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शुक्रवार, अक्टूबर 01, 2010

ड्रग ट्रायल पर सितम्बर में लिखी ६ खबरें

ड्रग ट्रायल की फाइल पहुंची सोनिया दरबार

- दिल्ली में विधिवत कार्रवाई शुरू
- शिकायतकर्ता ने उठाई सीबीआई जांच की मांग


बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) में मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बरती गई कौताही की पूरी फाइल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पहुंच गई है। उन्होंने इस पर विधिवत कार्रवाई भी शुरू कर दी है। शिकायतकर्ता ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है।

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे ने सोनिया गांधी को शिकायत भेज कर तमाम तथ्य उजागर किए थे। उन्हें सोमवार को कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद का एक पत्र मिला है। इसमें लिखा गया है कि मामले को सोनिया गांधी ने अत्यंत गंभीरता से लिया है और उन्होंने संबंधित पक्ष को कार्रवाई करने और इसकी जानकारी देने को कहा है।

दोषियों के बचाव में है राज्य सरकार
डॉ. राजे का आरोप है कि देश-दुनिया में जो मसला उठ चुका है, उसपर ठोस कार्रवाई करने के बजाए राज्य सरकार दोषियों को बचाने में लगी है। करीब दो महीने पूरे हो चुके हैं, लेकिन अभी तक ईओडब्ल्यू ने अंतिम रिपोर्ट तैयार नहीं की है। इतना ही नहीं, विधानसभा में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने जो कमेटी गठित करने की घोषणा की थी, उसकी अभी तक बैठक भी नहीं हुई है।

अमेरिकन सरकार भी मांग चुकी सफाई
'पत्रिकाÓ ने 14 जुलाई के अंक में 'मरीज को बना दिया चूहाÓ शीर्षक से खबर प्रकाशित कर खुलासा किया था कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में आने वाले गरीब और अनपढ़ मरीजों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके बाद मामला विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, आयकर, एमसीआई, आईसीएमआर तक पहुंचा। हाल ही में अमेरिकन सरकार के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने भी भारत सरकार को इस संबंध में पत्र लिखकर सफाई मांगी है।

यह किया उल्लंघन
- एमसीआई द्वारा तय की गई डॉक्टरों की 'मर्यादाओंÓ को लांघा।
- आईसीएमआर के मापदंडों का ताक में रखा।
- मरीजों को धोखे में रखकर ट्रायल में झोंका।
पत्रिका : २८ सितम्बर २०१०

भारतीय मरीज का डीएनए विदेश किसकी अनुमति से भेजा?

- ड्रग ट्रायल के लिए खून के नमूनों की विदेश यात्रा पर उठा सवाल
- आईसीएमआर ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को भेजा पत्र



बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को एक पत्र लिखा है। परिषद जानना चाहती है कि जिन भारतीय रोगियों पर ट्रायल किया गया है, उनके खून के नमूने किसकी इजाजत से विदेश भेजे गए? क्या इसमें नियमों का पालन हुआ है?

कॉलेज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया जिन डॉक्टरों ने ट्रायल किए है, उन्हें आईसीएमआर के पत्र के आधार पर जवाब-तलब किया जा रहा है। यह मसला बायोलॉजिकल प्रोडक्ट कानून से जुड़ा हुआ है। अभी तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया था। माना जा रहा है यह कॉलेज प्रबंधन और पूरे विभाग के लिए नई मुसीबत का कारण बनेगा। उधर, ट्रायल में लिप्त एक डॉक्टर ने 'पत्रिकाÓ को बताया जो दवा कंपनी ट्रायल करवाती है, वह अपनी उ'च क्षमता लेबोरेटरी में नमूनों को परखना चाहती है, यही वजह है कि नमूने विदेश भेजे जाते हैं। उन नमूनों का और क्या इस्तेमाल होता होगा, यह किसी को अंदाजा नहीं है।

आरटीआई से जुड़ा मसला
दरअसल, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता रोली शिवहरे ने आईसीएमआर से सवाल पूछा था कि ट्रायल से गुजर रहे मरीजों के खून, मूत्र, स्वाब आदि के नमूने जांच के लिए विदेश भेजे जाते हैं। इसकी अनुमति ली गई है या नहीं? यदि हां, तो किस कानून के तहत? इन सवालों के जवाब जब आईसीएमआर को नहीं मिले, तो उन्होंने मध्यप्रदेश स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभागों को पत्र लिखकर जानकारी चाही है।



पत्रिका : २६ सितम्बर २०१०
 

फिर से भेजो ड्रग ट्रायल के दस्तावेज

- यूएसएफडीए के संज्ञान के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग का मेडिकल कॉलेज को फरमान

यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा मध्यप्रदेश में हुए ड्रग ट्रायल पर संज्ञान लिए जाने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने नए सिरे से पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेजों से फिर से वे दस्तावेज भोपाल बुलवाए हैं, जिनमें ड्रग ट्रायल की जानकारी छुपी है। कॉलेज में इसको लेकर भारी गहमागहमी बनी हुई है।

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। विभागीय सूत्रों का कहना है पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर ली गई थी, परंतु अब दृश्य बदल गया है। विभाग ने विधानसभा सवालों के जवाब के लिए तैयार दस्तावेजों को एक बार फिर से खंगालना शुरू किया है।

पत्रिका : २२ सितम्बर २०१०

काले कारनामों पर पोत दी कालिख

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज में सूचना का अधिकार का माखौल
- कालिख पोत को जानकारी देने का संभवत: देश का पहला मामला


एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने सूचना का अधिकार कानून का माखौल उड़ाते हुए एकाउंट से जुड़े एक दस्तावेज पर जानबूझकर कालिख पोत दी। आवेदक को यह जानकारी देते हुए कालिख पोतने का जिक्र भी प्रबंधन ने किया है। सूचना का अधिकार का इस तरह से मजाक बनाने की संभवत: यह देश का पहला मामला है।

मामला बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाओं के मरीज पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से जुड़ा है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के सदस्य डॉ. आनंद राय ने कॉलेज के विभिन्न विभागों को ट्रायल के लिए मिले रुपए की ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी। मेडिसिन विभाग ने वर्ष 2010 की ऑडिट रिपोर्ट तो दी लेकिन कई महत्वपूर्ण आंकड़ों पर कालिख पोत दी। ऑडिट रिपोर्ट सरिता मूंदड़ा ने तैयार की है। मूंदड़ा के पते और फोन नंबर पर भी कालिख पोती गई है। साथ ही कवरिंग पत्र में यह भी लिख दिया कि आवेदन द्वारा चाही गई जानकारी से यह संबंधित नहीं है, इसलिए इस पर काले रंग का प्रयोग करके इसे अपठनीय बनाया गया है। उधर, आवेदक का कहना है मैंने संपूर्ण ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी, इसलिए उसका सीधा-सीधा मेरे आवेदन से संबंध है। ट्रायल के नाम पर हुए हेरफेर को छुपाने के लिए यह कार्रवाई की है। इसके विरूद्ध मैं संचालक चिकित्सा शिक्षा को अपील कर रहा हूं।

साढ़े 13 लाख का हिसाब छुपाया
ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट है कि 31 मार्च 2010 तक मेडिसिन विभाग की साइंटिफिक कमेटी के खाते में 13.47 लाख रुपए आए हैं। कालिख से यह छुपा लिया गया है कि यह किन लोगों में बंटा।



जानकारी छुपाने वाले विभाग पर गंभीर आरोप

मेडिसिन विभाग के डॉ. अनिल भराणी, डॉ. आशीष पटेल, पूर्व एचओडी डॉ. अशोक वाजपेयी पर गंभीर आरोप है कि इन्होंने राज्य सरकार को जानकारी दिए बगैर ट्रायल करके अकूत संपत्ति जुटाई है। डॉ. भराणी और डॉ. पटेल ने तो एक ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी बताने तक का खेल कर दिया है।

