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रविवार, अगस्त 08, 2010

डॉक्टर को भी पता नहीं रहती दवा

- एमजीएम मेडिकल कॉलेज एथिकल कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव ने की पुष्टि
- मंजूर किया स्टॉफ की कमी के कारण नहीं कर पाते मरीजों की निगरानी 


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित जिन दवाओं का मरीज पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) किया जा रहा है, उनमें से ज्यादातर के नाम तक डॉक्टरों को पता नहीं रहते हैं। दवा एक केमिकल मिश्रण होता है और उसके तत्वों की जानकारी सिर्फ कंपनी को ही रहती है। डॉक्टर तो दवा को एक नंबर से जानते हैं। हालांकि, उन्हें दवा के साइड इफेक्ट की पूरी जानकारी रहती है।
इस बात की पुष्टि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में ट्रायल को अनुमति देने के लिए बनाई गई एथिकल कमेटी के अध्यक्ष डॉ. केडी भार्गव भी करते हैं। शहर के ख्यात गेस्ट्रोइंटोलॉजिस्ट व कॉलेज के मेडिसिन विभाग के पूर्व एचओडी डॉ. भार्गव ने 'पत्रिकाÓ को बताया इंदौर में डबल ब्लाइंड श्रेणी के ट्रायल चल रहे हैं। इस श्रेणी का अर्थ है जिस दवा का प्रयोग मरीज पर किया जाता है, उसकी जानकारी न तो डॉक्टर को रहती है और न ही मरीज को। प्लेसिबो ट्रायल में भी मरीज को दवा देना बंद कर दिया जाता है। उसे जो गोली दी जाती है, उसमें ग्लूकोज या स्टार्च रहता है,जो बेअसर रहता है। यह प्रयोग दवा के प्रभाव को जानने के लिए किया जाता है।


हैरान करते डॉ. केडी भार्गव के पांच कथन
 एथिकल कमेटी अध्यक्ष डॉ. केडी भार्गव


कथन एक - ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट में 2005 में किया गया संशोधन ड्रग ट्रायल पर लागू नहीं होता है।
सच्चाई- 20 जनवरी 2005 को भारत सरकार ने एक्ट के दूसरे संशोधन का नोटिफिकेशन किया। इसके शेड्यूल 'वायÓ के तमाम नियम ड्रग ट्रायल के लिए बनाए गए हैं। स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने भी विधानसभा में इस एक्ट की बाध्यता की बात कही है।

कथन दो - भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की गाइडलाइन ड्रग ट्रायल पर लागू नहीं होती है। हम केवल ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा बहुराष्टरीय कंपनी को मिली अनुमति और क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) रजिस्ट्रेशन देखते हैं।
सच्चाई- देश में होने वाले सभी चिकित्सा शोधों के लिए आईसीएमआर सर्वोच्च संस्था है। ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट संशोधन की लचरता का फायदा उठाकर 2005 के बाद बहुराष्टï्रीय कंपनियों ने धड़ल्ले से ट्रायल शुरू की तो आईसीएमआर ने अक्टूबर 2006 में 120 पेज की गाइडलाइन जारी की। इसकी अनदेखी करना अनैतिक कार्य है।

कथन तीन - राज्य सरकार को ड्रग ट्रायल मामले में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह वैसे ही खुद का काम ठीग ढंग से नहीं कर पा रही है।
सच्चाई - राज्य सरकार के विषयों की सूची में एक है स्वास्थ्य। राज्य के नागरिकों की सेहत की सीधी जिम्मेवारी राज्य की ही है। ऐसे में राज्य का नियंत्रण नहीं होने के कारण कंपनियों से मिलने वाले रुपए के चक्कर में नागरिकों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है। राज्य का नियंत्रण नहीं होने से निजी क्षेत्र में भी बेकाबू ट्रायल जारी हैं।

