिनकी ट्रायल में कोई भूमिका नहीं है। एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छापरवाल इसके लिए पूरी तरह से इथिकल कमेटी को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि इथिकल कमेटी को ट्रायल से गुजर रहे प्रत्येक मरीज की जानकारी जुटाई जाना चाहिए। ट्रायल कई कडिय़ों से होकर गुजरता है। सभी कडिय़ां ईमानदारी से काम करें, जिसकी भी भूमिका संदिग्ध हो, उसकी ईमानदारी से जांच कराई जाना चाहिए। मरीजों का कंसेंट फॉर्म सूचनात्मक न होकर जानकारीपरक होना चाहिए, ताकि वह अपने भले-बुरे का निर्धारण कर सके। वहीं आईएमए के अध्यक्ष डॉ. अनिल बंडी का कहना है कि नियमों का पालन नहीं करने वाले डॉक्क्टरों की भूमिका को संदिग्ध माना जा सकता है। वे मानते हैं कि मरीजों को ट्रायल की जानकारी देना नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है। ट्रायल कर रहे डॉक्टर यदि ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह गैरकानूनी है।

ऐसे काम से पेशे की बदनामी

यह बात सौ फीसदी सही है कि कुछ डॉक्टरों के गलत ढंग से ड्रग ट्रायल करने के कारण शहर के अन्य चिकित्सकों की बदनामी हो रही है। निर्धारित मापदंडों और मरीज को विश्वास में लेकर उसे पूरी जानकारी देकर ही ट्रायल किया जाना चाहिए। यह वास्तव में मरीज का अधिकार भी है। 
डॉ. जीएस पटेल, पूर्व अध्यक्ष इंडियन पीडिएट्रिक एसोसिएशन

मरीजों से ट्रायल की बात छिपा रहे हैं, मतलब डॉक्टर कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। जनहित में किए जाने वाले इस काम के पहले मरीजों को ट्रायल के साथ दवा और उसके साइड इफेक्ट, इंश्योरेंस की जानकारी भी दी जाना चाहिए। चुनिंदा डॉक्टरों के कारण होम्योपैथी व अन्य पैथियां भी बदनाम न हो, इसका ट्रायल कर रहे डॉक्टरों को ध्यान रखना चाहिए।
डॉ. एके द्विवेदी, अध्यक्ष, होम्योपैथी एसोसिएशन

ड्रग ट्रायल कर रहे चिकित्सकों को चाहिए कि वे मरीजों को ट्रायल वाली दवाओं से होने वाले नुकसान और फायदे के बारे में भी बताएं। साइड इफेक्ट होने पर मरीजों के कानूनी अधिकारों की भी जानकारी दी जाना चाहिए। चिकित्सकों की भूमिका पूरी तरह पारदर्शी हो।
डॉ. ओपी तिवारी, सदस्य, एमसीआई



News in Patrika on 20th July 2010

500 पेज में समाया ड्रग ट्रायल का हिसाब

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा

एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में पांच वर्ष से जारी ड्रग ट्रायल की पूरी जानकारी 500 से अधिक पन्नों में पूरी हुई। शनिवार को यह जानकारी दो कर्मचारियों के हाथ भोपाल भेजी गई, जिसे विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा।

बरसों से एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ड्रग ट्रायल हो रहा है और सरकार को इसकी रत्तीभर भी जानकारी नहीं थी। इस बार सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल ने ड्रग ट्रायल का सवाल पूछा तो मामले में लिप्त सभी डॉक्टरों के कान खड़े हो गए। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने एक सप्ताह पहले जब इसका जवाब मंत्रालय को भेजा तो वहां से इंकार आ गया कि गोलमाल जवाब नहीं चाहिए, स्पष्ट और पारदर्शी जवाब भेजें।

इसी दौरान 'पत्रिकाÓ ने पूरे मामले का खुलासा किया कि किस तरह से डॉक्टर मरीजों पर चूहा की तरह प्रयोग कर रहे हैं। इसके एवज में विदेशी कंपनियों से उन्हें मोटी रकम भी मिल रही है। इससे सरकार सचेत हुई और मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत को तगड़ी फटकार मिली। एक बार फिर से जानकारी तैयार की गई लेकिन इससे भी भोपाल संतुष्ट नहीं हुआ। आखिर में विस्तृत ब्यौरा भेजा गया है, जिसमें ïट्रायल और इसके हिसाब की जानकारी है।

