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शनिवार, जुलाई 31, 2010

दवा कंपनियां अटका देती हैं कानून

Drug Trial : A Money Game to treat Man as Guinea-pig


साढ़े चार वर्ष से केंद्र सरकार नहीं कर सकी फैसला
 आईसीएमआर की सिफारिश के बावजूद संसद नहीं पहुंच सका  बिल 

बहुराष्टï्रीय दवा कंपनियों द्वारा विकसित की गई दवाओं और टीकों के लोगों पर ïपरीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए भारत सरकार के पास भी एक कानून (बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल) साढ़े चार वर्ष से अटका हुआ है। इस देरी का कारण अरबों रुपए के बजट वाली दवा कंपनियों को माना जाता है। ताज्जुब तो यह है कि इस कानून को संसद में पेश करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) कई बार सिफारिश कर चुकी है।

नागरिकों को अनजान दवाइयों के प्रभाव से बचाने के लिए 2005 में केंद्र सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया। इसी के बाद ड्रग ट्रायल करने का कार्य विधिवत शुरू हुआ। इसके पहले बगैर किसी नियंत्रण या जानकारी के ट्रायल होते थे, किंतु एक्ट में संशोधन भी बेहद लचर साबित हुआ। न तो इसमें कड़ी सजा का प्रावधान है और न ही किसी भी डॉक्टर पर निगरानी करने की कोई व्यवस्था। यही वजह है कि दवा कंपनियों ने तेजी से देशभर में पांव पसारे और उन डॉक्टरों का चयन किया जिन पर मरीजों को अटूट भरोसा रहता है। डॉक्टरों ने भी 'शोधÓ के नाम पर धड़ाधड़ रोगियों को प्रयोगशाला बनाना शुरू कर दिया। आईसीएमआर को इसकी भनक लगी तो अक्टूबर 2006 में 120 पेज की एक गाइडलाइन जारी की गई। इसका भी देशभर में जमकर उल्लंघन हुआ।

गाइडलाइन बनाने के बीच में ही आईसीएमआर ने बायोलॉजिकल रिसर्च ह्युमन सब्जेक्ट्स प्रमोशन एंड रेग्यूलेशन बिल का खाका तैयार किया। इसे जनवरी 2006 में विधि विभाग के पास भेजा गया। वहां से इसे मंजूरी भी मिल गई, लेकिन इसके बाद से यह फाइलों में खो गया।

कानून के बगैर काबू संभव नहीं
आईसीएमआर निदेशक डॉ. वीएम कटोच ने 'पत्रिकाÓ से चर्चा में बताया जब तक कानून नहीं लाया जाएगा, ड्रग ट्रायल्स पर काबू पाना कठिन है। हम केवल गाइडलाइन जारी कर सकते हैं, उसके पालन करवाने को लेकर कोई तंत्र मौजूद नहीं है।

एमसीआई ने भी बदले नियम
आईसीएमआर की तरह ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भी ड्रग ट्रायल घपले की जानकारी मिल चुकी थी। यही वजह कि एमसीआई सचिव डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को पत्र लिखकर इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन की जानकारी दी थी। इसमें सभी डॉक्टरों से कहा गया था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। 

मप्र नर्सिंगहोम एक्ट भी अधूरा
मप्र सरकार ने 17 जनवरी 2007 से नर्सिंगहोम एक्ट लागू किया है। इसमें भी ड्रग ट्रायल को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं है। यही वजह है कि राज्य सरकार को अब तक यह पता नहीं है कि निजी अस्पतालों में कौन डॉक्टर किस मरीज पर किस दवा का प्रयोग कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में करीब 60 डॉक्टर ट्रायल में लिप्त हैं। सीएमएचओ डॉ. शरद पंडित ने बताया फिलहाल किसी भी अस्पताल की एथिकल कमेटी की जानकारी हमें नहीं है। यह मामला पहली बार प्रकाश में आया है। अब वरिष्ठ कार्यालय के ध्यान में लाया जाएगा। 


एक मरीज पर मिलते दो से पांच लाख
ड्रग ट्रायल के खेल में धन के प्रभाव को इसी से मापा जा सकता है कि अधिकांश कंपनियां ट्रायल करने वाले डॉक्टर को एक मरीज के एवज में दो से पांच लाख रुपए तक देती है। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही वर्ष 2008-09 में डॉ. अशोक वाजपेयी और डॉ. संजय अवासिया को दमे के रोगियों पर मोमेटासोन और फॉरमेट्रोल नामक दवा को दो मरीजों पर इस्तेमाल करने पर 6 लाख 36 हजार रुपए मिले थे। डॉ. अपूर्व पुराणिक को डोनेपेझिजल एआर दवा के प्रयोग के लिए प्रति मरीज 1.10 लाख रुपए मिले।