कथन चार - मरीज की सहमति के लिए उसे हिंदी में बनाया गया पांच से छह पेज का पत्र सौंपा जाता है।
सच्चाई- एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव के हस्ताक्षर से सूचना का अधिकार में प्राप्त हिंदी का सहमति पत्र महज एक पेज का है। इसमें ट्रायल का जिक्र ही नहीं है। बस यह बताया गया है कि डॉक्टर एक अध्ययन कर रहे हैं और इसमें मरीज की जरूरत है।

कथन पांच- क्लिनिकल ट्रायल एग्रीमेंट (सीटीए) पर स्पांसर कंपनी, ट्रायल करने वाले डॉक्टर और मेडिकल कॉलेज डीन के हस्ताक्षर होते हैं। हर बात डीन की जानकारी में रहती है।
सच्चाई- वर्ष 2003 से अब तक के डीन (डॉ. वीके सैनी, डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. एमके सारस्वत) ने कभी किसी सीटीए पर हस्ताक्षर नहीं किए। मौजूद एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव और उनके पूर्व के डॉ. सीवी कुलकर्णी ने भी इस तरह के किसी एग्रीमेंट की जानकारी होने से इंकार किया है।

कॉलेज को रुपए मिले, तो बंद होंगे ट्रायल
डॉ. भार्गव मंजूर करते हैं ट्रायल के एवज में कंपनियां डॉक्टरों को रुपए देती हैं और उन्हें विदेश भी ले जाती है। यह भी बिल्कुल सच है कि कंपनियों से आनी वाली रकम सीधे कॉलेज के खाते में जमा होने लगे तो डॉक्टर ट्रायल बंद कर देंगे। 

हम बुजुर्ग हैं, कैसे करें निगरानी
डॉ. भार्गव कहते हैं कमेटी के पास स्टॉफ मौजूद नहीं है, इसलिए उन मरीजों की नियमित निगरानी नहीं की जाती है। मैं खुद 72 वर्ष का हो चुका हूं। दूसरे सदस्य पूर्व जस्टिस पीडी मूल्ये और पर्यावरणविद् कुट्टी मेनन भी बुजुर्ग हैं और ऐसे में फुल टाइम इस काम को नहीं दे पाते हैं। इस काम के लिए तनख्वाह पर किसी व्यक्ति को रखने की जरूरत है।


दूसरे सदस्य भी अनजान
एथिकल कमेटी के सदस्य हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये कहते हैं दवा की अनुमति मुंबई से लेना पड़ती है। सच्चाई यह है कि सीटीआरआई का ऑफिस दिल्ली में है। पर्यावरणविद कुट्टी मेनन और अर्थशास्त्री डॉ. जयंतीलाल भंडारी मंजूर करते हैं कि उन्हें उस रुपए की जानकारी नहीं रहती, जो कंपनी द्वारा ट्रायल करने वाले डॉक्टर को दिया जाता है।


डॉ. भराणी, पुराणिक ने शुरू की ट्रायल
डॉ. भार्गव बताते हैं डॉ. अपूर्व पुराणिक और डॉ. अनिल भराणी अपने क्षेत्र के बेहद काबिल लोग हैं। एक ने न्यूरोलॉजी और दूसरे ने कॉर्डियोलॉजी में एम्स से डीएम किया। जब मैं मेडिसिन का एचओडी बना तब दोनों किसी कांफ्रेंस के सिलसिले में विदेश गए। वहां किसी दवा कंपनी वाले ने उन्हें ट्रायल करने की सलाह दी। इसके बाद ही दोनों ने एमवायएच में यह काम शुरू किया।

News in Patrika on 8th August 2010

परिजन पर क्यों नहीं किए ट्रायल?