कई तथ्य छुपाए
सूत्रों का कहना है कि अभी भी कॉलेज ने कई तथ्यों को छुपा लिया है। यह नहीं बताया गया है कि जिन मरीजों प्रयोग किए गए, उनकी वर्तमान हालत क्या है? क्या उन पर दवा प्रयोग से विपरीत प्रभाव पड़ा? क्या मरीजों को ट्रायल के खतरों की जानकारी दी गई? कुछ डॉक्टरों ने यह जानकारी भी छुपा ली है कि वे निजी अस्पतालों में जानकर ट्रायल करते हैं।

 


भोपाल करेगा डॉ. भार्गव की जांच
- इंदौर के प्रबंधन पर नहीं भरोसा

एमवाय अस्पताल अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव द्वारा ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर में खड़ा किया गया करोड़ों का ड्रग ट्रायल के कारोबार की जांच भोपाल के अधिकारी करेंगे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के लचर रवैय्ये को देखते हुए यह फैसला किया गया है।

'पत्रिकाÓ ने खुलासा किया था कि डॉ. भार्गव ने सरकार को अंधेरे में रखकर तीन वर्ष में ड्रग ट्रायल का बड़ा धंधा शुरू कर दिया है। इसके लिए उन्होंने धार कोठी स्थित अपने घर के पास ही ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर खोला है। यहां वे दमा को रोगियों पर पांच अलग-अलग कंपनियों की दवाइयों के प्रयोग करते हैं और इसके एवज में उन्हें मोटी रकम मिलती है। भोपाल पदस्थ सूत्रों के मुताबिक डॉ. भार्गव की जांच के लिए सचिव स्तर के किसी अधिकारी को नियुक्त किया जा सकता है।

डॉ. भार्गव पर आरोप
- पूर्णकालिक अधीक्षक होने के नाते प्रायवेट प्रेक्टिस की अनुमति नहीं फिर भी कर रहे ड्रग ट्रायल।
- खुद लिप्त इसलिए एमवाय अस्पताल को भी खुले आम ट्रायल का केंद्र बनने दिया। 
- सरकार को भेजे संपंत्ति के ब्यौरे में ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर का जिक्र नहीं किया।


अन्य डॉक्टर भी घेरे में
मनोरोग विभाग के डॉ. रामगुलाम राजदान, डॉ. अभय पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई और मेडिसीन के डॉ. अतुल शेंडे ने भी डॉ. भार्गव की तर्ज पर निजी अस्पतालों में जाकर ट्रायल के गोरखधंधे में व्यारे-न्यारे किए हैं। इन्हें भी सरकार शिकंजे में लेगी।


'मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता हूं। वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा के बाद ही कार्रवाई होगी।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

News in Patrika on 19th July 2010

ड्रग ट्रायल का हिसाब-किताब ही नहीं

गरीब मरीज निशाने पर परंतु केंद्र-राज्य में से कोई नहीं कर रहा निगरानी
विदेशाी कंपनियों से तीन वर्ष में पूरे देश में फैलाया देशभर में नेटवर्क 



बरसों से हिंदुस्तानियों पर विदेशी कंपनियां ड्रग ट्रायल के नाम पर 'गुमनामÓ दवाइयों का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन इन कंपनियों से आने वाले धन का न तो केंद्र सरकार के पास और न ही राज्य सरकार के पास कोई हिसाब है। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में भारत में 1500 करोड़ का कारोबार जारी है, जो 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ तक पहुंचेगा। ताज्जुब तो यह है कि देशभर में ट्रायल करने वाले डॉक्टरों की कभी पड़ताल भी नहीं की गई, जबकि ये देश के गरीब और अनपढ़ मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं।

विदेशी कंपनियों ने तीन वर्ष में पूरे देश में नेटवर्क फैलाया है। केंद्र सरकार में उपलब्ध आंकड़े बताते हैं देश में चारों चरणों (फेज वन से फोर) तक के ट्रायल चलते हैं। फेज वन और टू के ट्रायल जानलेवा हैं और इससे मरीज की जान भी जा सकती है। वर्ष 2009 में ही फेज वन की 33 और फेज टू की 53 ट्रायल हुई हैं। सबसे अधिक कारोबार महाराष्टï्र में हो रहा है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश दूसरे-तीसरे स्थान पर हैं। शहरों में बैंग्लूर सबसे आगे है। पूणे और मुंबई इसके बाद आते हैं।