उम्रकैद से कम नहीं

चिकित्सा क्षेत्र में तरक्की हो इसके लिए ड्रग ट्रायल की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इससे गुजरने वाले मरीजों के हितों की रक्षा कौन करेगा? उन डॉक्टरों पर निगरानी का तंत्र क्या हो, इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया था। देर से ही सही, कायदे-कानून की घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए।

दरअसल, सवाल विश्वास का है। वह विश्वास जो मरीज अपने डॉक्टर की आंख में देखता है, उसे भगवान मानता है। चंद डॉक्टरों की हरकतों से अगर समूचे चिकित्सा  जगत की साख संकट में पड़ जाए तो यह ठीक नहीं होगा। ड्रग ट्रायल से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच-पड़ताल में चौंकाने वाले और दु:खद पहलू सामने आए। सरकार की भी कलई खुल गई। निजी अस्पतालों की दूर उसे तो यह भी पता नहीं कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ड्रग ट्रायल के नाम पर मरीजों के साथ क्या हो रहा है। ऐसे हालात में आंख पर पट्टी बांधकर ड्रग ट्रायल की पैरोकारी करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि इस अराजकता से आखिर लाभ किसे है? इस तकनीकी विषय पर आम आदमी की कम जानकारी का धंधेबाजों ने जमकर फायदा उठाया है। राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी इस विषय में बहुत गंभीर नहीं दिखती। ट्रायल में धंधेबाजों की घुसपैठ को देखकर भारतीय चिकित्सा और अनुसंधान परिषद ने चार साल पहले कानून संशोधन सुझाए।   

विधि विभाग की अनुमति भी मिल गई, इसके बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए आज तक सख्त कानून के लिए कोई संशोधन नहीं किया गया। यही वजह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा ड्रग ट्रायल भारत में हो रहे हैं। मप्र सरकार को ड्रग ट्रायल पर बेहद सख्त नियम कानून बनाने होंगे। दोषी डॉक्टर को उम्रकैद से कम का प्रावधान न हो। नियमों का उल्लंघन करने वाले की डिग्री छीनी जानी चाहिए।
News in PATRIKA ON 31th July 2010

ड्रग ट्रायल पर कानूनी अंकुश

Mahendra Hardia
ड्रग ट्रायल के लिए नियम व दिशा-निर्देश बनाने के वास्ते प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी। इसकी सिफारिश आने के बाद अगर जरूरी होगा तो विधानसभा में विधेयक लाकर कानून बनाने पर सरकार विचार करेगी।
महेंद्र हार्डिया, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री

चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री हार्डिया ने की विधानसभा में घोषणा
नियम और दिशा-निर्देश बनाने के लिए बनाई कमेटी


बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाओं के रोगियों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) को काबू करने के लिए राज्य सरकार ने नियम-कायदे बनाने की घोषणा की है। लोक स्वास्थ्य परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा राज्यमंत्री महेंद्र हाॢडया ने शुक्रवार को विधानसभा में चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने की घोषणा की।
उन्होंने कहा कि रिपोर्ट आने के बाद जरूरी हुआ तो कानून भी बनेगा। हार्डिया ने यह घोषणा कांग्रेस के अजय ङ्क्षसह और प्रताप ग्रेवाल व अन्य की ध्यानाकर्षण सूचना पर की। उन्होंने कहा, इंदौर मेडिकल कॉलेज में मरीजों पर ट्रायल नियम विरुद्ध मिला तो जांच कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

मरीजों की संख्या गलत
सरकार ने बताया सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 2365 पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 बच्चे थे। 'पत्रिकाÓ को प्राप्त दस्तावेज बताते हैं कि ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में ही 3500 रोगियों पर ट्रायल हो चुके हैं। वहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्मेंद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए।