'संभवत: यह देश का पहला मामला है, जब जानकारी पर कालीख पोती गई है। नि:संदेह जानकारी छुपाने की कोशिश के चलते यह कदम उठाया होगा। वही जानकारी छुपाई जा सकती है, जिससे शांति भंग होने या देश की गोपनीयता को खतरा हो। हम इसे राष्टï्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाएंगे।
- रोली शिवहरे, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

'आवेदक को इसके विरूद्ध अपील करना चाहिए। साथ ही जिस दस्तावेज पर कालिख पोती गई है, उसके लिए फिर से आवेदन लगाना चाहिए।
- गौतम कोठारी, सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

चौतरफा घिरे ड्रग ट्रायल वाले डॉक्टर

- विधानसभा, ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग, एमसीआई, आयकर के साथ ही यूएसएफडीए ने लिया संज्ञान

बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवा का मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) करने वाले एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर चौतरफा घिर गए हैं। लोकायुक्त, आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो, मानवाधिकार आयोग, आयकर और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ ही यूनाइटेड स्टेट्स के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (यूएसएफडीए) ने इसे बेहद गंभीर मानकर जांच शुरू कर दी है। यूएसएफडीए ने इस संबंध में भारत सरकार को पत्र भेजा है। 

'पत्रिकाÓ ने ही ड्रग ट्रायल का खुलासा करके बताया था कि कॉलेज से जुड़े एमवाय अस्पताल और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में आने वाले रोगियों को अंधेरे में रखकर ट्रायल किए जा रहे हैं। इसके बाद मामला विधानसभा पहुंचा और मध्यप्रदेश सरकार ने कानूनी बंदिश के लिए एक कमेटी का गठन किया। चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुïख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनी यह कमेटी ट्रायल को नियंत्रित  करने के लिए केंद्र सरकार और दूसरे राज्यों के कानूनी प्रावधानों की पड़ताल कर रही है।

 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव
ड्रग ट्रायल से रा'य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज ले रहे थे। यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उजागर हुई है। सरकार ने विधानसभा को बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 ब'चे और 721 वयस्क हैं। जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुए हैं, उनके नाम अभी जाहिर नहीं किए गए हैं। आशंका है कि इनमें से कुछ की मौत हो चुकी है।

मरीज की सेहत और डॉक्टर के एकाउंट पर नजर

यूएसएफडीए
'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद रशिया टीवी ने एमवाय अस्पताल में ट्रायल को लेकर एक खबर अंतरराष्टï्रीय स्तर पर प्रसारित की थी। रिपोर्ट में जिक्र था कि अमेरिकन कंपनियों की शह पर यहां गरीब मरीजों पर प्रयोग हो रहे हैं। इसी पर यूएसएफडीए ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश में हुए ट्रायल का विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

विधानसभा
विधायक पारस सकलेचा, प्रताप ग्रेवाल और प्रद्युम तोमर ने विधानसभा में पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो रहे ट्रायल को लेकर जो सवाल पूछे थे। उनके जवाब आज तक  सरकार ने नहीं दिए हैं। मानसून सत्र में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने कहा था ट्रायल को काबू करने के लिए सरकार कानून बनाना चाहती है।

ईओडब्ल्यू
स्वास्थ्य सेवा समर्पण सेवा समिति अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर भोपाल ईओडब्ल्यू ने डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. हेमंत जैन और डॉ. पुष्पा वर्मा के खिलाफ जांच शुरू कर रखी है। सभी डॉक्टरों के एकाउंट की जांच जारी है।

लोकायुक्त
ट्रायल करने वाले डॉक्टरों, एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और एथिकल कमेटी के सदस्यों के खिलाफ लोकायुक्त में भी शिकायत हो चुकी है। आरोप है कि सभी ने मिलकर गरीब और अनपढ़ मरीजों की जान जोखिम में डाली है। लोकायुक्त ने शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता को 14 अक्टूबर को भोपाल बुलाया है।

मानवाधिकार आयोग
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों पर संज्ञान लेकर  मप्र मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन जस्टिस डीएम धर्माधिकारी, सदस्य जस्टिस एके सक्सेना व जस्टिस वीके शुक्ल ने एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव को नोटिस भेजा है। आयोग जानना चाहता है कि मरीजों के अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा।

आयकर
'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर आयकर विभाग ने मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से उन सभी डॉक्टरों की आय का ब्यौरा मांगा है, जो ट्रायल में लिप्त हैं। विभाग की जिज्ञासा इसमें है कि कहीं डॉक्टरों ने बेनामी संपत्ति तो नहीं जुटा ली। 

एमसीआई

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को जो शिकायत भेजी गई थी, उसी पर मप्र के चिकित्सा शिक्षा संचालक से पूरा ब्यौरा मांगा गया है। सभी मेडिकल कॉलेज इसका जवाब तैयार कर रहे हैं। 'पत्रिकाÓ पूर्व में ही यह जानकारी प्रकाशित कर चुका है।



पत्रिका : २१ सितम्बर २०१०

ड्रग ट्रायल का एक ओर कागज ईओडब्ल्यू पहुंचा

मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल द्वारा एक ड्रग ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी पहुंचाने का दस्तावेज भी ईओडब्ल्यू पहुंच गया है। वहां इसे जांच में भी लिया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू इसे गंभीर आर्थिक अपराध मान रहा है, क्योंकि कॉलेज को कंपनी बताने की जानकारी कॉलेज प्रबंधन को नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने ही इसका खुलासा किया है।


एसबीआई सुने चार अफसरों का केस
स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के चार अधिकारियों की याचिका का हाईकोर्ट ने निराकरण कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया है कि चूंकि अब इंदौर बैंक का विलय स्टेट ऑफ इंडिया में हो चुका है, इसलिए उनकी बात वहीं सुनी जाना चाहिए। चारों अधिकारियों का इंदौर बैंक ने तबादला कर दिया था। इसे ही चुनौती देने के लिए वे हाईकोर्ट गए थे। सिंगल बैंच ने इसे खारिज कर दिया था और मामला युगलपीठ में लंबित था।


 
पत्रिका : ०३ सितम्बर २०१०

शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

ड्रग ट्रायल से 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट

- विधानसभा के दस्तावेज में मंत्री ने मंजूर की सच्चाई

बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज के लिए गए थे।

यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उपलब्ध है। चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने विधानसभा में यह जानकारी दी थी। उन्होंने यह भी बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 बच्चे और 721 वयस्क हैं।

कुछ की मौत की आशंका
आशंका है कि जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुआ है, उनमें से कुछ की मौत भी हुई होगी। वैसे भी, सूचना का अधिकार में प्राप्त एक दस्तावेज में जबलपुर के कैंसर अस्पताल में एक महिला रोगी की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इंदौर के चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैन ने भी मंजूर किया है कि ट्रायल के दौरान एक बच्चे की मौत हुई थी और इसकी जानकारी एथिकल कमेटी को दे दी गई थी।

सूची का वादा किया था, पर नहीं दी
रतलाम के विधायक पारस सकलेचा ने बताया 30 जुलाई को ट्रायल के मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बहस के आखिर में चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री ने वादा किया था कि सभी मरीजों की सूची दी जाएगी, किंतु अब तक यह प्राप्त नहीं हुई है। इसके लिए चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी से भी चर्चा की है। 

पत्रिका: १९ अगस्त २०१० 

रविवार, अगस्त 08, 2010

परिजन पर क्यों नहीं किए ट्रायल?