मप्र में इंदौर, राजस्थान में जयपुर गढ़
विदेशी कंपनियों ने मप्र में इंदौर और राजस्थान में जयपुर को गढ़ बनाया है। वर्ष 2006 से 2009 तक इंदौर में क्रमश: तीन, दो, 13 और 38 ट्रायल हुए हैं, जबकि जयपुर में तीन, 11, 36 और 70 ट्रायल हुए हैं।

मौतें भी हुई
ट्रायल जानलेवा होती हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। जन स्वास्थ्य अभियान जैसे कुछ संगठनों ने अपने स्त्रोतों से जो जानकारी जुटाई है, वह बेहद चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक 2007 में 132, 2008 में 229 और 2009 में 308 लोग ट्रायल का शिकार हुए हैं।

सुविधा से बना ली एथिकल कमेटी
ड्रग एंड कॉस्मेटिक अधिनियम के मुताबिक दवा प्रयोग के लिए एथिकल कमेटी से अनुमति लेना अनिवार्य होता है, लेकिन इन कमेटियों पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकारी क्षेत्र में कमेटियों में वे ही लोग सदस्य हैं जो ट्रायल कर रहे हैं, जबकि निजी क्षेत्र में कमेटी के सदस्यों के नाम ही जगजाहिर नहीं किए गए हैं।


कोई जानकारी नहीं

ड्रग ट्रायल के बारे में हमारे विभाग के पास कोई जानकारी नहीं है। न तो हमें ट्रायल की जानकारी है और न ही इससे प्रभावित होने वाले मरीजों की। मामले में कितनी राशि आती-जाती है, इसके बारे में भी कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
- राकेश श्रीवास्तव, ड्रग कंट्रोलर, मध्यप्रदेश

बस रजिस्ट्रेशन करते हैं

ट्रायल के लिए रजिस्ट्रेशन करना हमारा काम होता है। इसके बाद हम निगरानी नहीं करते हैं। ट्रायल के लिए एथिकल कमेटियां सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। कितना रूपया आता है, इसकी हमारे विभाग के पास कोई जानकारी नहीं होती।
- डॉ. आभा अग्रवाल, डिप्टी डायरेक्टर, क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया



News in Patrika on 18th July 2010

बेहद चतुराई से रोगी को बनाते सब्जेक्ट

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: फ्री दवाई का लालच देकर जीतते हैं भरोसा


विदेशी कंपनी की दवा को बाजार में उतारने से पहले उसे रोगियों पर आजमाने की विद्या 'ड्रग ट्रायलÓ का जाल बेहद चतुराई से फैलाया जाता है। रोगी को मुफ्त दवाई के लालच से फांसा जाता है और कहा जाता है कि उसे एक प्रोजेक्ट में हिस्सेदार बनाया जा रहा है। प्रोजेक्ट के कुछ कागजों पर उससे साइन लिए जाते हैं और शुरू हो जाती है ड्रग ट्रायल।

शहर के कुछ प्रबुद्ध डॉक्टरों ने 'पत्रिकाÓ को बताया जब कोई जरूरतमंद मरीज अस्पताल में आता है  तो उसे कहा जाता है कि डब्ल्यूएचओ भारत के गरीब मरीजों की मदद करता है और उसी से जुड़ा एक कार्यक्रम अस्पताल में चल रहा है। इस कार्यक्रम में आपको शामिल होना है, तो कुछ कागज साइन करना होंगे। इससे आपको मुफ्त दवा मिलना शुरू हो जाएगी। साथ ही जांचें भी फ्री होंगी। मरीज को लगता है इससे अच्छा क्या होगा। उसके राजी होते ही ताबड़तोड़ एक फाइल बनाई जाती है और उससे साइन करवा लिए जाते हैं। फाइल में मरीज का नाम खत्म हो जाता है और उसे एक नंबर दे दिया जाता है। यहीं से वह मरीज से 'सब्जेक्टÓ (विषय) बन जाता है और विदेशी दवा कंपनी की अज्ञात दवा से उसका इलाज शुरू होता है। यह ऐसी दवा होती है, जो केवल संबंधित डॉक्टर के पास ही होती है, बाजार में नहीं मिलती है।

