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शुक्रवार, सितंबर 03, 2010

ड्रग ट्रायल में सुस्ती का संक्रमण

- चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में कमेटी ही बना सका


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) के मामले में चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में महज एक कमेटी का गठन ही किया है। न तो इस कमेटी की बैठक हुई है और न ही अब तक किसी दूसरे राज्य के कानूनों का अध्ययन ही किया गया।
चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने 30 जुलाई को विधानसभा में तीन सदस्यों की कमेटी बनाकर राज्य में ड्रटग ट्रायल पर कानूनी बंदिश लगाने की घोषणा की थी। विभाग के प्रमुख सचिव और कमेटी चेयरमैन आईएस दाणी ने बुधवार को बताया कि कमेटी तीन के बजाए पांच सदस्यों की बनाई गई है। इसमें विधि विभाग के प्रमुख सचिव पीसी मीणा के साथ ही संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल और भोपाल के डॉ. एनआर भंडारी सदस्य हैं।


बंदिश नहीं होने से मरीजों की जान सांसत में
अभी तक राज्य में ड्रग ट्रायल की निगरानी की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। यही वजह है कि पिछले पांच वर्षों में बहुराष्टï्रीय कंपनियों ने राज्य के प्रतिष्ठित डॉक्टरों के जरिए मरीजों पर धड़ल्ले से दवाओं के ट्रायल किए। सरकारी के साथ ही निजी क्षेत्रों में अंधाधुंध ट्रायल हो रहे हैं। पांच वर्ष में मप्र के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हुए ट्रायल से ही 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव हुआ। इनमें से कुछ की मौत की भी आशंका है। विधायक पारस सकलेचा और प्रताप ग्रेवाल ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. हेमंत जैन, डॉ. सलिल भार्गव और डॉ. अशोक वाजपेयी की जांच कर रहा है।

पत्रिका: 02 सितंबर 2010


ड्रग ट्रायल का एक ओर कागज ईओडब्ल्यू पहुंचा
मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल द्वारा एक ड्रग ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी पहुंचाने का दस्तावेज भी ईओडब्ल्यू पहुंच गया है। वहां इसे जांच में भी लिया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू इसे गंभीर आर्थिक अपराध मान रहा है, क्योंकि कॉलेज को कंपनी बताने की जानकारी कॉलेज प्रबंधन को नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने ही इसका खुलासा किया है।

पत्रिका: 0३ सितंबर 2010

शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

फोन, फैक्स नंबरों और ई-मेल पर नजर

- ड्रग ट्रायल पर ईओडब्ल्यू की घेराबंदी
- एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में अवैध कनेक्शन



बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) से जुड़े मामले की जांच कर रहे आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) की नजर उन फोन और फैक्स नंबरों और ई-मेल पतों पर भी है, जिनके जरिए यह कारोबार एमजीएम मेडिकल कॉलेज में फैला। इन नंबरों की जानकारी के आधार पर पैसे के लेन-देन की बात को पुख्ता किया जा सकेगा।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक ईओडब्ल्यू ने कुछ ईमेल और फोन व फैक्स नंबर जुटा लिए हैं। 'पत्रिकाÓ को मिली जानकारी के मुताबिक ये ऐसे फोन और फैक्स नंबर हैं, जिन्हें कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में लगाने के लिए किसी की अनुमति भी नहीं ली गई। एक तरह से ये सभी नंबर 'अवैधÓ हैं।

डीन के भी होंगे बयान
ईओडब्ल्यू मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के बयान भी लेगा। संभवत: यह बयान 15 अगस्त के बाद लिया जाएगा। उनसे पूछा जा सकता है कि किस डॉक्टर ने कितने रुपए कॉलेज के स्वशासी निकाय में जमा करवाए और उन रुपयों का क्या इस्तेमाल किया गया।