डॉक्टरों ने दी ड्रग ट्रायल पर सफाई, डीन को भी दी जाती है पूरी राशि की जानकारी

ड्रग ट्रायल के आरोपों से घिरे डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल क्या है और इससे क्या लाभ हैं इसे लेकर डॉक्टरों ने होटल क्राउन पैलेस में गोष्ठी का आयोजन किया। डॉक्टरों ने बताया कि कोई भी कंपनी डॉक्टर की योग्यता देखकर ही अनुबंध करती है। डॉक्टरों ने कहा कि कंपनियों से मिलने वाली राशि का खुलासा आयकर विभाग के समक्ष किया जाता है। इसमें कोई चोरी नहीं की जाती। मरीजों की सहमति से किए जाने वाले ट्रायल में किसी तरह की आशंका की गुंजाइश नहीं रह जाती।

ट्रायल विश्व के सभी विकसित और विकासशील देशों में किए जा रहे हैं। यह रोजगार के अवसर पैदा करता है और अनुसंधान में देश को आगे ले जाता है। गोष्ठी में कॉलेज डीन की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया। ट्रायल के माध्यम से मिलने वाली राशि की पूरी जानकारी डीन को भी दी जाती है। बैठक में ये सवाल भी उठा कि क्यों गरीब मरीजों पर ही ट्रायल किए जाते हैं? कितने डॉक्टरों ने परिवार के सदस्यों पर ट्रायल किए? इनमें से किसी भी सवाल का जवाब डॉक्टर नहीं दे सके। बैठक में पूर्व कुलपति और ट्रायल का कानून तैयार कर रहे डॉ. भरत छपरवाल, डॉ. सरोज कुमार, अभय छजलानी, इथिकल कमेटी के सचिव डॉ. अनिल भराणी, डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. आरके माथुर, डॉ. पूनम माथुर, डॉ. उज्ज्वल सरदेसाई व जूनियर डॉक्टर आदि मौजूद थे।

news in Patrika on 7th August

ड्रग ट्रायल से ३ साल में १५१९ मौतें

  केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री ने लोकसभा में कबूली सच्चाई


 बहुराष्टरीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) में सरकार की अनदेखी और डॉक्टरों की मनमानी का मुद्दा लोकसभ  को लेकर तमाम तरह के विवादों और ना नुकुर के बावजूद सरकार ने मान लिया है कि औषधियों के परीक्षण में पिछले तीन साल में करीब १५१९ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राच्य मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने शुक्रवार को लोकसभा में बताया कि दवाइयों की नैदानिक जांच यानी ड्रग ट्रायल के दौरान वर्ष २००७ में १३२, २००८ में २८८, २००९ में ६३७ और जून २०१० तक ४६२ लोगों की मौत हुई है। हालांकि इन लोगों की मौत के कई और भी कारण हो सक ते हैं। गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों पर दवाओं का प्रतिकूल प्रभाव च्यादा घातक भी हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि पत्रिका ने इंदौर में मरीजों को धोखे में रखकर ड्रग ट्रायल करने वाले रैकेट का भंडाफोड़ किया था, इसके बाद देश भर में इसको लेकर गंभीर बहस छिड़ गई। त्रिवेदी के के मुताबिक देश में ड्रग ट्रायल की अनुमति चाहने वाली दवा निर्माता कंपनियों और ट्रायल संगठनों की बहुत बड़ी तादाद है। 

 केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के पास लंबित आवेदनों में ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, जॉनसन एंड जॉनसन , एमएसडी, एलीलिली, नोवाॢटस, ब्रिस्टल माइर्स स्क्लिब्स , बेयर हेल्थकेयर, एस्ट्र जेनेका, फाइजर जैसी दवा कंपनियां और क्विंटाइल्स, आईसीओएन, जीवीके बायो, सिरो क्लिनफार्म, पीआरए इंटरनेशनल , पीपीडी, कोवान्स और ओमनीकेयर जैसे नैदानिक अनुसंधान संगठन शामिल हैं।  
 




News in Patrika on 7th Aug 2010

सोमवार, अगस्त 02, 2010

कौन सच्चा अमेरिका या भारत ?