चूंकि सब्जेक्ट से डॉक्टर को बेहद मोटी कमाई होती है, इसलिए उसका विशेष ध्यान रखा जाता है। समय समय पर उसे फोन करके अस्पताल बुलाते हैं। जांच करवाते हैं और कभी-कभी फलों का रस भी पिलाते हैं। कई बार इलाज के दौरान मरीज की तबीयत बिगड़ जाती है, तो कहा जाता है यह सामान्य बात है।


बीमा करवाते हैं, लेकिन क्लेम नहीं दिलवाते
ट्रायल के नियमों के मुताबिक रोगी उर्फ सब्जेक्ट का बीमा करवान अनिवार्य है। डॉक्टर इसका पालन करते हैं, लेकिन जब रोगी की तबीयत बिगड़ती है या उसकी मौत हो जाती है, तो उसे क्लेम नहीं दिलवाया जाता है। दरअसल, क्लेम देने की स्थिति में परिजन पूछ सकते हैं दवा के कारण मौत हुई है क्या? यही वजह है कि इससे बचने के लिए यह तरीका अपनाया जाता है। बीच में मौत होने पर डॉक्टर सब्जेक्ट नंबर वही रहने देते हैं और मरीज बदल देते हैं।

निजी बैंकों में आती रकम
ट्रायल से आने वाली राशि आमतौर पर निजी बैंकों के जरिए आती है, ताकि सरकार एकदम से निगरानी न कर सके। इसके लिए ट्रायल करने वाले डॉक्टरों ने पति या पत्नी या बच्चों के नाम से खाते खुलवा रखे हैं। 


बचने के लिए यह करें मरीज
- डॉक्टर से बीमारी और दवा दोनों के बारे में पूरी जानकारी लें।
- किसी कागज पर साइन करवाएं तो उसकी फोटोकॉपी अवश्य लें।
- मुफ्त में ऐसी ही दवाई लें, जो बाजार में भी बिकती हो।
- इलाज के दौरान तबीयत बिगड़े तो किसी दूसरे डॉक्टर से संपर्क करें।
- कोई जोर-जबरदस्ती करे तो ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करें।


हर डॉक्टर नहीं करता ट्रायल
ट्रायल में शहर के चंद डॉक्टर ही शामिल हैं, शेष डॉक्टर सेवा के इस पवित्र पेशे का मान बढ़ा रहे हैं। वरिष्ठ डॉक्टरों की राय है कि ट्रायल करने वालों के कारण पूरी बिरादरी कटघरे में है और इनसे लोगों को सचेत किया जाना जरूरी है।



चीफ जस्टिस तक शिकायत
- ड्रग ट्रायल के विरोध में सक्रिय हुआ डॉक्टरों का संगठन

ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ शनिवार को राष्टï्रपति, राज्यपाल, मप्र के चीफ जस्टिस और मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेज दी गई। डॉक्टरों से जुड़े एक संगठन ने यह पहल की है। संगठन का कहना है कि चंद डॉक्टरों के कारण पूरी बिरादरी बदनाम हो रही है। डॉक्टरी सेवा का पेशा है और ट्रायल एक धंधा है। इससे मनुष्यों के अधिकारों का हनन हो रहा है।

संगठन का नाम स्वास्थ्य समर्पण सेवा है, जिसके सभी सदस्य मेडिको (डॉक्टर) हैं। संगठन प्रमुख डॉ. आनंदसिंह राजे ने बताया ड्रग ट्रायल के जरिए मरीजों की जान जोखिम में डाली जा रही है। इससे संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन का अधिकार खतरे में है। ट्रायल में कई किस्म की आर्थिक अनियममितताएं भी होती हैं। यही वजह है कि सभी स्थानों पर शिकायत भेजी गई है। इस मामले में राज्य सरकार का रूख बेहद लजर है, जबकि राज्य के लोग खतरे में है।

पत्रिका की खबरों का आधार
संगठन ने शिकायत में पत्रिका की खोजपरक खबरों का जिक्र भी किया है। डॉ. राजे ने बताया अखबार ने इस मुद्दे को छेड़कर समूचे चिकित्साजगत के कान खड़े कर दिए हैं। कई डॉक्टरों को पता ही नहीं था कि इलाज के नाम पर यह गोरखधंधा भी चल रहा है।

News in Patrika on 18th July 2010