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रविवार, अगस्त 01, 2010

शोध नहीं है ड्रग ट्रायल


एमसीआई के पत्र का साफ संदेश


ड्रग ट्रायल शोध है या नहीं? इस बहस का जवाब चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी सर्वोच्च संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के एक नियम में मिलता है। एमसीआई के मुताबिक जब ड्रग ट्रायल के परिणाम भारत में प्रकाशित किए जा सकें, तभी यह शोध है। यदि दवा कंपनी ऐसा नहीं करने देती है, तो ट्रायल किया ही नहीं जाना चाहिए।

एमसीआई ने इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन करके यह बात गत वर्ष ही स्पष्ट की है। दरअसल, भारत सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 में वर्ष 2005 में संशोधन किया तो देशभर में डॉक्टरों ने शोध के नाम पर ड्रग ट्रायल शुरू कर दिए, परंतु इसके परिणामों को छापने की अनुमति किसी को नहीं मिली। डॉक्टर से समझौता करने वाली स्पांसर कंपनी ने ड्रग ट्रायल के परिणामों को प्रकाशित करने का अधिकार स्वयं के पास सुरक्षित रखती हैं। एमसीआई ने इसी बंधन से ट्रायल को मुक्त रखने के लिए नए नियम जारी किए।

आईसीएमआर के ट्रायल शोध
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) देशभर में जो भी ट्रायल करवाती है, उन्हें चिकित्सा जगत में शोध का दर्जा दिया गया है। पोलियो की दवा, स्वाइन फ्लू का टीका ऐसे ही ट्रायल हैं। इनके नतीजों को भारत सरकार द्वारा प्रकाशित किया जाता है और ये देश में चिकित्सा विज्ञान की प्रगति में सहायक साबित होते हैं। बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के परीक्षण के नतीजों पर कंपनी का अधिकार रहता है।




जवाब भी तैयार नहीं कर पाई सरकार
 बीस दिन में भी नहीं जुटी जानकारी
 तीनों विधायकों के प्रश्न अब तक बेजवाब


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भले ही सरकार ने कायदे कानून बनाने की घोषणा कर दी हो, लेकिन अभी भी तीन विधायकों के प्रश्नों के जवाब तैयार नहीं हुए हैं। इन विधायकों ने सरकार से सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में ड्रग ट्रायल की जानकारी चाही थी।

सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल, रतलाम के पारस सकलेचा और ग्वालियर के प्रदुम्म तोमर ने तारांकित प्रश्न पूछे थे। बीस दिन पहले (12 जुलाई) को ग्रेवाल का सवाल सभी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचा था। सदन ने ग्रेवाल को सूचना दी थी कि 23 जुलाई को जवाब दे दिया जाएगा, परंतु जब उन्होंने मांगा तो कहा गया जानकारी जुटाई जा रही है। ऐसा ही जवाब सकलेचा और तोमर को मिला।

प्रक्रिया पर सवालिया निशान
विधानसभा में पूछे जाने वाले सवाल के जवाब तय समय सीमा में देने जिम्मेदारी सरकारी अमले की है। मीडिया में जब मामला आ जाए, तो और भी सक्रियता के साथ जानकारी तैयार की जाना चाहिए, परंतु इस मसले में ऐसा नहीं किया गया।

अनियमितता दबाने की कोशिश तो नहीं
ड्रग ट्रायल में बहुत अधिक राशि का लेन-देन होता है। एक मरीज के लिए डॉक्टर को औसतन दो से पांच लाख रुपए मिलते हैं। माना जा रहा है कि इसी पर परदा डालने के लिए जानकारी रोकी गई है।

इन सवालों में अटकी सरकार
- ड्रग ट्रायल कराने वाली कंपनियों से किस डॉक्टर को कितनी राशि मिली?
- जिन मरीजों पर ट्रायल किया गया, क्या उन्हें इसकी जानकारी दी गई? यदि हां, तो नाम बताएं।
- किसी भी राशि के लेनदेन के लिए किससे इजाजत ली गई?
- पांच वर्ष में कितने डॉक्टर विदेश गए और उन्हें किस कंपनी ने भेजा? क्या वे अनुमति लेकर गए?