अमेरिका की कंपनियों के इंदौर में 99 ट्रायल हुए, लेकिन भारत सरकार को 56 की ही जानकारी


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का इंसानों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भारत सरकार के आंकड़े कटघरे में हैं। ट्रायल का रजिस्ट्रेशन करने वाली भारत की सरकारी संस्था क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया और अमेरिका के राष्टरीय स्वास्थ्य संस्थान के आंकड़ों में भारी अंतर है। भारत सरकार को जानकारी है कि इंदौर में अब तक 56 ट्रायल हुए हैं, जबकि अमेरिका सरकार कहती है इंदौर में 99 ट्रायल हुए हैं। इसके अलावा दूसरे देश भी हैं, जहां की विकसित दवाइयां इंदौर में परखी गई हैं।

अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ नाम का सरकारी विभाग है। इसकी वेबसाइट पर दर्ज है कि अमेरिका की कंपनियों से भारत में 1432 ट्रायल किए हैं। इनमें से 176 जयपुर में और 47 भोपाल में हुए हैं। इधर, भारत के सीटीआरआई की वेबसाइट बताती है जयपुर में 121 ट्रायल हुए हैं, जबकि भोपाल की कोई जानकारी ही उपलब्ध नहीं है। दोनों ही वेबसाइट 2 अगस्त तक अपडेटेड हैं। 

निगरानी तंत्र नहीं होने का नतीजा
इस नई जानकारी से यह बात साफ होती है कि ट्रायल रुपए हासिल करने के खातिर ही हो रही है, न कि शोध के लिए। कई कंपनियां भारत सरकार को बगैर जानकारी दिए ट्रायल करवा रही हैं। चूंकि ट्रायल की निगरानी का तंत्र ही देश में मौजूद नहीं है, इसलिए कई कंपनियां जमकर लोगों को शिकार बना रही हैं।



ईओडब्ल्यू की जांच इंदौर पहुंची
ड्रग ट्रायल में शामिल सात डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) द्वारा भोपाल में शुरू की गई जांच, सोमवार को इंदौर पहुंच गई। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति की शिकायत की जांच के लिए ईओडब्ल्यू डीआईजी प्रियंका मिश्रा यहां आई और कुछ जरूरी दस्तावेजों को बटोरकर भोपाल रवाना हो गई। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल ईओडब्ल्यू जांच के घेरे में हैं। इन पर सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने का आरोप है।



३ अगस्त २०१० को पत्रिका में प्रकाशित खबर

रविवार, अगस्त 01, 2010

शोध नहीं है ड्रग ट्रायल


एमसीआई के पत्र का साफ संदेश


ड्रग ट्रायल शोध है या नहीं? इस बहस का जवाब चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी सर्वोच्च संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के एक नियम में मिलता है। एमसीआई के मुताबिक जब ड्रग ट्रायल के परिणाम भारत में प्रकाशित किए जा सकें, तभी यह शोध है। यदि दवा कंपनी ऐसा नहीं करने देती है, तो ट्रायल किया ही नहीं जाना चाहिए।

एमसीआई ने इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन करके यह बात गत वर्ष ही स्पष्ट की है। दरअसल, भारत सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 में वर्ष 2005 में संशोधन किया तो देशभर में डॉक्टरों ने शोध के नाम पर ड्रग ट्रायल शुरू कर दिए, परंतु इसके परिणामों को छापने की अनुमति किसी को नहीं मिली। डॉक्टर से समझौता करने वाली स्पांसर कंपनी ने ड्रग ट्रायल के परिणामों को प्रकाशित करने का अधिकार स्वयं के पास सुरक्षित रखती हैं। एमसीआई ने इसी बंधन से ट्रायल को मुक्त रखने के लिए नए नियम जारी किए।