डॉक्टरों ने दी ड्रग ट्रायल पर सफाई, डीन को भी दी जाती है पूरी राशि की जानकारी

ड्रग ट्रायल के आरोपों से घिरे डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल क्या है और इससे क्या लाभ हैं इसे लेकर डॉक्टरों ने होटल क्राउन पैलेस में गोष्ठी का आयोजन किया। डॉक्टरों ने बताया कि कोई भी कंपनी डॉक्टर की योग्यता देखकर ही अनुबंध करती है। डॉक्टरों ने कहा कि कंपनियों से मिलने वाली राशि का खुलासा आयकर विभाग के समक्ष किया जाता है। इसमें कोई चोरी नहीं की जाती। मरीजों की सहमति से किए जाने वाले ट्रायल में किसी तरह की आशंका की गुंजाइश नहीं रह जाती।

ट्रायल विश्व के सभी विकसित और विकासशील देशों में किए जा रहे हैं। यह रोजगार के अवसर पैदा करता है और अनुसंधान में देश को आगे ले जाता है। गोष्ठी में कॉलेज डीन की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया। ट्रायल के माध्यम से मिलने वाली राशि की पूरी जानकारी डीन को भी दी जाती है। बैठक में ये सवाल भी उठा कि क्यों गरीब मरीजों पर ही ट्रायल किए जाते हैं? कितने डॉक्टरों ने परिवार के सदस्यों पर ट्रायल किए? इनमें से किसी भी सवाल का जवाब डॉक्टर नहीं दे सके। बैठक में पूर्व कुलपति और ट्रायल का कानून तैयार कर रहे डॉ. भरत छपरवाल, डॉ. सरोज कुमार, अभय छजलानी, इथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी, डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. आरके माथुर, डॉ. पूनम माथुर, डॉ. उज्ज्वल सरदेसाई व जूनियर डॉक्टर आदि मौजूद थे।

news in Patrika on 7th August

रविवार, अगस्त 01, 2010

शोध नहीं है ड्रग ट्रायल


एमसीआई के पत्र का साफ संदेश


ड्रग ट्रायल शोध है या नहीं? इस बहस का जवाब चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी सर्वोच्च संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के एक नियम में मिलता है। एमसीआई के मुताबिक जब ड्रग ट्रायल के परिणाम भारत में प्रकाशित किए जा सकें, तभी यह शोध है। यदि दवा कंपनी ऐसा नहीं करने देती है, तो ट्रायल किया ही नहीं जाना चाहिए।

एमसीआई ने इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन करके यह बात गत वर्ष ही स्पष्ट की है। दरअसल, भारत सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 में वर्ष 2005 में संशोधन किया तो देशभर में डॉक्टरों ने शोध के नाम पर ड्रग ट्रायल शुरू कर दिए, परंतु इसके परिणामों को छापने की अनुमति किसी को नहीं मिली। डॉक्टर से समझौता करने वाली स्पांसर कंपनी ने ड्रग ट्रायल के परिणामों को प्रकाशित करने का अधिकार स्वयं के पास सुरक्षित रखती हैं। एमसीआई ने इसी बंधन से ट्रायल को मुक्त रखने के लिए नए नियम जारी किए।

आईसीएमआर के ट्रायल शोध
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) देशभर में जो भी ट्रायल करवाती है, उन्हें चिकित्सा जगत में शोध का दर्जा दिया गया है। पोलियो की दवा, स्वाइन फ्लू का टीका ऐसे ही ट्रायल हैं। इनके नतीजों को भारत सरकार द्वारा प्रकाशित किया जाता है और ये देश में चिकित्सा विज्ञान की प्रगति में सहायक साबित होते हैं। बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के परीक्षण के नतीजों पर कंपनी का अधिकार रहता है।




जवाब भी तैयार नहीं कर पाई सरकार
 बीस दिन में भी नहीं जुटी जानकारी
 तीनों विधायकों के प्रश्न अब तक बेजवाब


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भले ही सरकार ने कायदे कानून बनाने की घोषणा कर दी हो, लेकिन अभी भी तीन विधायकों के प्रश्नों के जवाब तैयार नहीं हुए हैं। इन विधायकों ने सरकार से सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में ड्रग ट्रायल की जानकारी चाही थी।

सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल, रतलाम के पारस सकलेचा और ग्वालियर के प्रदुम्म तोमर ने तारांकित प्रश्न पूछे थे। बीस दिन पहले (12 जुलाई) को ग्रेवाल का सवाल सभी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचा था। सदन ने ग्रेवाल को सूचना दी थी कि 23 जुलाई को जवाब दे दिया जाएगा, परंतु जब उन्होंने मांगा तो कहा गया जानकारी जुटाई जा रही है। ऐसा ही जवाब सकलेचा और तोमर को मिला।

प्रक्रिया पर सवालिया निशान
विधानसभा में पूछे जाने वाले सवाल के जवाब तय समय सीमा में देने जिम्मेदारी सरकारी अमले की है। मीडिया में जब मामला आ जाए, तो और भी सक्रियता के साथ जानकारी तैयार की जाना चाहिए, परंतु इस मसले में ऐसा नहीं किया गया।

अनियमितता दबाने की कोशिश तो नहीं
ड्रग ट्रायल में बहुत अधिक राशि का लेन-देन होता है। एक मरीज के लिए डॉक्टर को औसतन दो से पांच लाख रुपए मिलते हैं। माना जा रहा है कि इसी पर परदा डालने के लिए जानकारी रोकी गई है।

इन सवालों में अटकी सरकार
- ड्रग ट्रायल कराने वाली कंपनियों से किस डॉक्टर को कितनी राशि मिली?
- जिन मरीजों पर ट्रायल किया गया, क्या उन्हें इसकी जानकारी दी गई? यदि हां, तो नाम बताएं।
- किसी भी राशि के लेनदेन के लिए किससे इजाजत ली गई?
- पांच वर्ष में कितने डॉक्टर विदेश गए और उन्हें किस कंपनी ने भेजा? क्या वे अनुमति लेकर गए?


News in PATRIKA on 02 Aug 2010

निजी अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल का धोखा

ड्रग ट्रायल
कई अस्पतालों में धड़ल्ले से निशाना बन रहे मरीज
स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है कोई जानकारी











बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का परीक्षण (ड्रग ट्रायल) केवल सरकारी एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में ही नहीं हो रहा है। कई निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में भी यह काम जोरों पर है। ऐसा भी नहीं है कि किसी एक बीमारी के रोगियों पर ही ट्रायल चल रहे हैं। दिल के ऑपरेशन में लगने वाले स्टेंट से लेकर इनहेलर तक और डायबिटीज से लेकर कैंसर तक के रोगियों तक पर प्रयोग हो रहे हैं। 

भारत सरकार के क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया (सीटीआरआई) का रिकॉर्ड बताता है कि मप्र में सबसे अधिक ट्रायल इंदौर में किए जा रहे हैं। पिछले चार वर्ष (२००६-२००९) के आंकड़ों पर गौर करें तो मप्र में ८३ दवाओं के ट्रायल किए गए इनमें से ५६ ट्रायल इंदौर में हुए, जबकि २७ ट्रायल भोपाल सहित प्रदेश के अन्य शहरों में किए गए।

निजी अस्पतालों में हो रहे ड्रग ट्रायल के बारे में विभाग के पास कोई जानकरी उपलब्ध नहीं है। नियम देखकर इनके बारे में पड़ताल की जाएगी।
- डॉ. शरद पंडित, सीएमएचओ, इंदौर

ये हैं कुछ निजी डॉक्टर

1. डॉ. सुनील एम. जैन
अस्पताल- टोटल (डायबिटीज थॉयरॉइड हॉरमोन रिसर्च इंस्टीट्यूट)
कंपनी - बोईरिंगर इंगेल्हिम फार्मास्यूटिकल्स सहित कुछ अन्य कंपनियां
उत्पाद - बीआई १३५६ (५ एमजी) सहित कुछ अन्य उत्पाद
बीमारी - डायबिटीक मरीजों में ग्लायकेमिक