मंत्री भी हुए शिकार
मानसून सत्र के अंतिम दिन विस में ड्रग ट्रायल का मामला गूंजा। डेढ़ घंटे की चर्चा में इसे लेकर कई सवाल उठे। पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने बताया,1957 में उनपर ड्रग ट्रायल हुआ। इससे उन्हें चेचक निकल आई। उन्होंने कहा, मैं प्रभावित हूं। तब नियम नहीं था और न बीमे की व्यवस्था।   

ये विधायक चर्चा में शामिल:
अजय सिंह, प्रताप ग्रेवाल, एनपी प्रजापति, प्रद्युम्न सिंह तोमर (कांगे्रस), पारस सकलेचा (निर्दलीय), यशपाल सिंह सिसोदिया और सुदर्शन गुप्ता (भाजपा)


एथिक्स कमेटी रखती है निगरानी :  हार्डिया
हार्डिया ने विधानसभा को बताया भारत के ड्रग एवं कॉस्मेटिक एक्ट-1940 और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के दिशानिर्देशों के अनुसार ड्रग टायल संचालित किए जाते हैं। प्रत्येक संस्था में इसकी अनुमति देने व उस पर निगरानी के लिए एक एथिक्स कमेटी गठित की जाती है। इसके संचालन के लिए प्रायोजित औषधि कंपनी, अन्वेषणकर्ता चिकित्सक एवं कुछ मामलों में संस्था के प्रमुख के माध्यम से अनुबंध होता है। इसकी जानकारी एथिक्स कमेटी के सदस्यों को दी जाती है।


विधानसभा में सरकार को विरोध का डोज

ड्रग ट्रायल विषय पर शुक्रवार को विधानसभा में रखे गए ध्यानाकर्षïण प्रस्ताव में विधायकों ने सरकार को जमकर ïघेरा। विधायकों ने कई सवालों के जरिए पूरे मामले में  स्पष्टीकरण मांगा। इस पर स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने जवाब दिए।

पारस सकलेचा: एथिक्स कमेटी ने कब-कब उन मरीजों का निरीक्षण किया है, जिन पर ड्रग ट्रायल हुआ? इनकी वर्तमान स्थिति क्या है, ट्रायल के बाद क्या हुई और घातक रोग होने के बाद उन्हें कितनी बीमा राशि दी गई?
हार्डिया: इंदौर में एथिक्स कमेटी गठित है, जिसके चेयर पर्सन प्रोफेसर केडी भार्गव हैं। आज तक किसी भी मरीज ने उनसे जाकर शिकायत नहीं की। यदि सकलेचा के पास कोई शिकायत है तो बता दें हम उसकी जांच करा लेंगे।

प्रद्युम्नसिंह तोमर: जितने मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया गया, क्या उनकी सहमति ली गई। कितने डॉक्टर इसके चलते विदेश गए?
हार्डिया: चार डॉक्टरों को विदेश जाने की अनुमति दी गई।

यशपालसिंह सिसोदिया: क्या आगामी सत्र में विधेयक लाकर कानूनी रूप देकर ड्रग ट्रायल माफियाओं पर शिकंजा कसा जाएगा?
हार्डिया: मैं चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित करने की घोषणा करता हूं।

अजय सिंह- ड्रग ट्रायल के लिए अनुमति कहां से मिली और कितने मरीजों पर ट्रायल किया गया? क्या उनका क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया में रजिस्ट्रेशन हुआ है? कितने मरीजों का बीमा कराया गया था इसमें से कितने को राशि मिली?
हार्डिया- जो कंपनियां ट्रायल कर रही हैं, उन्होंने अनुमति ली है। जहां तक शिकायतों का सवाल है तो सरकार के पास कोई शिकायत नहीं है। कोई मामला विधायक के पास हो तो जरूर बता दें।

अजय सिंह- आंध्रप्रदेश में ड्रग ट्रायल प्रतिबंधित है। सरकार को चाहिए कि मध्यप्रदेश में भी इसे प्रतिबंधित करे। मरीजों से अंग्रेजी के कागज पर अनुमति के दस्तखत करा लिए जाते हैं।
हार्डिया- अनुज्ञा पत्र हिंदी में है।

प्रताप ग्रेवाल- मैंने सूचना के अधिकार में सहमति पत्र लिए हैं। इसमें ड्रग ट्रायल संबंधी कोई जानकारी नहीं है। वास्तविकता यह है कि फार्म अंग्रेजी में है और करीब पांच से छह पेज का है। यह फार्म किसी पढ़े लिखे को भी समझ नहीं आ सकता।
हार्डिया- विधायक मुझे ये फार्म दें। मैं इसे दिखवा लूंगा। इसमें कोई अनियमितता हुई होगी तो उस पर सख्त कार्रवाई होगी।