आईसीएमआर के ट्रायल शोध
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) देशभर में जो भी ट्रायल करवाती है, उन्हें चिकित्सा जगत में शोध का दर्जा दिया गया है। पोलियो की दवा, स्वाइन फ्लू का टीका ऐसे ही ट्रायल हैं। इनके नतीजों को भारत सरकार द्वारा प्रकाशित किया जाता है और ये देश में चिकित्सा विज्ञान की प्रगति में सहायक साबित होते हैं। बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के परीक्षण के नतीजों पर कंपनी का अधिकार रहता है।




जवाब भी तैयार नहीं कर पाई सरकार
 बीस दिन में भी नहीं जुटी जानकारी
 तीनों विधायकों के प्रश्न अब तक बेजवाब


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) मामले में भले ही सरकार ने कायदे कानून बनाने की घोषणा कर दी हो, लेकिन अभी भी तीन विधायकों के प्रश्नों के जवाब तैयार नहीं हुए हैं। इन विधायकों ने सरकार से सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में ड्रग ट्रायल की जानकारी चाही थी।

सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल, रतलाम के पारस सकलेचा और ग्वालियर के प्रदुम्म तोमर ने तारांकित प्रश्न पूछे थे। बीस दिन पहले (12 जुलाई) को ग्रेवाल का सवाल सभी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचा था। सदन ने ग्रेवाल को सूचना दी थी कि 23 जुलाई को जवाब दे दिया जाएगा, परंतु जब उन्होंने मांगा तो कहा गया जानकारी जुटाई जा रही है। ऐसा ही जवाब सकलेचा और तोमर को मिला।

प्रक्रिया पर सवालिया निशान
विधानसभा में पूछे जाने वाले सवाल के जवाब तय समय सीमा में देने जिम्मेदारी सरकारी अमले की है। मीडिया में जब मामला आ जाए, तो और भी सक्रियता के साथ जानकारी तैयार की जाना चाहिए, परंतु इस मसले में ऐसा नहीं किया गया।

अनियमितता दबाने की कोशिश तो नहीं
ड्रग ट्रायल में बहुत अधिक राशि का लेन-देन होता है। एक मरीज के लिए डॉक्टर को औसतन दो से पांच लाख रुपए मिलते हैं। माना जा रहा है कि इसी पर परदा डालने के लिए जानकारी रोकी गई है।

इन सवालों में अटकी सरकार
- ड्रग ट्रायल कराने वाली कंपनियों से किस डॉक्टर को कितनी राशि मिली?
- जिन मरीजों पर ट्रायल किया गया, क्या उन्हें इसकी जानकारी दी गई? यदि हां, तो नाम बताएं।
- किसी भी राशि के लेनदेन के लिए किससे इजाजत ली गई?
- पांच वर्ष में कितने डॉक्टर विदेश गए और उन्हें किस कंपनी ने भेजा? क्या वे अनुमति लेकर गए?


News in PATRIKA on 02 Aug 2010

निजी अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल का धोखा

ड्रग ट्रायल
कई अस्पतालों में धड़ल्ले से निशाना बन रहे मरीज
स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है कोई जानकारी











बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा और टीकों का परीक्षण (ड्रग ट्रायल) केवल सरकारी एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में ही नहीं हो रहा है। कई निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में भी यह काम जोरों पर है। ऐसा भी नहीं है कि किसी एक बीमारी के रोगियों पर ही ट्रायल चल रहे हैं। दिल के ऑपरेशन में लगने वाले स्टेंट से लेकर इनहेलर तक और डायबिटीज से लेकर कैंसर तक के रोगियों तक पर प्रयोग हो रहे हैं। 

भारत सरकार के क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री-इंडिया (सीटीआरआई) का रिकॉर्ड बताता है कि मप्र में सबसे अधिक ट्रायल इंदौर में किए जा रहे हैं। पिछले चार वर्ष (२००६-२००९) के आंकड़ों पर गौर करें तो मप्र में ८३ दवाओं के ट्रायल किए गए इनमें से ५६ ट्रायल इंदौर में हुए, जबकि २७ ट्रायल भोपाल सहित प्रदेश के अन्य शहरों में किए गए।