मप्र नियमावली की भी घेराबंदी
ईओडब्ल्यू ने ट्रायल करने वालों डॉक्टरों पर मप्र के उन नियमों से भी घेराबंदी करने का मन बनाया है, जो यहां काम करने वाले हर सरकारी कर्मचारी के लिए पालन करना अनिवार्य है। मप्र सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 14 के मुताबिक प्रथम और द्वितीय श्रेणी अफसर 1500 रुपए से अधिक का उपहार नहीं ले सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो इसकी जानकारी एक माह के भीतर सरकार को देना अनिवार्य है। नियम 14 के उपनियम पांच के मुताबिक कोई भी सरकारी कर्मचारी एकाउंट पेयी चेक के जरिए 2000 रुपए से अधिक प्राप्त नहीं कर सकेगा। नियम से अधिक प्राप्त करना रिश्वत की श्रेणी में रखा गया है।


फोन / फैक्स नंबर         यहां है कनेक्शन

0731 2512513        चाचा नेहरू अस्पताल 
0731 4048207        नेत्ररोग विभाग 
0731 4066606        मनोरोग विभाग 
0731 2711611        ज्ञानपुष्प सेंटर
0731 2711623        ज्ञानपुष्प सेंटर
0731 2491214        मेडिसिन विभाग
0731 2526839        मेडिसिन विभाग


पत्रिका : १४ अगस्त २०१०

ईओडब्ल्यू ने छह डॉक्टरों से मांगा करोड़ों हिसाब

- एआईजी ने इंदौर में शुरू की जांच



बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) मामले में आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने सख्त रवैय्या अपनाते हुए छह डॉक्टरों से पाई-पाई का हिसाब मांगा है। इसके लिए डॉक्टरों को व्यक्तिगत रूप से बुलाया भी गया है। डॉक्टरों और उनके परिजन के बैंक खातों की जानकारियां भी जुटाई जा रही है।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नामक डॉक्टरों के संगठन के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में ट्रायल करने वाले छह डॉक्टरों के खिलाफ ईओडब्ल्यू आईजी के समक्ष भोपाल में शिकायत दर्ज करवाई थी। मामले की पड़ताल की जिम्मेदारी भोपाल पदस्थ डीआईजी प्रियंका मिश्रा को सौंपी गई है। बुधवार को वे इंदौर में ही थीं। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कॉलेज प्रबंधन से छहों डॉक्टरों की संपूर्ण जानकारी मांगी है। ट्रायल करवाने वाली कंपनी से मिलने वाले रूपए से लेकर मरीज के नाम पते तक पूछे गए हैं। शिकायत के मुताबिक छह डॉक्टरों ने सरकारी पद का दुरुपयोग करके मरीजों की जान जोखिम में डाली और अकूत संपत्ति जुटाई है।


छह डॉक्टर और दो करोड़ का हिसाब 

एक-
डॉ. हेमंत जैन, प्रोफेसर, शिशु रोग विभाग
राशि- 56  लाख
अवधि-  2005 से अब तक
मरीज- 1170
रोग - बच्चों में ब्रोंकराइटिस, पोलियो, बीपी, हेपेटाइटिस बी, टीटनेस।

दो-
डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग
राशि- 44 लाख
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज - 237
रोग- कोरोनरी सिंड्रोम, विटामिन से लकवा, सेकंड स्ट्रोक, स्टेबल एंजाइमा, हार्ट अटैक।


तीन-
डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर, मेडिसिन विभाग
राशि- 42 लाख
अवधि- 2007 से अब तक
मरीज - 39
रोग- पार्किंसन्स, सिवीयर डेमेंशिया, अलझाइमर।

चार-
डॉ. अशोक वाजपेयी, पूर्व एचओडी, मेडिसिन (हाल ही में वीआरएस)
राशि- 41.37 लाख
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज - 28
रोग- सीओपीडी, अस्थमा, निमोनिया।
(एसो. प्रोफेसर संजय अवासिया भी भागीदार)


पांच-
डॉ. सलिल भार्गव, अधीक्षक, एमवायएच
राशि-4.5 लाख
अवधि- 2005 से 08 तक
मरीज - 43
रोग- सीओपीडी, डायबिटीक नेफ्रोपेथी। 


छह -
डॉ. पुष्पा वर्मा, प्रोफेसर, नेत्ररोग विभाग

राशि- अज्ञात
अवधि- 2005 से अब तक
मरीज- 35 से अधिक
रोग- अज्ञात।



'ड्रग ट्रायल केस की जांच के लिए एक दल इंदौर में है। आर्थिक मामलों से जुड़े सभी पहलूओं की पड़ताल की जा रही है।Ó 
- अजय शर्मा, आईजी, ईओडब्ल्यू

News in Patrika on 13th August 2010 

सोमवार, अगस्त 02, 2010

कौन सच्चा अमेरिका या भारत ?