२. डॉ.गोविंद एन.मालपानी
अस्पताल-  सुयश
कंपनी - ल्यूपिन
उत्पाद - एलएलएल २०११, नेसल स्प्रे
बीमारी - माइग्रेन


3. डॉ.एके पटेल
अस्पताल-  चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - पेल्सीटेक्सल, सिस्प्लेटिन (किमोथेरेपिक एजेंट)
बीमारी - स्मॉल सेल लंग केंसर 


4. डॉ. सुशील भाटिया
अस्पताल- चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - मायकोबैक्टेरियम विथ डॉसिटेक्साल
बीमारी - प्रोस्टेट केंसर

5. डॉ.गिरीश के कवठेकर
 अस्पताल  - सीएचएल अपोलो अस्पताल
 कंपनी  - इन्फीनियम-कोर
 उत्पाद   - कोरोनरी स्टेंट
 बीमारी  - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


6. डॉ.विनोद सोमानी
अस्पताल -  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


7. डॉ. शैलेंद्र त्रिवेदी
अस्पताल-  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


8. डॉ. नितीन मोदी
अस्पताल- सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


9. डॉ. बीएस ठाकुर
अस्पताल-  गे्रटर कैलाश
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स व जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 


10. डॉ. अतुल शेंडे
अस्पताल - मानव ट्रेड सेंटर स्थित क्लिनिक
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स और जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 

11. डॉ. प्रवर पासी
अस्पताल- ग्रेटर कैलाश 
कंपनी - बायोजेन आइडेक
उत्पाद - १२५ एमसीजी, बीआईआईबी ०१७
बीमारी - मल्टीपल सिरोसिस

( खबर शैलेष दीक्षित से साभार)

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आंध्रप्रदेश के कानून पर कमेटी की निगाह 
 प्रमुख सचिव के साथ डीएमई और डॉ. छपरवाल भी शामिल

बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के परीक्षण (ड्रग ट्रायल) को प्रदेश में काबू करने के लिए नियमावली बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यी कमेटी की निगाह आंध्रप्रदेश के कानून पर है। वहां ड्रग ट्रायल को प्रतिबंधित किया गया है। कमेटी संभवत: एक माह में रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी।

स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने शुक्रवार को विधानसभा में कमेटी गठित करने की घोषणा की थी। शनिवार को 'पत्रिकाÓ से चर्चा में उन्होंने बताया चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनाई कमेटी में संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी और एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल सदस्य रहेंगे।

उधर, दाणी ने बताया फिलहाल ड्रग ट्रायल के संबंध में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट लागू किया गया है। अध्ययन करने के बाद ही स्पष्ट होगा कि राज्य सरकार इस बारे में क्या कर सकती है? दोनों अन्य सदस्यों के साथ शीघ्र ही बैठक की जाएगी। कोशिश रहेगी कि एक महीने में रिपोर्ट बनाकर दे दी जाए। डॉ. छपरवाल ने बताया फिलहाल मुझे कमेटी के सदस्य बनाए जाने की जानकारी नहीं मिली है। मौजूदा कानूनों और गाइडलाइन का अध्ययन करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।



सीबीआई, एमसीआई को भी शिकायत
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) में जांच शुरू होने के साथ ही एमजीएम मेडिकल कॉलेज के ड्रग ट्रायल की शिकायत सीबीआई और एमसीआई को भी पहुंच चुकी है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने बताया दोनों स्थानों पर शपथ पत्र के साथ शिकायत की गई है।

शनिवार, जुलाई 31, 2010

ड्रग ट्रायल पर कानूनी अंकुश

Mahendra Hardia
ड्रग ट्रायल के लिए नियम व दिशा-निर्देश बनाने के वास्ते प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी। इसकी सिफारिश आने के बाद अगर जरूरी होगा तो विधानसभा में विधेयक लाकर कानून बनाने पर सरकार विचार करेगी।
महेंद्र हार्डिया, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री

चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री हार्डिया ने की विधानसभा में घोषणा
नियम और दिशा-निर्देश बनाने के लिए बनाई कमेटी


बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाओं के रोगियों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए राज्य सरकार ने नियम-कायदे बनाने की घोषणा की है। लोक स्वास्थ्य परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री महेंद्र हाॢडया ने शुक्रवार को विधानसभा में चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने की घोषणा की।
उन्होंने कहा कि रिपोर्ट आने के बाद जरूरी हुआ तो कानून भी बनेगा। हार्डिया ने यह घोषणा कांग्रेस के अजय ङ्क्षसह और प्रताप ग्रेवाल व अन्य की ध्यानाकर्षण सूचना पर की। उन्होंने कहा, इंदौर मेडिकल कॉलेज में मरीजों पर ट्रायल नियम विरुद्ध मिला तो जांच कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

मरीजों की संख्या गलत
सरकार ने बताया सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 2365 पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 बच्चे थे। 'पत्रिकाÓ को प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में ही 3500 रोगियों पर ट्रायल हो चुके हैं। वहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्मेंद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए।

मंत्री भी हुए शिकार
मानसून सत्र के अंतिम दिन विस में ड्रग ट्रायल का मामला गूंजा। डेढ़ घंटे की चर्चा में इसे लेकर कई सवाल उठे। पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने बताया,1957 में उनपर ड्रग ट्रायल हुआ। इससे उन्हें चेचक निकल आई। उन्होंने कहा, मैं प्रभावित हूं। तब नियम नहीं था और न बीमे की व्यवस्था।   

ये विधायक चर्चा में शामिल:
अजय सिंह, प्रताप ग्रेवाल, एनपी प्रजापति, प्रद्युम्न सिंह तोमर (कांगे्रस), पारस सकलेचा (निर्दलीय), यशपाल सिंह सिसोदिया और सुदर्शन गुप्ता (भाजपा)


एथिक्स कमेटी रखती है निगरानी :  हार्डिया
हार्डिया ने विधानसभा को बताया भारत के ड्रग एवं कॉस्मेटिक एक्ट-1940 और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के दिशानिर्देशों के अनुसार ड्रग टायल संचालित किए जाते हैं। प्रत्येक संस्था में इसकी अनुमति देने व उस पर निगरानी के लिए एक एथिक्स कमेटी गठित की जाती है। इसके संचालन के लिए प्रायोजित औषधि कंपनी, अन्वेषणकर्ता चिकित्सक एवं कुछ मामलों में संस्था के प्रमुख के माध्यम से अनुबंध होता है। इसकी जानकारी एथिक्स कमेटी के सदस्यों को दी जाती है।


विधानसभा में सरकार को विरोध का डोज

ड्रग ट्रायल विषय पर शुक्रवार को विधानसभा में रखे गए ध्यानाकर्षïण प्रस्ताव में विधायकों ने सरकार को जमकर ïघेरा। विधायकों ने कई सवालों के जरिए पूरे मामले में  स्पष्टीकरण मांगा। इस पर स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने जवाब दिए।

पारस सकलेचा: एथिक्स कमेटी ने कब-कब उन मरीजों का निरीक्षण किया है, जिन पर ड्रग ट्रायल हुआ? इनकी वर्तमान स्थिति क्या है, ट्रायल के बाद क्या हुई और घातक रोग होने के बाद उन्हें कितनी बीमा राशि दी गई?
हार्डिया: इंदौर में एथिक्स कमेटी गठित है, जिसके चेयर पर्सन प्रोफेसर केडी भार्गव हैं। आज तक किसी भी मरीज ने उनसे जाकर शिकायत नहीं की। यदि सकलेचा के पास कोई शिकायत है तो बता दें हम उसकी जांच करा लेंगे।