निजी अस्पतालों में हो रहे ड्रग ट्रायल के बारे में विभाग के पास कोई जानकरी उपलब्ध नहीं है। नियम देखकर इनके बारे में पड़ताल की जाएगी।
- डॉ. शरद पंडित, सीएमएचओ, इंदौर

ये हैं कुछ निजी डॉक्टर

1. डॉ. सुनील एम. जैन
अस्पताल- टोटल (डायबिटीज थॉयरॉइड हॉरमोन रिसर्च इंस्टीट्यूट)
कंपनी - बोईरिंगर इंगेल्हिम फार्मास्यूटिकल्स सहित कुछ अन्य कंपनियां
उत्पाद - बीआई १३५६ (५ एमजी) सहित कुछ अन्य उत्पाद
बीमारी - डायबिटीक मरीजों में ग्लायकेमिक

२. डॉ.गोविंद एन.मालपानी
अस्पताल-  सुयश
कंपनी - ल्यूपिन
उत्पाद - एलएलएल २०११, नेसल स्प्रे
बीमारी - माइग्रेन


3. डॉ.एके पटेल
अस्पताल-  चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - पेल्सीटेक्सल, सिस्प्लेटिन (किमोथेरेपिक एजेंट)
बीमारी - स्मॉल सेल लंग केंसर 


4. डॉ. सुशील भाटिया
अस्पताल- चोईथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर
कंपनी - केडिला फार्मास्यूटिकल्स
उत्पाद - मायकोबैक्टेरियम विथ डॉसिटेक्साल
बीमारी - प्रोस्टेट केंसर

5. डॉ.गिरीश के कवठेकर
 अस्पताल  - सीएचएल अपोलो अस्पताल
 कंपनी  - इन्फीनियम-कोर
 उत्पाद   - कोरोनरी स्टेंट
 बीमारी  - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


6. डॉ.विनोद सोमानी
अस्पताल -  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


7. डॉ. शैलेंद्र त्रिवेदी
अस्पताल-  सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज के उपचार के लिए


8. डॉ. नितीन मोदी
अस्पताल- सीएचएल अपोलो 
कंपनी - इन्फीनियम-कोर
उत्पाद - कोरोनरी स्टेंट
बीमारी - कोरोनरी आर्टरी ब्लॉकेज 


9. डॉ. बीएस ठाकुर
अस्पताल-  गे्रटर कैलाश
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स व जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 


10. डॉ. अतुल शेंडे
अस्पताल - मानव ट्रेड सेंटर स्थित क्लिनिक
कंपनी - प्रॉक्टर एण्ड गैम्बल फार्मास्यूटिकल्स और जाइडस
उत्पाद - टेबलेट मेजालामाइन ८०० एमजी, एसाकोल ८००एमजी
बीमारी - अल्सरेटिव कोलाइटिस 

11. डॉ. प्रवर पासी
अस्पताल- ग्रेटर कैलाश 
कंपनी - बायोजेन आइडेक
उत्पाद - १२५ एमसीजी, बीआईआईबी ०१७
बीमारी - मल्टीपल सिरोसिस

( खबर शैलेष दीक्षित से साभार)

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आंध्रप्रदेश के कानून पर कमेटी की निगाह 
 प्रमुख सचिव के साथ डीएमई और डॉ. छपरवाल भी शामिल

बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के परीक्षण (ड्रग ट्रायल) को प्रदेश में काबू करने के लिए नियमावली बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यी कमेटी की निगाह आंध्रप्रदेश के कानून पर है। वहां ड्रग ट्रायल को प्रतिबंधित किया गया है। कमेटी संभवत: एक माह में रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी।