News in PATRIKA on 02 Aug 2010

शनिवार, जुलाई 31, 2010

दवा कंपनियां अटका देती हैं कानून

Drug Trial : A Money Game to treat Man as Guinea-pig


साढ़े चार वर्ष से केंद्र सरकार नहीं कर सकी फैसला
 आईसीएमआर की सिफारिश के बावजूद संसद नहीं पहुंच सका  बिल 

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित की गई दवाओं और टीकों के लोगों पर ïपरीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए भारत सरकार के पास भी एक कानून (बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल) साढ़े चार वर्ष से अटका हुआ है। इस देरी का कारण अरबों रुपए के बजट वाली दवा कंपनियों को माना जाता है। ताज्जुब तो यह है कि इस कानून को संसद में पेश करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) कई बार सिफारिश कर चुकी है।

नागरिकों को अनजान दवाइयों के प्रभाव से बचाने के लिए 2005 में केंद्र सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया। इसी के बाद ड्रग ट्रायल करने का कार्य विधिवत शुरू हुआ। इसके पहले बगैर किसी नियंत्रण या जानकारी के ट्रायल होते थे, किंतु एक्ट में संशोधन भी बेहद लचर साबित हुआ। न तो इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है और न ही किसी भी डॉक्टर पर निगरानी करने की कोई व्यवस्था। यही वजह है कि दवा कंपनियों ने तेजी से देशभर में पांव पसारे और उन डॉक्टरों का चयन किया जिन पर मरीजों को अटूट भरोसा रहता है। डॉक्टरों ने भी 'शोधÓ के नाम पर धड़ाधड़ रोगियों को प्रयोगशाला बनाना शुरू कर दिया। आईसीएमआर को इसकी भनक लगी तो अक्टूबर 2006 में 120 पेज की एक गाइडलाइन जारी की गई। इसका भी देशभर में जमकर उल्लंघन हुआ।

गाइडलाइन बनाने के बीच में ही आईसीएमआर ने बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल का खाका तैयार किया। इसे जनवरी 2006 में विधि विभाग के पास भेजा गया। वहां से इसे मंजूरी भी मिल गई, लेकिन इसके बाद से यह फाइलों में खो गया।

कानून के बगैर काबू संभव नहीं
आईसीएमआर निदेशक डॉ. वीएम कटोच ने 'पत्रिकाÓ से चर्चा में बताया जब तक कानून नहीं लाया जाएगा, ड्रग ट्रायल्स पर काबू पाना कठिन है। हम केवल गाइडलाइन जारी कर सकते हैं, उसके पालन करवाने को लेकर कोई तंत्र मौजूद नहीं है।

एमसीआई ने भी बदले नियम
आईसीएमआर की तरह ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भी ड्रग ट्रायल घपले की जानकारी मिल चुकी थी। यही वजह कि एमसीआई सचिव डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को पत्र लिखकर इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन की जानकारी दी थी। इसमें सभी डॉक्टरों से कहा गया था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। 

मप्र नर्सिंगहोम एक्ट भी अधूरा
मप्र सरकार ने 17 जनवरी 2007 से नर्सिंगहोम एक्ट लागू किया है। इसमें भी ड्रग ट्रायल को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं है। यही वजह है कि राज्य सरकार को अब तक यह पता नहीं है कि निजी अस्पतालों में कौन डॉक्टर किस मरीज पर किस दवा का प्रयोग कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में करीब 60 डॉक्टर ट्रायल में लिप्त हैं। सीएमएचओ डॉ. शरद पंडित ने बताया फिलहाल किसी भी अस्पताल की एथिकल कमेटी की जानकारी हमें नहीं है। यह मामला पहली बार प्रकाश में आया है। अब वरिष्ठ कार्यालय के ध्यान में लाया जाएगा। 