अमेरिका की कंपनियों के इंदौर में 99 ट्रायल हुए, लेकिन भारत सरकार को 56 की ही जानकारी


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का इंसानों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भारत सरकार के आंकड़े कटघरे में हैं। ट्रायल का रजिस्ट्रेशन करने वाली भारत की सरकारी संस्था क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया और अमेरिका के राष्टरीय स्वास्थ्य संस्थान के आंकड़ों में भारी अंतर है। भारत सरकार को जानकारी है कि इंदौर में अब तक 56 ट्रायल हुए हैं, जबकि अमेरिका सरकार कहती है इंदौर में 99 ट्रायल हुए हैं। इसके अलावा दूसरे देश भी हैं, जहां की विकसित दवाइयां इंदौर में परखी गई हैं।

अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ नाम का सरकारी विभाग है। इसकी वेबसाइट पर दर्ज है कि अमेरिका की कंपनियों से भारत में 1432 ट्रायल किए हैं। इनमें से 176 जयपुर में और 47 भोपाल में हुए हैं। इधर, भारत के सीटीआरआई की वेबसाइट बताती है जयपुर में 121 ट्रायल हुए हैं, जबकि भोपाल की कोई जानकारी ही उपलब्ध नहीं है। दोनों ही वेबसाइट 2 अगस्त तक अपडेटेड हैं। 

निगरानी तंत्र नहीं होने का नतीजा
इस नई जानकारी से यह बात साफ होती है कि ट्रायल रुपए हासिल करने के खातिर ही हो रही है, न कि शोध के लिए। कई कंपनियां भारत सरकार को बगैर जानकारी दिए ट्रायल करवा रही हैं। चूंकि ट्रायल की निगरानी का तंत्र ही देश में मौजूद नहीं है, इसलिए कई कंपनियां जमकर लोगों को शिकार बना रही हैं।



ईओडब्ल्यू की जांच इंदौर पहुंची
ड्रग ट्रायल में शामिल सात डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) द्वारा भोपाल में शुरू की गई जांच, सोमवार को इंदौर पहुंच गई। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति की शिकायत की जांच के लिए ईओडब्ल्यू डीआईजी प्रियंका मिश्रा यहां आई और कुछ जरूरी दस्तावेजों को बटोरकर भोपाल रवाना हो गई। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ईओडब्ल्यू जांच के घेरे में हैं। इन पर सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने का आरोप है।



३ अगस्त २०१० को पत्रिका में प्रकाशित खबर

रविवार, जुलाई 25, 2010

ईओडब्ल्यू में जांच शुरू

 आईजी ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना



विदेशी दवा कंपनियों से मिलने वाले रुपए के लिए शुरू हुए ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में शामिल डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने जांच शुरू कर दी है। ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना है। फिलहाल जांच में सात डॉक्टरों के नाम हैं, जो आगे 50 से अधिक तक पहुंच सकते हैं।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति द्वारा ईओडब्ल्यू में शिकायत की गई थी। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया शिकायत को जांच में ले लिया गया है। प्रथम दृष्टया यह बेहद गंभीर मामला दिखता है। आरोपों सच साबित होने पर केस दर्ज किया जाएगा। संभवत: जांच इंदौर ऑफिस भेजी जाएगी।

शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे ने बताया एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया है। 


ये हैं आरोप
एक - सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित की।
दो-  सरकार की जानकारी के बगैर मरीजों की जान आफत में डाली।
तीन- ट्रायल से एमबीबीएस और एमडी/एमएस के छात्रों की पढ़ाई बाधित।
चार- बगैर जानकारी के अवैधानिक तरीके से विदेश यात्राएं की।
पांच - सरकारी खजाने में रुपए न डालकर खुद ने विभिन्न बैंकों में खाते खुलवाए।