ग्रेवाल- एथिक्स कमेटी के सदस्यों के नाम और उनके फोन नंबर अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में एक बोर्ड पर लिखे होने चाहिए, ताकि जिन मरीजों पर ड्रग ट्रायल हो रहा है, वे इन्हें अपनी समस्या बता सकें।
हार्डिया- ये सब सेंट्रल एक्ट से संचालित होता है। मैंने यह भी पता किया था कि क्या अन्य राज्यों में इस तरह का कोई कानून है। पता चला कि किसी भी राज्य में ड्रग ट्रायल संचालित करने का कोई कानून नहीं है।

News in PATRIKA on 31th July 2010

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

हमें मरीज की जानकारी नहीं रहती

Justice PD Mulaye
  

ड्रग ट्रायल मामले में एथिकल कमेटी सदस्य जस्टिस मूले की साफगोई
स्वास्थ्य राज्य मंत्री हार्डिया ने गड़बड़ी की जिम्मेदारी कमेटी पर डाली


बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों का एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले रोगियों पर धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के मामले में रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये की साफगोई से पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लग गया है। ट्रायल को मंजूरी देने वाली कॉलेज की एथिकल कमेटी के सदस्य मूल्ये ने कहा है कि हमें मरीजों की कोई जानकारी नहीं रहती है। रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज देखकर कमेटी केवल अनुमति देती है। इसके बाद डॉक्टर मरीजों के साथ क्या करते हैं, इसके लिए न तो कमेटी जिम्मेदार है और न ही वह इसकी निगरानी करती है।

बुधवार दोपहर भोपाल में स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा कि इंदौर के मेडिकल कॉलेज की कमेटी में जस्टिस मूल्ये जैसे लोग शामिल हैं, इसलिए वहां हो रहे ट्रायल पर शंका नहीं की जा सकती है। इस बयान पर 'पत्रिकाÓ ने जस्टिस मूल्ये से विस्तार से चर्चा की।


ट्रेन का टिकट देते हैं, यात्रा की जानकारी नहीं

प्र- एथिकल कमेटी में आप क्या देखते हैं?
उ- हम संबंधित विभाग और कंपनी की अनुमति देखते हैं। इससे अधिक कुछ नहीं।
प्र- जिन शर्तों पर अनुमति देते हैं, उनका पालन कौन करवाता है?
उ- यह हमारा काम नहीं है। हम प्राथमिक अनुमति देते हैं। ट्रायल बाद में शुरू होता है। न तो हम अस्पताल जाते हैं और न ही उस क्लिनिक में जहां ट्रायल का काम चलता है।
प्र- आपको कितने रुपए मिलते हैं?
उ- एक बैठक के 1000 रुपए मिलते हैं। अब तक 12-13 बैठकों में गया हूं।
प्र- आपको नहीं लगता कि ट्रायल में पारदर्शिता बढ़ाई जाना चाहिए?
उ- उसका मुझे कुछ मालूम नहीं। यह काम कॉलेज का है। हम तो केवल कागज देखते हैं।
प्र- मरीजों के साथ क्या हो रहा है, इस पर आपकी कितनी नजर रहती है?
उ- हमारी कमेटी ट्रेन का टिकट देती है। इसके बाद यात्रा शुरू होती है। टिकट देने वाले को बाकी यात्रा की जानकारी नहीं रहती।
प्र- मंत्री हार्डिया कह रहे हैं, आप हैं तो ट्रायल में शंका नहीं की जा सकती?
उ- हम अनुमति देने तक सीमित हैं, इसके बाद क्या होता है, जानकारी नहीं रहती है।
(रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये से चर्चा)



कॉलेज के भीतर से उठे विरोध के स्वर

ड्रग ट्रायल के खुलासे के बाद कुछ डॉक्टरों ने पूरे मामले को ठंडा करने की कोशिश शुरू की, लेकिन इसका विपरीत प्रभाव हुआ। कॉलेज के भीतर से ही कुछ डॉक्टरों ने विरोध शुरू कर दिया है। ट्रायल के घेरे में आए डॉक्टर चाहते हैं कि पूरा कॉलेज उनका साथ दे, परंतु दूसरे सभी लोगों का कहना है जिसने गलती की है वह स्वयं अपनी लड़ाई लड़े।