एक मरीज पर मिलते दो से पांच लाख
ड्रग ट्रायल के खेल में धन के प्रभाव को इसी से मापा जा सकता है कि अधिकांश कंपनियां ट्रायल करने वाले डॉक्टर को एक मरीज के एवज में दो से पांच लाख रुपए तक देती है। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही वर्ष 2008-09 में डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया को दमे के रोगियों पर मोमेटासोन और फॉरमेट्रोल नामक दवा को दो मरीजों पर इस्तेमाल करने पर 6 लाख 36 हजार रुपए मिले थे। डॉ. अपूर्व पुराणिक को डोनेपेझिजल एआर दवा के प्रयोग के लिए प्रति मरीज 1.10 लाख रुपए मिले।


उम्रकैद से कम नहीं

चिकित्सा क्षेत्र में तरक्की हो इसके लिए ड्रग ट्रायल की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इससे गुजरने वाले मरीजों के हितों की रक्षा कौन करेगा? उन डॉक्टरों पर निगरानी का तंत्र क्या हो, इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया था। देर से ही सही, कायदे-कानून की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल, सवाल विश्वास का है। वह विश्वास जो मरीज अपने डॉक्टर की आंख में देखता है, उसे भगवान मानता है। चंद डॉक्टरों की हरकतों से अगर समूचे चिकित्सा  जगत की साख संकट में पड़ जाए तो यह ठीक नहीं होगा। ड्रग ट्रायल से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच-पड़ताल में चौंकाने वाले और दु:खद पहलू सामने आए। सरकार की भी कलई खुल गई। निजी अस्पतालों की दूर उसे तो यह भी पता नहीं कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ड्रग ट्रायल के नाम पर मरीजों के साथ क्या हो रहा है। ऐसे हालात में आंख पर पट्टी बांधकर ड्रग ट्रायल की पैरोकारी करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि इस अराजकता से आखिर लाभ किसे है? इस तकनीकी विषय पर आम आदमी की कम जानकारी का धंधेबाजों ने जमकर फायदा उठाया है। राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी इस विषय में बहुत गंभीर नहीं दिखती। ट्रायल में धंधेबाजों की घुसपैठ को देखकर भारतीय चिकित्सा और अनुसंधान परिषद ने चार साल पहले कानून संशोधन सुझाए।   

विधि विभाग की अनुमति भी मिल गई, इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए आज तक सख्त कानून के लिए कोई संशोधन नहीं किया गया। यही वजह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा ड्रग ट्रायल भारत में हो रहे हैं। मप्र सरकार को ड्रग ट्रायल पर बेहद सख्त नियम कानून बनाने होंगे। दोषी डॉक्टर को उम्रकैद से कम का प्रावधान न हो। नियमों का उल्लंघन करने वाले की डिग्री छीनी जानी चाहिए।
News in PATRIKA ON 31th July 2010

गुरुवार, जुलाई 29, 2010

ड्रग ट्रायल में जा चुकी एक जान



 जबलपुर में कैंसर मरीज की हुई थी मौत
 भोपाल, ग्वालियर में भी अनियमितताएं


बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के दौरान प्रदेश में एक महिला मरीज की जान जा चुकी है। जबलपुर के कैंसर अस्पताल में इस मरीज का उपचार चल रहा था। उधर, इंदौर के बाद भोपाल और ग्वालियर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल की अनियमितताएं सामने आई हैं।

जबलपुर में अगस्त 2008 में कैंसर रोगियों पर ड्रग ट्रायल शुरू  हुआ था। रेडियोथेरेपी की प्रोफेसर डॉ. पुष्पा किरार और डॉ. अमित जोतवानी ने पेट के कैंसर (कार्टिनोमा स्टमक) के चार रोगियों पर दवा का प्रयोग शुरू किया था। चूंकि यह ट्रायल प्लेसिबो (इलाज के बीच में दवा बंद करके दूसरे मरीजों से तुलना करना) था, इसलिए एक महिला रोगी पर सारी दवाइयां बंद कर दी गईं। इसी दौरान उसकी मौत हुई।

प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मुताबिक मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में चिकित्सा जगत की विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की घोषणा को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार किया है।


'वह बहुत गंभीर थीÓ

 क्या आपने कोई ट्रायल किया है?
 हां, 2008 में शुरू किया था, लेकिन चार मरीजों के बाद ही बंद कर दिया।