स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने शुक्रवार को विधानसभा में कमेटी गठित करने की घोषणा की थी। शनिवार को 'पत्रिकाÓ से चर्चा में उन्होंने बताया चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी की अध्यक्षता में बनाई कमेटी में संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी और एमसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल सदस्य रहेंगे।

उधर, दाणी ने बताया फिलहाल ड्रग ट्रायल के संबंध में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट लागू किया गया है। अध्ययन करने के बाद ही स्पष्ट होगा कि राज्य सरकार इस बारे में क्या कर सकती है? दोनों अन्य सदस्यों के साथ शीघ्र ही बैठक की जाएगी। कोशिश रहेगी कि एक महीने में रिपोर्ट बनाकर दे दी जाए। डॉ. छपरवाल ने बताया फिलहाल मुझे कमेटी के सदस्य बनाए जाने की जानकारी नहीं मिली है। मौजूदा कानूनों और गाइडलाइन का अध्ययन करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।



सीबीआई, एमसीआई को भी शिकायत
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) में जांच शुरू होने के साथ ही एमजीएम मेडिकल कॉलेज के ड्रग ट्रायल की शिकायत सीबीआई और एमसीआई को भी पहुंच चुकी है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने बताया दोनों स्थानों पर शपथ पत्र के साथ शिकायत की गई है।

शनिवार, जुलाई 31, 2010

दवा कंपनियां अटका देती हैं कानून

Drug Trial : A Money Game to treat Man as Guinea-pig


साढ़े चार वर्ष से केंद्र सरकार नहीं कर सकी फैसला
 आईसीएमआर की सिफारिश के बावजूद संसद नहीं पहुंच सका  बिल 

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित की गई दवाओं और टीकों के लोगों पर ïपरीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए भारत सरकार के पास भी एक कानून (बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल) साढ़े चार वर्ष से अटका हुआ है। इस देरी का कारण अरबों रुपए के बजट वाली दवा कंपनियों को माना जाता है। ताज्जुब तो यह है कि इस कानून को संसद में पेश करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) कई बार सिफारिश कर चुकी है।

नागरिकों को अनजान दवाइयों के प्रभाव से बचाने के लिए 2005 में केंद्र सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया। इसी के बाद ड्रग ट्रायल करने का कार्य विधिवत शुरू हुआ। इसके पहले बगैर किसी नियंत्रण या जानकारी के ट्रायल होते थे, किंतु एक्ट में संशोधन भी बेहद लचर साबित हुआ। न तो इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है और न ही किसी भी डॉक्टर पर निगरानी करने की कोई व्यवस्था। यही वजह है कि दवा कंपनियों ने तेजी से देशभर में पांव पसारे और उन डॉक्टरों का चयन किया जिन पर मरीजों को अटूट भरोसा रहता है। डॉक्टरों ने भी 'शोधÓ के नाम पर धड़ाधड़ रोगियों को प्रयोगशाला बनाना शुरू कर दिया। आईसीएमआर को इसकी भनक लगी तो अक्टूबर 2006 में 120 पेज की एक गाइडलाइन जारी की गई। इसका भी देशभर में जमकर उल्लंघन हुआ।

गाइडलाइन बनाने के बीच में ही आईसीएमआर ने बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल का खाका तैयार किया। इसे जनवरी 2006 में विधि विभाग के पास भेजा गया। वहां से इसे मंजूरी भी मिल गई, लेकिन इसके बाद से यह फाइलों में खो गया।

कानून के बगैर काबू संभव नहीं
आईसीएमआर निदेशक डॉ. वीएम कटोच ने 'पत्रिकाÓ से चर्चा में बताया जब तक कानून नहीं लाया जाएगा, ड्रग ट्रायल्स पर काबू पाना कठिन है। हम केवल गाइडलाइन जारी कर सकते हैं, उसके पालन करवाने को लेकर कोई तंत्र मौजूद नहीं है।