प्रद्युम्नसिंह तोमर: जितने मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया गया, क्या उनकी सहमति ली गई। कितने डॉक्टर इसके चलते विदेश गए?
हार्डिया: चार डॉक्टरों को विदेश जाने की अनुमति दी गई।

यशपालसिंह सिसोदिया: क्या आगामी सत्र में विधेयक लाकर कानूनी रूप देकर ड्रग ट्रायल माफियाओं पर शिकंजा कसा जाएगा?
हार्डिया: मैं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित करने की घोषणा करता हूं।

अजय सिंह- ड्रग ट्रायल के लिए अनुमति कहां से मिली और कितने मरीजों पर ट्रायल किया गया? क्या उनका क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया में रजिस्ट्रेशन हुआ है? कितने मरीजों का बीमा कराया गया था इसमें से कितने को राशि मिली?
हार्डिया- जो कंपनियां ट्रायल कर रही हैं, उन्होंने अनुमति ली है। जहां तक शिकायतों का सवाल है तो सरकार के पास कोई शिकायत नहीं है। कोई मामला विधायक के पास हो तो जरूर बता दें।

अजय सिंह- आंध्रप्रदेश में ड्रग ट्रायल प्रतिबंधित है। सरकार को चाहिए कि मध्यप्रदेश में भी इसे प्रतिबंधित करे। मरीजों से अंग्रेजी के कागज पर अनुमति के दस्तखत करा लिए जाते हैं।
हार्डिया- अनुज्ञा पत्र हिंदी में है।

प्रताप ग्रेवाल- मैंने सूचना के अधिकार में सहमति पत्र लिए हैं। इसमें ड्रग ट्रायल संबंधी कोई जानकारी नहीं है। वास्तविकता यह है कि फार्म अंग्रेजी में है और करीब पांच से छह पेज का है। यह फार्म किसी पढ़े लिखे को भी समझ नहीं आ सकता।
हार्डिया- विधायक मुझे ये फार्म दें। मैं इसे दिखवा लूंगा। इसमें कोई अनियमितता हुई होगी तो उस पर सख्त कार्रवाई होगी।

ग्रेवाल- एथिक्स कमेटी के सदस्यों के नाम और उनके फोन नंबर अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में एक बोर्ड पर लिखे होने चाहिए, ताकि जिन मरीजों पर ड्रग ट्रायल हो रहा है, वे इन्हें अपनी समस्या बता सकें।
हार्डिया- ये सब सेंट्रल एक्ट से संचालित होता है। मैंने यह भी पता किया था कि क्या अन्य राज्यों में इस तरह का कोई कानून है। पता चला कि किसी भी राज्य में ड्रग ट्रायल संचालित करने का कोई कानून नहीं है।

News in PATRIKA on 31th July 2010

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

हमें मरीज की जानकारी नहीं रहती

Justice PD Mulaye
  

ड्रग ट्रायल मामले में एथिकल कमेटी सदस्य जस्टिस मूले की साफगोई
स्वास्थ्य राज्य मंत्री हार्डिया ने गड़बड़ी की जिम्मेदारी कमेटी पर डाली


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों का एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले रोगियों पर धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के मामले में रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये की साफगोई से पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है। ट्रायल को मंजूरी देने वाली कॉलेज की एथिकल कमेटी के सदस्य मूल्ये ने कहा है कि हमें मरीजों की कोई जानकारी नहीं रहती है। रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज देखकर कमेटी केवल अनुमति देती है। इसके बाद डॉक्टर मरीजों के साथ क्या करते हैं, इसके लिए न तो कमेटी जिम्मेदार है और न ही वह इसकी निगरानी करती है।

बुधवार दोपहर भोपाल में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा कि इंदौर के मेडिकल कॉलेज की कमेटी में जस्टिस मूल्ये जैसे लोग शामिल हैं, इसलिए वहां हो रहे ट्रायल पर शंका नहीं की जा सकती है। इस बयान पर 'पत्रिकाÓ ने जस्टिस मूल्ये से विस्तार से चर्चा की।


ट्रेन का टिकट देते हैं, यात्रा की जानकारी नहीं

प्र- एथिकल कमेटी में आप क्या देखते हैं?
उ- हम संबंधित विभाग और कंपनी की अनुमति देखते हैं। इससे अधिक कुछ नहीं।
प्र- जिन शर्तों पर अनुमति देते हैं, उनका पालन कौन करवाता है?
उ- यह हमारा काम नहीं है। हम प्राथमिक अनुमति देते हैं। ट्रायल बाद में शुरू होता है। न तो हम अस्पताल जाते हैं और न ही उस क्लिनिक में जहां ट्रायल का काम चलता है।
प्र- आपको कितने रुपए मिलते हैं?
उ- एक बैठक के 1000 रुपए मिलते हैं। अब तक 12-13 बैठकों में गया हूं।
प्र- आपको नहीं लगता कि ट्रायल में पारदर्शिता बढ़ाई जाना चाहिए?
उ- उसका मुझे कुछ मालूम नहीं। यह काम कॉलेज का है। हम तो केवल कागज देखते हैं।
प्र- मरीजों के साथ क्या हो रहा है, इस पर आपकी कितनी नजर रहती है?
उ- हमारी कमेटी ट्रेन का टिकट देती है। इसके बाद यात्रा शुरू होती है। टिकट देने वाले को बाकी यात्रा की जानकारी नहीं रहती।
प्र- मंत्री हार्डिया कह रहे हैं, आप हैं तो ट्रायल में शंका नहीं की जा सकती?
उ- हम अनुमति देने तक सीमित हैं, इसके बाद क्या होता है, जानकारी नहीं रहती है।
(रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये से चर्चा)



कॉलेज के भीतर से उठे विरोध के स्वर

ड्रग ट्रायल के खुलासे के बाद कुछ डॉक्टरों ने पूरे मामले को ठंडा करने की कोशिश शुरू की, लेकिन इसका विपरीत प्रभाव हुआ। कॉलेज के भीतर से ही कुछ डॉक्टरों ने विरोध शुरू कर दिया है। ट्रायल के घेरे में आए डॉक्टर चाहते हैं कि पूरा कॉलेज उनका साथ दे, परंतु दूसरे सभी लोगों का कहना है जिसने गलती की है वह स्वयं अपनी लड़ाई लड़े।

'ड्रग ट्रायल मसले से पूरे कॉलेज की बदनामी हो रही है। हम चाहते हैं कि इस पूरे मामले को पूरे चिकित्सा जगत से जोड़कर नहीं देखा जाए। जिसने गलती की है, उसे सजा अवश्य मिलना चाहिए। साथ ही इस विषय से जुड़ी सभी भ्रांतियां भी दूर की जाना चाहिए।Ó
- विक्रांत भूरिया, अध्यक्ष, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन

'भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा ड्रग ट्रायल के लिए तय किए गए मापदंडों का एमजीएम मेडिकल कॉलेज में पालन नहीं हुआ है। बहुराष्टï्रीय कंपनियां भारत के लोगों को निशाना बना रही है और ताज्जुब की बात तो यह है कि केंद्र व राज्य सरकार ने इसके लिए कोई निगरानी तंत्र तक नहीं बनाया। मरीजों के हित में ट्रायल बंद किया जाना चाहिए।Ó
- डॉ. आनंद राय, अध्यक्ष, मप्र रेसीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन

'चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के लिए ड्रग ट्रायल अनिवार्य है, लेकिन देश में इसके संबंध में बने कानून पर पुनर्विचार करना चाहिए। कानून में कई कमियां है, इसी कारण ट्रायल का दुरुपयोग हो रहा है। अंग प्रत्यारोपण जैसा सख्त कानून लागू किया जाना चाहिए ताकि ट्रायल पर पूरा नियंत्रण रहे।Ó
- डॉ. सुमित शुक्ला, उपाध्यक्ष, मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन

'जिन डॉक्टरों पर मरीजों के दुरुपयोग का आरोप लगा है, उन्हें कॉलेज से दूर करके पूरे मामले की जांच की जाना चाहिए। डॉक्टरों पर आरोप सिद्ध न हो तो उन्हें फिर से कॉलेज बुलाया जा सकता है। फिलहाल वे रहे तो जांच प्रभावित हो सकती है क्योंकि वैसे ही ट्रायल मामले में पारदर्शिता की बेहद कमी है।Ó
- शिवाकांत वाजपेयी, अध्यक्ष, मप्र रेडियोग्राफर्स एसोसिएशन



विधानसभा में आज उठेगा मुद्दा
शुक्रवार को विधानसभा में 'पत्रिकाÓ द्वारा उठाए गए ड्रग ट्रायल के मुद्दे पर बहस होगी। रतलाम के विधायक पारस सकलेचा, सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल, इंदौर के सुदर्शन गुप्ता, मंदसौर के यशपालसिंह सिसौदिया समेत करीब सात विधायकों ने इस मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव दर्ज करवाया है।

News in PATRIKA on 30th July 2010

बुधवार, जुलाई 21, 2010

ये कैसे अस्पताल

एमवायएच, चेस्ट सेंटर और चाचा नेहरू अस्पताल में प्रशासन की अनुमति के बगैर संचालित हो रहे ऑफिस
कई बाहरी लोग महीनों से कर रहे काम, फैक्स, टेलिफोन की भी नहीं ली अनुमति
ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा

निर्माणाधीन केमिकल फार्मूले (दवा) के मरीजों पर प्रयोग के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े तीन अस्पतालों में ऐसे दफ्तर खुले हैं, जो ड्रग ट्रायल के केंद्र हैं। इनमें करीब तीन दर्जन लोग काम करते हैं, जिन्हें ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टर ही तनख्वाह देते हैं। इन दफ्तरों में कम्प्यूटर, स्केनर, प्रिंटर के साथ ही फैक्स और अलग से लैंड लाइन फोन भी लगे हैं। इस सबकुछ के लिए किसी से भी इजाजत नहीं ली गई।
कैमरा देखते ही भागखड़े हुए

एक
चेस्ट सेंटर के एक कोने में बने कमरा नंबर छह में पल्मोनरी फंक्शन लेब में ड्रग ट्रायल होता है। इसमें किसी को झांककर देखने की अनुमति भी नहीं है। कैमरा देखते ही काम कर रहे संजयसिंह चौहान ने कमरा बंद कर लिया और मेडिसिन विभाग के जूनियर डॉक्टर को बुलाने भागा। डॉक्टर ने कहा इन्हें कमरे में मत जाने देना। संजय ने बताया मैं यहां डॉक्टर साहब का काम करता हूं।

दो
एमवाय अस्पताल की तल मंजिल स्थित डॉ. अपूर्ण पुराणिक के चेंबर के बाहर वाले कमरे में बक्सों के ठेर रखे हुए हैं। विदेशों से दवाइयां इन्हीं में पैक होकर यहां पहुंचती है। उनके कर्मचारियों ने बताया अंदर तो फैक्स और टेलिफोन भी लगे हैं। इसकी जानकारी एमवायएच अस्पताल प्रबंधन को दे रखी है।

तीन
एमवायएच की चौथी मंजिल के कमरा नंबर 419 बी में तीन से चार एवजी काम करते हैं। कमरे का दरवाजा खुलते ही बंद हो जाता है। कैमरा देखते ही राकेश नाम के कर्मचारी ने कहा यहां फोटो मत खींचो। उसने अपने चेहरे को हाथ से दबाने की कोशिश भी की। बाहर निकलते हुए अरविंद खुद को ईसीजी टेक्नीशिन बताता है। फोटो लेने पर भागकर पास के ही एक कमरे में जाकर वहां मौजूद जूनियर डॉक्टरों को बताता है। वे बाहर आकर मोबाइल लगाना शुरू कर देते हैं।

 चार
चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के कमरा नंबर 14 में दो युवतियां और चार युवक कार्यरत थे। वहां से फाइलों से भरे बक्सों को बाहर किया जा रहा था। मौजूद आशीष दुबे ने विरोध किया आप किसकी अनुमति से फोटो खींच रहे हैं। जब उनसे प्रतिप्रश्न हुआ आप किसकी अनुमति से यहां काम कर रहे हो, तो वे चुप हो गए। उन्होंने तत्काल कर्मचारी को कहा कमरा बंद कर लो।


संजय नाम का कोई व्यक्ति हमारा कर्मचारी नहीं है और न ही किसी को फैक्स या टेलीफोन लगाने की अनुमति दी गई है।
- डॉ. एम. हरगुनानी, अधीक्षक, चेस्ट सेंटर

हमारे यहां वैक्सीन पर ड्रग ट्रायल हो रहा है और इसी के दस्तावेजी काम के लिए कुछ नॉन मेडिको लोग काम करे हैं। वे हमारे कर्मचारी नहीं है।
- डॉ. शरद थोरा, अधीक्षक, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय

मुझे जानकारी नहीं है कि अस्पताल में कोई गैर व्यक्ति भी कार्यरत है। अस्पताल में किसी ने अलग से फैक्स या टेलिफोन लगा रखे हैं, तो यह अवैधानिक है। मुझसे किसी ने भी इजाजत नहीं ली है।
- डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवाय अस्पताल

मुझे अभी तक किसी ने जानकारी नहीं दी है। इस संबंध में मैं अस्पताल अधीक्षकों से पूछताछ करूंगा।
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

उठते सवाल
- अस्पताल के मरीजों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?
- महीनों से अनजान लोग अस्पताल में काम कर रहे हैं, फिर भी अनदेखी क्यों की गई?
- दफ्तरों में हो रहे बिजली खर्च के लिए कौन है जिम्मेदार?




शोध के नाम पर धोखा


एमजीएम मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टर ड्रग ट्रायल को अपने शोध का विषय बताकर पेश कर रहे हैं। कॉलेज की ही एक प्रोफेसर ने इसकी पुरजोर विरोध भी किया है। उन्होंने कहा है यह शोध नहीं है, बस ट्रायल है। इसमें पीजी छात्रों को नहीं जुडऩा चाहिए।
जनवरी 2009 में कॉलेज काउंसिल की बैठक में थीसिस रिव्यू कमेटी की चेयरमैन डॉ. प्रीति तनेजा ने ड्रग ट्रायल का मसला उठाते हुए कहा था कि पीजी छात्र ट्रायल को रिसर्च की तरह पेश कर रहे हैं, जबकि इसकी इजाजत नहीं है। इस पर तत्काल बंदिश लगना चाहिए। डॉ. तनेजा का विरोध कुछ दिन चर्चा में रहा और बाद में इस कार्य में शामिल कुछ प्रोफेसर ने कॉलेज डीन कक्ष के सामने वाले हॉल में रंगरोगन, टाइल्स और कुलर का इंतजाम करवाकर मामला शांत कर दिया।

इन विभागों में सबसे अधिक ट्रायल
मेडिसिन, आर्थोपेडिक्स, नेत्ररोग, शिशु रोग, न्यूरोलॉजी, चेस्ट और सर्जरी विभागों में ड्रग ट्रायल सर्वाधिक होते हैं। कैंसर अस्पताल में भी कुछ कंपनियों के प्रस्ताव लंबित हैं।