बंद क्यों कर दिया?
ïकॉलेज की मान्यता और हमारी डिग्री के कारण कंपनी ने इंकार कर दिया था।

सूचना के अधिकार में आपने जानकारी दी है कि चार में से एक की मौत हो गई?
ïहां, मौत हुई थी। वह महिला बहुत गंभीर अवस्था में थी। चूंकि ट्रायल प्लेसिबो था, इसलिए कुछ मरीजों को दवा नहीं दी जाती है। उसे भी नहीं दी थी।

मौत के कारण ही ट्रायल बंद तो नहीं हुआ?
हमारे यहां इंदौर जैसा मामला नहीं है। मैं खुद भी ट्रायल करना नहीं चाहती थी, इसलिए बंद कर दिया।
(डॉ. पुष्पा किरार से सीधी बात)


भोपाल का हाल
ईसी अहमदाबाद में, ट्रायल भोपाल में

गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के सर्जरी एचओडी डॉ. एमसी सोनगरा और डॉ. नितिन वर्मा ने 2008 में मूत्र रोग से पीडि़त 40 लोगों पर कैडिला कंपनी की दवा का प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने अहमदाबाद की एक निजी एथिकल कमेटी (ईसी) से मंजूरी ली। आईसीएमआर की गाइडलाइन के मुताबिक यदि सरकारी कॉलेज में एथिकल कमेटी मौजूद हो, तो बाहर की किसी कमेटी से अनुमति नहीं ली जा सकती है।


ग्वालियर में बड़ा कारोबार
3500 लोगों पर थोपा ट्रायल, कमेटी भी अधूरी 

वर्ष 2005 में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में किए गए संशोधन के मुताबिक ट्रायल को मंजूरी देने वाली एथिकल कमेटी में एक आम आदमी समेत पांच बाहरी व्यक्ति होना आवश्यक है। ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी में दो लोग बाहर हैं और इनमें भी आम आदमी नहीं है। यहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्मेंद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए। इसमें करीब 3500 रोगियों को चुना गया।



ईओडब्ल्यू में बयान शुरू
 ड्रग ट्रायल मामले में तीन सप्ताह में पूरी होगी प्रारंभिक जांच

मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण करने (ड्रग ट्रायल) के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने भोपाल में बुधवार से बयान लेना शुरू कर दिया है। ब्यूरो ने सबसे पहले शिकायतकर्ता से वे दस्तावेज हासिल किए हैं, जिनके आधार पर शिकायत की गई। 

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम संगठन ने ईओडब्ल्यू में शिकायत की है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर के सात डॉक्टरों ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों से सांठगांठ करके ड्रग ट्रायल शुरू किया। इसके एवज में उन्हें अकूत संपत्ति हासिल की। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया जांच का दायित्व असिस्टेंट आईजी प्रियंका शर्मा को सौंपा है। उन्होंने शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे के बयान दर्ज कर लिए हैं। करीब तीन सप्ताह में जांच का कार्य समाप्त कर लिया जाएगा। जिन डॉक्टरों पर आरोप हैं, उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

ईओडब्ल्यू आईजी के मुताबिक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल के खिलाफ शिकायत मिली है।


दोषियों पर होगी कार्रवाई : मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भोपाल में मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा ड्रग ट्रायल मामले में ईओडब्ल्यू में शिकायत हुई है और वहां जांच भी शुरू हो गई है। जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 


देर रात तक उलझा रहा एमजीएम

एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में हुए ड्रग ट्रायल मामले में संभवत: गुरुवार को विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाया जाएगा। इसकी तैयारी में रात करीब 9.30 बजे तक कॉलेज में कार्य जारी थी। कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के साथ ही कुछ प्रोफेसर और प्रशासनिक अधिकारी जुटे थे, ताकि भोपाल मुख्यालय से पूछे गए हर सवाल का 'माकूलÓ जवाब दे सकें। उधर, भोपाल में संचालक चिकित्सा शिक्षा और प्रमुख सचिव में भी देर रात तक इस मसले पर कार्य चलने की जानकारी मिली है।