'ड्रग ट्रायल मसले से पूरे कॉलेज की बदनामी हो रही है। हम चाहते हैं कि इस पूरे मामले को पूरे चिकित्सा जगत से जोड़कर नहीं देखा जाए। जिसने गलती की है, उसे सजा अवश्य मिलना चाहिए। साथ ही इस विषय से जुड़ी सभी भ्रांतियां भी दूर की जाना चाहिए।Ó
- विक्रांत भूरिया, अध्यक्ष, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन

'भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा ड्रग ट्रायल के लिए तय किए गए मापदंडों का एमजीएम मेडिकल कॉलेज में पालन नहीं हुआ है। बहुराष्टï्रीय कंपनियां भारत के लोगों को निशाना बना रही है और ताज्जुब की बात तो यह है कि केंद्र व राज्य सरकार ने इसके लिए कोई निगरानी तंत्र तक नहीं बनाया। मरीजों के हित में ट्रायल बंद किया जाना चाहिए।Ó
- डॉ. आनंद राय, अध्यक्ष, मप्र रेसीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन

'चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के लिए ड्रग ट्रायल अनिवार्य है, लेकिन देश में इसके संबंध में बने कानून पर पुनर्विचार करना चाहिए। कानून में कई कमियां है, इसी कारण ट्रायल का दुरुपयोग हो रहा है। अंग प्रत्यारोपण जैसा सख्त कानून लागू किया जाना चाहिए ताकि ट्रायल पर पूरा नियंत्रण रहे।Ó
- डॉ. सुमित शुक्ला, उपाध्यक्ष, मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन

'जिन डॉक्टरों पर मरीजों के दुरुपयोग का आरोप लगा है, उन्हें कॉलेज से दूर करके पूरे मामले की जांच की जाना चाहिए। डॉक्टरों पर आरोप सिद्ध न हो तो उन्हें फिर से कॉलेज बुलाया जा सकता है। फिलहाल वे रहे तो जांच प्रभावित हो सकती है क्योंकि वैसे ही ट्रायल मामले में पारदर्शिता की बेहद कमी है।Ó
- शिवाकांत वाजपेयी, अध्यक्ष, मप्र रेडियोग्राफर्स एसोसिएशन



विधानसभा में आज उठेगा मुद्दा
शुक्रवार को विधानसभा में 'पत्रिकाÓ द्वारा उठाए गए ड्रग ट्रायल के मुद्दे पर बहस होगी। रतलाम के विधायक पारस सकलेचा, सरदारपुर के प्रताप ग्रेवाल, इंदौर के सुदर्शन गुप्ता, मंदसौर के यशपालसिंह सिसौदिया समेत करीब सात विधायकों ने इस मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव दर्ज करवाया है।

News in PATRIKA on 30th July 2010

गुरुवार, जुलाई 29, 2010

ड्रग ट्रायल में जा चुकी एक जान



 जबलपुर में कैंसर मरीज की हुई थी मौत
 भोपाल, ग्वालियर में भी अनियमितताएं


बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण (ड्रग ट्रायल) करने के दौरान प्रदेश में एक महिला मरीज की जान जा चुकी है। जबलपुर के कैंसर अस्पताल में इस मरीज का उपचार चल रहा था। उधर, इंदौर के बाद भोपाल और ग्वालियर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल की अनियमितताएं सामने आई हैं।

जबलपुर में अगस्त 2008 में कैंसर रोगियों पर ड्रग ट्रायल शुरू  हुआ था। रेडियोथेरेपी की प्रोफेसर डॉ. पुष्पा किरार और डॉ. अमित जोतवानी ने पेट के कैंसर (कार्टिनोमा स्टमक) के चार रोगियों पर दवा का प्रयोग शुरू किया था। चूंकि यह ट्रायल प्लेसिबो (इलाज के बीच में दवा बंद करके दूसरे मरीजों से तुलना करना) था, इसलिए एक महिला रोगी पर सारी दवाइयां बंद कर दी गईं। इसी दौरान उसकी मौत हुई।

प्लेसिबो ट्रायल अनैतिक
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के मुताबिक मरीज को उपचार के बीच में ऐसी दवा देना जिसमें दवा के बजाए ग्लूकोज या स्टार्च हो (प्लेसिबो) अनैतिक कार्य है। इस संबंध में चिकित्सा जगत की विश्व प्रसिद्ध हेलेंस्की घोषणा को भी केंद्र सरकार ने मानने से इंकार किया है।