दवा कंपनियां व संस्थाएं
पेनेशिया बायोटेक, मर्क शॉप एण्ड डोम, नोवर्टिस, एलजी लाइफ साइंस, जॉन्सन एण्ड जॉन्सन, सिरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, क्रूसिल, नोवर्टिस, फॉरेडिल, इनहेल्ड मोमेटेसोन फ्यूरेट, फॉर्मेट्रॉल कॉम्बीनेशन और फॉर्मेट्रॉल, टेलावेंसीन वर्सेस वेन्सोमायसिन, ऑस्ट्रेलियन मेडिकल काउंसिल, सेंट जोंस मेडिकल कॉलेज बैंग्लूरू, मैक मास्टर यूनिवर्सिटी कनाड़ा, केडिला फार्मास्यूटिकल्स, बीएमएस, पीपीडी, सर्वियर, ड्यूक मेडिकल यूनिवर्सिटी, सेंक्यो फार्मा डेवलपमेंट, नोवर्टिस।


एक प्रोफेसर उठा चुकी हैं मुद्दा
जनवरी 2009 में कॉलेज काउंसिल की बैठक में थीसिस रिव्यू कमेटी की चेयरमैन डॉ. प्रीति तनेजा ने ड्रग ट्रायल का मसला उठाते हुए कहा था कि पीजी छात्र ट्रायल को रिसर्च की तरह पेश कर रहे हैं, जबकि इसकी इजाजत नहीं है। इस पर तत्काल बंदिश लगना चाहिए। यह बात कुछ दिन चर्चा में रही और बाद में सांठगांठ में शामिल कुछ डॉक्टरों ने कॉलेज डीन कक्ष के सामने वाले हॉल में रंगरोगन, टाइल्स और कुलर का इंतजाम करवा दिया।

एक वर्ष में दस जूडॉ को विदेश यात्रा
ड्रग ट्रायल के धंधे में विदेशों में जाकर दवा के असर की रिपोर्ट पेश करना होती है। सरकारी सेवा में होने के कारण सिनीयर कंसल्टेंट बगैर अनुमति के नहीं जा सकते हैं, इसलिए वे अपने मातहत पढ़ाई कर रहे जूनियर डॉक्टरों को भेजते हैं। सूत्रों के मुताबिक एक वर्ष में दस से अधिक जूडॉ विदेश जा चुके हैं। डॉ. सचिन सेठी, गौरव मोहन, प्रोमिता चौधरी, दीलिप सिंह, मयंक जैन, आशीष जैन, प्रज्ञा जैन, मीना ढोले, अब्दुल मंसूर, वरुण कटारिया इनमें शामिल हैं। इनमें से कुछ अब कॉलेज छोड़ चुके हैं।


(14 जुलाई को पत्रिका में प्रकाशित)
- रिपोर्टर शैलेष दीक्षित से सहयोग

मरीजों को बना दिया चूहा

- ड्रग ट्रायल के नाम पर एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में गोरखधंधा
- 5  वर्ष में 6 डॉक्टरों ने 1521 मरीजों पर प्रयोग कर किया 2 करोड़ का करोबार


ड्रग ट्रायल का मतलब
किसी भी दवा या टीके को बाजार में उतारने से पहले उसके प्रभाव को मरीज पर प्रयोग करके देखना ही ड्रग ट्रायल है। विपरीत प्रभाव से इसमें मरीज की जान जाने का खतरा रहता है। 


एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले मरीज यहां के डॉक्टरों की नजर में चूहे से कम अहमियत नहीं रखते हैं। डॉक्टर विदेशी कंपनियों से मिलकर रोगियों पर दवाइयों और टीकों के डोज इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसके एवज में उन्हें मोटी रकम भी मिलती है। पांच वर्ष में ही छह डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के नाम पर 1170 बच्चों समेत 1521 मरीजों पर प्रयोग करके दो करोड़ का कारोबार किया। सूत्र बताते हैं कि इसके अलावा भी कई  ऐसी दवाइयां भी इस्तेमाल की जा रही है जिन्हें ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने अनुमति नहीं दी है।  ड्रग ट्रायल पर निगरानी के लिए एक इथिकल कमेटी मौजूद है, उसे केवल दवाइयों और कंपनियां के नाम की ही जानकारी दी जाती है। मरीज कौन है, रुपया कितना आता है और इसका हिसाब कैसे रखा जाता है, यह कमेटी नहीं जानती।


सरकार अनभिज्ञ
ड्रग ट्रायल के हिसाब किताब से राज्य सरकार पूरी तरह अनभिज्ञ है। यहां तक कि कॉलेज प्रबंधन को भी पूरी जानकारी नहीं है कि कौन डॉक्टर किस दवाई के ट्रायल में शामिल है।

इन विभागों में ट्रायल के प्रमाण
मेडिसिन, शिशु रोग, सर्जरी, मनोरोग, नेत्ररोग, आर्थोपेडिक, कम्युनिटी मेडिसिन, रेडियोथैरेपी।

पांच वर्ष में किसने क्या किया

डॉ. हेमंत जैन, प्रोफेसर, शिशु रोग विभाग
राशि- 56  लाख 
अवधि-  2005 से अब तक
मरीज- 1170
रोग - बच्चों में ब्रोंकराइटिस, पोलियो, बीपी, हेपेटाइटिस बी, टीटनेस।

डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग
राशि- 44 लाख
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज - 237
रोग- कोरोनरी सिंड्रोम, विटामिन से लकवा, सेकंड स्ट्रोक, स्टेबल एंजाइमा, हार्ट अटैक। 
(डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. आशीष पटेल, डॉ. सोनल पगारे भी भागीदार)

डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग
राशि- 42 लाख 
अवधि- 2007 से अब तक
मरीज - 39
रोग- पार्किंसन्स, सिवीयर डेमेंशिया, अलझाइमर।


डॉ. अशोक वाजपेयी, पूर्व एचओडी, मेडिसिन (हाल ही में वीआरएस)
राशि- 41.37 लाख
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज - 28
रोग- सीओपीडी, अस्थमा, निमोनिया। 
(एसो. प्रोफेसर संजय अवासिया भी भागीदार)

डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवायएच
राशि-4.5 लाख
अवधि- 2005 से 08 तक
मरीज - 43
रोग- सीओपीडी, डायबिटीक नेफ्रोपेथी। 

डॉ. शरद थोरा, एचओडी, शिशु रोग
राशि-  2 लाख।
अवधि - 2007-08
मरीज- चार
रोग- पांच वर्ष तक के बच्चों में ब्लड प्रेशर।


इथिकल कमेटी जिम्मेदार 

ट्रायल की 10 प्रतिशत राशि कहां है?
डॉक्टर अपने विभाग को देते हैं। आंकड़ा मुझे नहीं पता।
 पूरी प्रक्रिया पारदर्शी क्यों नहीं है?
 हिंदी में बने सहमति पत्र पर मरीज के साइन होने के बाद ही ट्रायल होती है।
 मरीज के बजाए आप हिसाब में रूचि ले रहे हैं?
 यह काम इथिकल कमेटी देखती है। सवाल कमेटी से पूछें।
(एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत से चर्चा)


कुछ विधायकों के सक्रिय हो जाने के कारण फिलहाल मामला बेहद गरम है, इसलिए अभी इस पर बात नहीं करना चाहता हूं। वैसे भी यह बहुत विस्तृत विषय है और इसे ढंग से समझा जाना चाहिए। इतना जरूर कह सकता हूं, जो ट्रायल ईथिकल कमेटी की मंजूरी से हो रहे हैं, वे डीसीजीआई से स्वीकृत हैं।
- डॉ. केडी भार्गव, चेयरमैन, इथिकल कमेटी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज







(14 जुलाई को पत्रिका में प्रकाशित)
- रिपोर्टर शैलेष दीक्षित से सहयोग

दवा आजमाइश के खेल में गुम रोगी

 बिगड़ी तबीयत दुरस्त करवाने के इरादे से डॉक्टर की शरण में जाने वाले रोगी खतरे में है। खतरा भी उस डॉक्टर से जिसे वह भगवान मान रहा है। डॉक्टर मरीज पर मरीज पर ऐसी दवा आजमाने की जल्दी में है, जो बाजार में आई ही नहीं। दवा बनाने वाली विदेशी कंपनी दवा आजमाईश (ड्रग ट्रायल) के एवज में डॉक्टर को मोटी रकम देती है। इस रकम के लालच में डॉक्टर मरीज को चूहा मानकर आजमाईश में जुट चुके हैं। यह काम सरकारी के साथ ही प्रायवेट अस्पतालों और क्लिनिकों में धड़ल्ले से चल रहा है। 


हिंदुस्तानियों को चूहा मानकर विदेशी कंपनियां ड्रग ट्रायल के नाम पर गुमनाम दवाइयों का प्रयोग करके देश के चंद डॉक्टरों की जेबें भर रही हैं, लेकिन केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों के पास इसका कोई लेखा-जोखा उपब्ध नहीं है। देशभर में ट्रायल करने वाले डॉक्टरों की न तो पड़ताल की गई और न ही इसके लिए कोई व्यवस्था बनी है, जबकि ये डॉक्टर देश के गरीब और अनपढ़ मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में ट्रायल का भारत में 1500 करोड़ का कारोबार जारी है, जो 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ तक पहुंच जाएगा। 

बात मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी और तेजी से मेडिकल हब के रूप में विकसित होते शहर इंदौर की करें तो पता चलता है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले मरीज यहां के डॉक्टरों की नजर में चूहे से ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। देशी-विदेशी दवा कंपनियों में निर्माणाधीन दवा और टीके मरीजों पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। कंपनियां डॉक्टरों को चुनती हैं और इसके बाद शुरू हो जाता है खेल। पांच वर्ष में ही छह डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के नाम पर 1170 बच्चों समेत 1521 मरीजों पर प्रयोग करके दो करोड़ का कारोबार किया। सूत्रों के मुताबिक, कई ऐसी दवाओं के प्रयोग भी हो रहे हैं जिन्हें भारत सरकार से अनुमति नहीं है। वैसे तो निगरानी के लिए एथिकल कमेटी (नैतिक समति) है, पर उसे दवाओं व कंपनियां के नाम की ही जानकारी दी जाती है। मरीज, राशि और हिसाब की जानकारी उसे कम ही होती है। कमेटी की अनदेखी का फायदा उठाकर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैनï ने ५६ लाख कमाए और ब्रोंकाइटिस, पोलियो, बीपी, हेपेटाइटिस बी, टिटनेस से पीडि़त बच्चों पर प्रयोग कर दिए। दिल के रोगी मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, न्यूरोलॉजी से पीडि़त डॉ. अपूर्व पुराणिक, दमे के रोगी डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. संजय अवासिया व डॉ. सलिल भार्गव, आंखों का मर्ज लेकर आए डॉ. पुष्पा वर्मा और हड्डी चटकने के कारण अस्पताल पहुंचे डॉ. प्रदीप भार्गव के लिए कमाई का जरिया बने। सभी ने दवा आजमाई और लाखों रुपए जुटा लिए। यही हाल निजी अस्पतालों का भी है। टोटल, सीएचएल अपोलो, चोइथराम, चरक, ग्रेटर कैलाश जैसे अस्पतालों में यह धंधा जोरों पर है। कुछ मनोचिकित्सक तो अपने क्लिनिक से यह काम चला रहे हैं।

लगभग ऐसा ही दृश्य दूसरे शहरों और राज्यों का भी है। दरअसल, विदेशी कंपनियों ने क्विंटल और बायोटेक जैसी स्पांसर एजेंसियों के जरिए तीन वर्ष में पूरे देश में नेटवर्क फैला लिया है। केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं देश में चारों चरणों तक के ट्रायल चलते हैं। सभी जानलेवा हैं, लेकिन फेज वन और टू अधिक खतरनाक हैं। वर्ष 2009 में ही फेज वन की 33 और फेज टू की 53 ट्रायल हुई हैं। सबसे अधिक कारोबार महाराष्टï्र में हो रहा है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश दूसरे-तीसरे स्थान पर हैं। शहरों में बैंगलूरु सबसे आगे है। पूणे और मुंबई इसके बाद आते हैं। इन शहरों में बड़े पैमाने पर ड्रग ट्रायल किए जाते हैं। विदेशी कंपनियों ने मप्र में इंदौर और राजस्थान में जयपुर को गढ़ बनाया है। वर्ष 2006 से 2009 तक इंदौर में क्रमश: तीन, दो, 13 और 38 ट्रायल हुए हैं, जबकि जयपुर में तीन, 11, 36 और 70 ट्रायल हुए हैं। 

वैसे, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने मरीजों का दवा आजमाइश से बचाने के लिए 2006 में गाइडलाइन बनाई थी। इसमें जिक्र था कि जिस मरीज पर दवा का प्रयोग शुरू होगा, उसे पूरी जानकारी दी जाएगी। यह भी बताया जाएगा कि दवा के विपरीत प्रभाव से उसकी जान भी जा सकती है। अफसोस इस गाइडलाइन का रत्तीभर भी पालन देश में नहीं हो रहा है। राशि ही इतनी मोटी मिलती है कि डॉक्टर बगैर सोचे-समझे प्रयोग करना शुरू कर देता है। केंद्र सरकार द्वारा गठित क्लिनिकल ट्राइल्स रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) में रजिस्ट्रेशन करवाने और दवा कंपनी की मदद के लिए बनाई जाने वाली एथिकल कमेटी से अनुमति लेने के बाद डॉक्टर धड़ाधड़ प्रयोग शुरू कर देता है। उसे किसी का डर भी नहीं है, क्योंकि उसकी निगरानी का न तो राज्यों ने और न ही केंद्र ने कोई इंतजाम किया है। मप्र के ड्रग कंट्रोलर राकेश श्रीवास्तव कहते हैं कि उन्हें न तो ट्रायल की जानकारी है और न ही इससे प्रभावित होने वाले मरीजों की। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया तो पूछते हैं यह ड्रग ट्रायल क्या होता है?  सीटीआरआई की उप संचालक डॉ. आभा अग्रवाल का व्यक्तव्य भी चौंकाता है। वे कहती हैं ट्रायल के लिए रजिस्ट्रेशन करना हमारा काम होता है। इसके बाद हम निगरानी नहीं करते हैं। ट्रायल के लिए एथिकल कमेटियां सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। कितनी राशि आती है और कैसे डॉक्टर को मिलती है, इसकी कोई जानकारी नहीं। यह भी पता नहीं है कि दवा आजमाइश से मरीज पर क्या असर होता है।

डॉक्टर इस बात को जानते हैं कि ट्रायल जानलेवा होती हैं, लेकिन वे इसे हमेशा से ही छुपाते रहे हैं। मौतों की आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। जन स्वास्थ्य अभियान जैसे कुछ संगठनों ने अपने स्त्रोतों से जो जानकारी जुटाई है, वह चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक देशभर में वर्ष 2007 में 132, 2008 में 229 और 2009 में 308 लोगों की ट्रायल के दौरान मौत हुई है।

दवा आजमाइश के इस खेल में सबसे बड़ा सवाल मानव के जीवन जीने के अधिकार का है। कुछ डॉक्टर उसका यह हक छीन रहे हैं और मनुष्य को इसका पता भी नहीं चलता। रुपए के खातिर शुरू हुआ यह खेल समय रहते रुकना चाहिए। बेहद जरूरी है कि भारत सरकार अपने नागरिकों को दलाल रूपी डॉक्टरों से बचाने के लिए सख्त कानून बनाए। वर्ष 2005 की तरह ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन करने से हल नहीं निकलेगा क्योंकि उस संशोधन के बाद तो ट्रायल को बढ़ावा मिला।