News i n PATRIKA on 29th July 2010

बुधवार, जुलाई 21, 2010

दवा आजमाइश के खेल में गुम रोगी

 बिगड़ी तबीयत दुरस्त करवाने के इरादे से डॉक्टर की शरण में जाने वाले रोगी खतरे में है। खतरा भी उस डॉक्टर से जिसे वह भगवान मान रहा है। डॉक्टर मरीज पर मरीज पर ऐसी दवा आजमाने की जल्दी में है, जो बाजार में आई ही नहीं। दवा बनाने वाली विदेशी कंपनी दवा आजमाईश (ड्रग ट्रायल) के एवज में डॉक्टर को मोटी रकम देती है। इस रकम के लालच में डॉक्टर मरीज को चूहा मानकर आजमाईश में जुट चुके हैं। यह काम सरकारी के साथ ही प्रायवेट अस्पतालों और क्लिनिकों में धड़ल्ले से चल रहा है। 


हिंदुस्तानियों को चूहा मानकर विदेशी कंपनियां ड्रग ट्रायल के नाम पर गुमनाम दवाइयों का प्रयोग करके देश के चंद डॉक्टरों की जेबें भर रही हैं, लेकिन केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों के पास इसका कोई लेखा-जोखा उपब्ध नहीं है। देशभर में ट्रायल करने वाले डॉक्टरों की न तो पड़ताल की गई और न ही इसके लिए कोई व्यवस्था बनी है, जबकि ये डॉक्टर देश के गरीब और अनपढ़ मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में ट्रायल का भारत में 1500 करोड़ का कारोबार जारी है, जो 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ तक पहुंच जाएगा। 

बात मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी और तेजी से मेडिकल हब के रूप में विकसित होते शहर इंदौर की करें तो पता चलता है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले मरीज यहां के डॉक्टरों की नजर में चूहे से ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। देशी-विदेशी दवा कंपनियों में निर्माणाधीन दवा और टीके मरीजों पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। कंपनियां डॉक्टरों को चुनती हैं और इसके बाद शुरू हो जाता है खेल। पांच वर्ष में ही छह डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के नाम पर 1170 बच्चों समेत 1521 मरीजों पर प्रयोग करके दो करोड़ का कारोबार किया। सूत्रों के मुताबिक, कई ऐसी दवाओं के प्रयोग भी हो रहे हैं जिन्हें भारत सरकार से अनुमति नहीं है। वैसे तो निगरानी के लिए एथिकल कमेटी (नैतिक समति) है, पर उसे दवाओं व कंपनियां के नाम की ही जानकारी दी जाती है। मरीज, राशि और हिसाब की जानकारी उसे कम ही होती है। कमेटी की अनदेखी का फायदा उठाकर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैनï ने ५६ लाख कमाए और ब्रोंकाइटिस, पोलियो, बीपी, हेपेटाइटिस बी, टिटनेस से पीडि़त बच्चों पर प्रयोग कर दिए। दिल के रोगी मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, न्यूरोलॉजी से पीडि़त डॉ. अपूर्व पुराणिक, दमे के रोगी डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. संजय अवासिया व डॉ. सलिल भार्गव, आंखों का मर्ज लेकर आए डॉ. पुष्पा वर्मा और हड्डी चटकने के कारण अस्पताल पहुंचे डॉ. प्रदीप भार्गव के लिए कमाई का जरिया बने। सभी ने दवा आजमाई और लाखों रुपए जुटा लिए। यही हाल निजी अस्पतालों का भी है। टोटल, सीएचएल अपोलो, चोइथराम, चरक, ग्रेटर कैलाश जैसे अस्पतालों में यह धंधा जोरों पर है। कुछ मनोचिकित्सक तो अपने क्लिनिक से यह काम चला रहे हैं।