लोकायुक्त में एक ओर शिकायत की तैयारी
शुक्रवार को लोकायुक्त में भेजी गई शिकायत के बाद अब दूसरी शिकायत की तैयारी है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति ने बताया डॉक्टरों के नाम से आईसीआईसीआई, एडीएफसी, आईडीबीआई, एचएसबीसी, सिटी बैंक के साथ ही कुछ सहकारी बैंकों में भी खाते हैं। इनकी जांच करने से पूरे लेन-देन की जानकारी मिल सकती है। ये डॉक्टर वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए रुपए भारत मंगवाते हैं। पहली शिकायत में करीब तीन दर्जन डॉक्टरों और अन्य को आरोपी बताया है


सीटीए की भी हो जांच
उधर, विधानसभा में मामला उठाने वाले विधायकों का कहना है 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को वे समझौते भी जगजाहिर करना चाहिए जिनका नाम क्लिनिकल ट्रायल्स एग्रीमेंट (सीटीए) होता है। इससे ही रुपए की असली जानकारी सामने आएगी।


पैसे के लिए बेच रहे देश : हजारे
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने इंदौर प्रवास के दौरान 'पत्रिकाÓ से चर्चा में कहा विदेशी कंपनियों के लिए जो लोग ड्रग ट्रायल कर रहे हैं, वे पैसे के लिए देश को बेच रहे हैं। उनसे देश को बचाना चाहिए। वे कंपनियों के मुनाफे के लिए ही इस काम में लगे हैं। शोध जैसी कोई बात इसमें नहीं है।

News in Patrika on 26th July 2010

लोकायुक्त भी पहुंची शिकायत

मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के साथ ही एथिकल कमेटी व सीटीआरआई को भी बनाया आरोपी
ईओडब्ल्यू भोपाल ने भी शुरू कर दी जांच

रोगी को चूहे की तरह प्रयोगशाला मानकर शुरू हुए दवा आजमाईश के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ में अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज फंसते दिख रहे हैं। आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) के बाद लोकायुक्त में भी शिकायत पहुंच चुकी है। इसमें एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े दो दर्जन से अधिक डॉक्टरों के साथ ही उस एथिकल कमेटी के सदस्यों को भी आरोपी बनाया गया है, जिन्होंने ट्रायल को हरी झंडी दी।

शपथपत्र पर की गई लोकायुक्त शिकायत में कहा गया है कि मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव ने एथिकल कमेटी के सदस्यों से साथ सांठगांठ करके मरीजों की जान खतरे में डाली है। इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार के नियमों का ध्यान नहीं रखा गया। विदेशी दवा कंपनियों से आर्थिक लाभ पाने के लिए गंभीर अनियमितताएं की गई। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने लोकायुक्त को यह भी बताया है कि ड्रग ट्रायल के संबंध में सूचना के अधिकार में कई जानकारियां मांगी गई, लेकिन हमेशा से ही इंकार किया जाता रहा। दस्तावेजों के लिए फिलहाल मामला मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष लंबित है। उधर, सूत्रों का कहना है ईओडब्ल्यू भोपाल में स्वास्थ्य सेवा समर्पण संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे द्वारा की गई शिकायत पर जांच शुरू कर दी है।

इन पर लगे आरोप
मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, ड्रग कंट्रोलर मप्र राकेश श्रीवास्तव, क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. आभा अग्रवाल, एथिकल कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव, कमेटी सदस्य कुट्टी मेनन, डॉ. जयंतीलाल भंडारी, रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये, एडवोकेट योगेश मित्तल, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, उपअधीक्षक डॉ. वीएस पाल, चाचा नेहरू अस्पताल अधीक्षक डॉ. शरद थोरा, चेस्ट सेंटर अधीक्षक डॉ. एम. हरगुनानी, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन, मेडिसिन एचओडी डॉ. जीबी रामटेके, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संजय अवासिया, मेडिसिन कंसलटेंट डॉ. अतुल शेंडे, डॉ. सोनल पगारे, पूर्व एचओडी मेडिसिन डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्ररोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, मनोरोग एचओडी डॉ. रामगुलाम राजदान, मनोरोग कंसल्टेंट डॉ. मनीष पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई के साथ ही जूनियर डॉक्टर सचिन सेठी, गौरव मोहन, प्रोमिता चौधरी, दीलिप सिंह, मयंक जैन, आशीष जैन, प्रज्ञा जैन, मीना ढोल, अब्दुल मंसूर एवं वरूण कटारिया।