'वह बहुत गंभीर थीÓ

 क्या आपने कोई ट्रायल किया है?
 हां, 2008 में शुरू किया था, लेकिन चार मरीजों के बाद ही बंद कर दिया।

बंद क्यों कर दिया?
ïकॉलेज की मान्यता और हमारी डिग्री के कारण कंपनी ने इंकार कर दिया था।

सूचना के अधिकार में आपने जानकारी दी है कि चार में से एक की मौत हो गई?
ïहां, मौत हुई थी। वह महिला बहुत गंभीर अवस्था में थी। चूंकि ट्रायल प्लेसिबो था, इसलिए कुछ मरीजों को दवा नहीं दी जाती है। उसे भी नहीं दी थी।

मौत के कारण ही ट्रायल बंद तो नहीं हुआ?
हमारे यहां इंदौर जैसा मामला नहीं है। मैं खुद भी ट्रायल करना नहीं चाहती थी, इसलिए बंद कर दिया।
(डॉ. पुष्पा किरार से सीधी बात)


भोपाल का हाल
ईसी अहमदाबाद में, ट्रायल भोपाल में

गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के सर्जरी एचओडी डॉ. एमसी सोनगरा और डॉ. नितिन वर्मा ने 2008 में मूत्र रोग से पीडि़त 40 लोगों पर कैडिला कंपनी की दवा का प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने अहमदाबाद की एक निजी एथिकल कमेटी (ईसी) से मंजूरी ली। आईसीएमआर की गाइडलाइन के मुताबिक यदि सरकारी कॉलेज में एथिकल कमेटी मौजूद हो, तो बाहर की किसी कमेटी से अनुमति नहीं ली जा सकती है।


ग्वालियर में बड़ा कारोबार
3500 लोगों पर थोपा ट्रायल, कमेटी भी अधूरी 

वर्ष 2005 में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में किए गए संशोधन के मुताबिक ट्रायल को मंजूरी देने वाली एथिकल कमेटी में एक आम आदमी समेत पांच बाहरी व्यक्ति होना आवश्यक है। ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी में दो लोग बाहर हैं और इनमें भी आम आदमी नहीं है। यहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्मेंद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए। इसमें करीब 3500 रोगियों को चुना गया।



ईओडब्ल्यू में बयान शुरू
 ड्रग ट्रायल मामले में तीन सप्ताह में पूरी होगी प्रारंभिक जांच

मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण करने (ड्रग ट्रायल) के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने भोपाल में बुधवार से बयान लेना शुरू कर दिया है। ब्यूरो ने सबसे पहले शिकायतकर्ता से वे दस्तावेज हासिल किए हैं, जिनके आधार पर शिकायत की गई। 

स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम संगठन ने ईओडब्ल्यू में शिकायत की है कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर के सात डॉक्टरों ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों से सांठगांठ करके ड्रग ट्रायल शुरू किया। इसके एवज में उन्हें अकूत संपत्ति हासिल की। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया जांच का दायित्व असिस्टेंट आईजी प्रियंका शर्मा को सौंपा है। उन्होंने शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे के बयान दर्ज कर लिए हैं। करीब तीन सप्ताह में जांच का कार्य समाप्त कर लिया जाएगा। जिन डॉक्टरों पर आरोप हैं, उनसे भी पूछताछ की जाएगी।

ईओडब्ल्यू आईजी के मुताबिक एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल के खिलाफ शिकायत मिली है।


दोषियों पर होगी कार्रवाई : मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भोपाल में मीडियाकर्मियों से चर्चा में कहा ड्रग ट्रायल मामले में ईओडब्ल्यू में शिकायत हुई है और वहां जांच भी शुरू हो गई है। जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। 


देर रात तक उलझा रहा एमजीएम

एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में हुए ड्रग ट्रायल मामले में संभवत: गुरुवार को विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाया जाएगा। इसकी तैयारी में रात करीब 9.30 बजे तक कॉलेज में कार्य जारी थी। कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के साथ ही कुछ प्रोफेसर और प्रशासनिक अधिकारी जुटे थे, ताकि भोपाल मुख्यालय से पूछे गए हर सवाल का 'माकूलÓ जवाब दे सकें। उधर, भोपाल में संचालक चिकित्सा शिक्षा और प्रमुख सचिव में भी देर रात तक इस मसले पर कार्य चलने की जानकारी मिली है।