लगभग ऐसा ही दृश्य दूसरे शहरों और राज्यों का भी है। दरअसल, विदेशी कंपनियों ने क्विंटल और बायोटेक जैसी स्पांसर एजेंसियों के जरिए तीन वर्ष में पूरे देश में नेटवर्क फैला लिया है। केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं देश में चारों चरणों तक के ट्रायल चलते हैं। सभी जानलेवा हैं, लेकिन फेज वन और टू अधिक खतरनाक हैं। वर्ष 2009 में ही फेज वन की 33 और फेज टू की 53 ट्रायल हुई हैं। सबसे अधिक कारोबार महाराष्टï्र में हो रहा है। कर्नाटक और आंध्रप्रदेश दूसरे-तीसरे स्थान पर हैं। शहरों में बैंगलूरु सबसे आगे है। पूणे और मुंबई इसके बाद आते हैं। इन शहरों में बड़े पैमाने पर ड्रग ट्रायल किए जाते हैं। विदेशी कंपनियों ने मप्र में इंदौर और राजस्थान में जयपुर को गढ़ बनाया है। वर्ष 2006 से 2009 तक इंदौर में क्रमश: तीन, दो, 13 और 38 ट्रायल हुए हैं, जबकि जयपुर में तीन, 11, 36 और 70 ट्रायल हुए हैं। 

वैसे, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने मरीजों का दवा आजमाइश से बचाने के लिए 2006 में गाइडलाइन बनाई थी। इसमें जिक्र था कि जिस मरीज पर दवा का प्रयोग शुरू होगा, उसे पूरी जानकारी दी जाएगी। यह भी बताया जाएगा कि दवा के विपरीत प्रभाव से उसकी जान भी जा सकती है। अफसोस इस गाइडलाइन का रत्तीभर भी पालन देश में नहीं हो रहा है। राशि ही इतनी मोटी मिलती है कि डॉक्टर बगैर सोचे-समझे प्रयोग करना शुरू कर देता है। केंद्र सरकार द्वारा गठित क्लिनिकल ट्राइल्स रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) में रजिस्ट्रेशन करवाने और दवा कंपनी की मदद के लिए बनाई जाने वाली एथिकल कमेटी से अनुमति लेने के बाद डॉक्टर धड़ाधड़ प्रयोग शुरू कर देता है। उसे किसी का डर भी नहीं है, क्योंकि उसकी निगरानी का न तो राज्यों ने और न ही केंद्र ने कोई इंतजाम किया है। मप्र के ड्रग कंट्रोलर राकेश श्रीवास्तव कहते हैं कि उन्हें न तो ट्रायल की जानकारी है और न ही इससे प्रभावित होने वाले मरीजों की। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र हार्डिया तो पूछते हैं यह ड्रग ट्रायल क्या होता है?  सीटीआरआई की उप संचालक डॉ. आभा अग्रवाल का व्यक्तव्य भी चौंकाता है। वे कहती हैं ट्रायल के लिए रजिस्ट्रेशन करना हमारा काम होता है। इसके बाद हम निगरानी नहीं करते हैं। ट्रायल के लिए एथिकल कमेटियां सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। कितनी राशि आती है और कैसे डॉक्टर को मिलती है, इसकी कोई जानकारी नहीं। यह भी पता नहीं है कि दवा आजमाइश से मरीज पर क्या असर होता है।

डॉक्टर इस बात को जानते हैं कि ट्रायल जानलेवा होती हैं, लेकिन वे इसे हमेशा से ही छुपाते रहे हैं। मौतों की आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। जन स्वास्थ्य अभियान जैसे कुछ संगठनों ने अपने स्त्रोतों से जो जानकारी जुटाई है, वह चौंकाने वाली है। इसके मुताबिक देशभर में वर्ष 2007 में 132, 2008 में 229 और 2009 में 308 लोगों की ट्रायल के दौरान मौत हुई है।

दवा आजमाइश के इस खेल में सबसे बड़ा सवाल मानव के जीवन जीने के अधिकार का है। कुछ डॉक्टर उसका यह हक छीन रहे हैं और मनुष्य को इसका पता भी नहीं चलता। रुपए के खातिर शुरू हुआ यह खेल समय रहते रुकना चाहिए। बेहद जरूरी है कि भारत सरकार अपने नागरिकों को दलाल रूपी डॉक्टरों से बचाने के लिए सख्त कानून बनाए। वर्ष 2005 की तरह ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन करने से हल नहीं निकलेगा क्योंकि उस संशोधन के बाद तो ट्रायल को बढ़ावा मिला।