News in Patrika on 25th July 2010

इलाज के नाम पर करोड़ों का घालमेल

ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा: ईओडब्ल्यू पहुंचा मामला


ड्रग ट्रायल का गोरखधंधा अब आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) पहुंच गया है। डॉक्टरों से ही जुड़े एक संगठन ने शिकायत की है कि गरीब मरीजों को निशाना बनाकर एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर से जुड़े अस्पतालों में ऐसी दवाइयों का आजमाइश हो रही है, जो बाजार में उतरी ही नहीं है। राज्य सरकार की जानकारी के बगैर इलाज के नाम पर डॉक्टरों ने करोड़ों का घालमेल किया है। इसकी विस्तृत जांच करके भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और ड्रग एंड कास्मेटिक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाए।

 स्वास्थ्य समर्पण सेवा संगठन द्वारा भोपाल स्थित ईओडब्ल्यू मुख्यालय में शिकायत की गई है। संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे ने बताया ट्रायल के नाम पर काला धन राज्य में आ रहा है। ट्रायल करने वाले डॉक्टरों और उनके परिजन के बैंक खातों की जांच की जाए, तो हकीकत उजागर हो सकती है। चूंकि राज्य में ईओडब्ल्यू ही आर्थिक अपराध से जुड़े मामले सुलझाता है, इसलिए शिकायत की।

जीने का अधिकार संकट में
 स्वदेशी जागरण मंच ने शुरू किया विरोध


ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच ने बुधवार को विरोध शुरू कर दिया। मंच ने ट्रायल को जीवन जीने के अधिकार की राह में अड़चन बताया है। इस कार्य में लिप्त डॉक्टरों के विरूद्ध एक सप्ताह में कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में संगठन चरणबद्ध आंदोलन करेगा।

मंच के कार्यकर्ताओं ने अपर आयुक्त गौतमसिंह को राष्टï्रपति एवं राज्यपाल के नाम पांच बिंदुओं का ज्ञापन सौंपा। महानगर संयोजक सुरेश बिजौलिया, विभाग संयोजक बलराम वर्मा एवं महानगर सहसंयोजक मनोज लोढ़े ने बताया मेडिकल हब की शक्ल लेते इंदौर में कुछ डॉक्टर मनुष्य के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। विदेशी कंपनियों की आड़ में मरीज पर जानलेवा प्रयोग किए जा रहे हैं। बारिकी से पूरे मामले की जांच की जाए तो सारा मामला सामने आ सकता है। केंद्र सरकार को चाहिए क्विंटल्स व बायोटेक नाम की स्पांसर कंपनियों को तत्काल प्रतिबंधित करे और राज्य सरकार को चाहिए कि वह तत्काल एक नियामक आयोग गठन करे जो मामले की पड़ताल कर सके। 


अब खंगाल रहे गाइडलाइन
- मरीजों पर प्रयोग करने से पहले तो नहीं दिया ध्यान
- पलट रहे आईसीएमआर, एम्स के नियमों की किताबें



पांच वर्षों से अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाइश (ड्रग ट्रायल) करने वाले डॉक्टर अब उस नैतिक गाइडलाइन की तलाश में है, जो उनका बचाव कर सके। इसके लिए वे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की उन किताबों के पन्ने पलट रहे हैं जिसमें ड्रग ट्रायल के कायदे तय किए गए हैं।

'पत्रिकाÓ द्वारा ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे का खुलासा करने और सरदारपुर, रतलाम व ग्वालियर के विधायकों द्वारा विधानसभा में मामला उठाने के बाद डॉक्टरों को नियमों की याद आई है। अब तक वे क्विंटल्स और बायोटेक जैसी स्पांसर कंपनियों द्वारा तय दिशा में काम करते थे। उन्होंने कभी आईसीएमआर के उन नियमों की परवाह नहीं की जो मनुष्य को प्रयोगशाला बनाने से बचाते हैं।

दो धारी तलवार!
आईसीएमआर के मापदंड दो धारी तलवार की तरह हैं। ट्रायल करने वाले डॉक्टर इसमें अपने बचाव की बातें ढूंढ रहे हैं, जबकि चिकित्सा शिक्षा विभाग डॉक्टरों को कटघरे में खड़े करने के तथ्य।


News in Patrika on 22th July 2010