एमसीआई ने भी बदले नियम
आईसीएमआर की तरह ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भी ड्रग ट्रायल घपले की जानकारी मिल चुकी थी। यही वजह कि एमसीआई सचिव डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को पत्र लिखकर इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन की जानकारी दी थी। इसमें सभी डॉक्टरों से कहा गया था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। 

मप्र नर्सिंगहोम एक्ट भी अधूरा
मप्र सरकार ने 17 जनवरी 2007 से नर्सिंगहोम एक्ट लागू किया है। इसमें भी ड्रग ट्रायल को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं है। यही वजह है कि राज्य सरकार को अब तक यह पता नहीं है कि निजी अस्पतालों में कौन डॉक्टर किस मरीज पर किस दवा का प्रयोग कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में करीब 60 डॉक्टर ट्रायल में लिप्त हैं। सीएमएचओ डॉ. शरद पंडित ने बताया फिलहाल किसी भी अस्पताल की एथिकल कमेटी की जानकारी हमें नहीं है। यह मामला पहली बार प्रकाश में आया है। अब वरिष्ठ कार्यालय के ध्यान में लाया जाएगा। 


एक मरीज पर मिलते दो से पांच लाख
ड्रग ट्रायल के खेल में धन के प्रभाव को इसी से मापा जा सकता है कि अधिकांश कंपनियां ट्रायल करने वाले डॉक्टर को एक मरीज के एवज में दो से पांच लाख रुपए तक देती है। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही वर्ष 2008-09 में डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया को दमे के रोगियों पर मोमेटासोन और फॉरमेट्रोल नामक दवा को दो मरीजों पर इस्तेमाल करने पर 6 लाख 36 हजार रुपए मिले थे। डॉ. अपूर्व पुराणिक को डोनेपेझिजल एआर दवा के प्रयोग के लिए प्रति मरीज 1.10 लाख रुपए मिले।


उम्रकैद से कम नहीं

चिकित्सा क्षेत्र में तरक्की हो इसके लिए ड्रग ट्रायल की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इससे गुजरने वाले मरीजों के हितों की रक्षा कौन करेगा? उन डॉक्टरों पर निगरानी का तंत्र क्या हो, इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया था। देर से ही सही, कायदे-कानून की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल, सवाल विश्वास का है। वह विश्वास जो मरीज अपने डॉक्टर की आंख में देखता है, उसे भगवान मानता है। चंद डॉक्टरों की हरकतों से अगर समूचे चिकित्सा  जगत की साख संकट में पड़ जाए तो यह ठीक नहीं होगा। ड्रग ट्रायल से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच-पड़ताल में चौंकाने वाले और दु:खद पहलू सामने आए। सरकार की भी कलई खुल गई। निजी अस्पतालों की दूर उसे तो यह भी पता नहीं कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ड्रग ट्रायल के नाम पर मरीजों के साथ क्या हो रहा है। ऐसे हालात में आंख पर पट्टी बांधकर ड्रग ट्रायल की पैरोकारी करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि इस अराजकता से आखिर लाभ किसे है? इस तकनीकी विषय पर आम आदमी की कम जानकारी का धंधेबाजों ने जमकर फायदा उठाया है। राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी इस विषय में बहुत गंभीर नहीं दिखती। ट्रायल में धंधेबाजों की घुसपैठ को देखकर भारतीय चिकित्सा और अनुसंधान परिषद ने चार साल पहले कानून संशोधन सुझाए।   

विधि विभाग की अनुमति भी मिल गई, इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए आज तक सख्त कानून के लिए कोई संशोधन नहीं किया गया। यही वजह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा ड्रग ट्रायल भारत में हो रहे हैं। मप्र सरकार को ड्रग ट्रायल पर बेहद सख्त नियम कानून बनाने होंगे। दोषी डॉक्टर को उम्रकैद से कम का प्रावधान न हो। नियमों का उल्लंघन करने वाले की डिग्री छीनी जानी चाहिए।
News in PATRIKA ON 31th July 2010