News i n PATRIKA on 29th July 2010

बुधवार, जुलाई 28, 2010

एमसीआई को थी ट्रायल घपले की भनक


- देशभर के मेडिकल कॉलेजों को भेजे थे नोटिस
- सात माह बाद भी किसी अफसर ने नहीं दिया ध्यान

 
अस्पताल में आने वाले रोगियों पर दवा आजमाईश के घपले की मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को भनक लग चुकी थी। इसी कारण सात माह पहले देश के सभी मेडिकल कॉलेजों को एक पत्र लिखा गया था। पत्र में कहा था कि ट्रायल के जरिए आने वाली राशि को जनता के सामने रखा जाए और ऐसे ही ट्रायल किए जाएं जिनके परिणाम देश के लिए हितकर हों। अफसोस जनक यह है कि चिकित्सा शिक्षा की इस सर्वोच्च संस्था को एमजीएम मेडिकल कॉलेज इंदौर जैसे संस्थानों ने कोई तवज्जो नहीं दी। ï

एमसीआई सचिव रिटायर्ड कर्नल डॉ. एआरएन सेतलवाड़ ने 10 दिसंबर 2009 को सभी मेडिकल कॉलेजों को लिखा था कि ट्रायल से आर्थिक लाभ उठाने के लिए डॉक्टर मरीजों को निशाना बना रहे हैं, इसलिए इंडियन मेडिकल काउंसिल नियम 2000 में संशोधन आवश्यक हो गया है। इस संशोधन के बताए अनुसार ही अब कॉलेजों के डॉक्टरों को बरताव करना अनिवार्य है।

'मेरे पास इस तरह के निर्देश आए थे और इसकी जानकारी सभी विभागाध्यक्षों को दे दी गई थी। अब उन्होंने इसका पालन नहीं किया तो कार्रवाई की जाएगी।Ó
- डॉ. एमके सारस्वत, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर

छह बिंदु जिनका उल्लंघन हुआ

एक-
कोई भी डॉक्टर किसी दवा कंपनी से कोई उपहार नहीं लेगा।
दो-
कोई भी डॉक्टर या उसके परिवार का सदस्य किसी दवा कंपनी के खर्चे से यात्रा नहीं करेगा।
तीन-
ट्रायल की स्थिति में कोई भी डॉक्टर पारदर्शी तरीके से ही कंपनी से रुपए लेगा।
चार-
ट्रायल शुरू करने के पहले ही जनता को विज्ञापन जैसे माध्यम से राशि की जानकारी देना होगी।
पांच-
जो मरीज स्वेच्छा से ट्रायल में शामिल हों, उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा का इंतजाम करना होगा।
छह-
दवा कंपनी से किए गए समझौते में ट्रायल के परिणाम को प्रकाशित करने का अधिकार लेना।


डीजीपी को भी भेजी शिकायत
लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के बाद ड्रग ट्रायल करने वाले मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस महानिदेशक के पास भी शिकायत हुई है। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, एथिकल कमेटी अध्यक्ष डॉ. केडी भार्गव के साथ ही करीब चालीस डॉक्टरों और कमेटी सदस्यों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और गैर इरादतन हत्या जैसे आरोप दर्ज करने की मांग की है।

भोपाल ईओडब्ल्यू करेगा जांच
स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति संगठन द्वारा की गई शिकायत पर भोपाल पदस्थ असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल प्रियंका मिश्रा को जांच का जिम्मा सौंपा गया है। उन्होंने इसकी पड़ताल भी शुरू कर दी है। पहले माना जा रहा था कि जांच ईओडब्ल्यू के इंदौर दफ्तर से शुरू होगी। शिकायत में डॉ. हेमंत जैन, डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. सलिल भार्गव, डॉ. पुष्पा वर्मा और डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया गया है।





आजाद ने मांगे इंदौर ड्रग ट्रायल के तथ्य
- 'पत्रिकाÓ की खबरों पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने लिया संज्ञान
- भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से भी की चर्चा





केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्री गुलाम नबी आजाद ने इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में मरीजों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ïïविकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण किए जाने को लेकर 'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों को गंभीरता से लिया है। इस संबंध में उन्होंने मंत्रालय से सभी जरूरी तथ्य मांगे हैं। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है।

अधिकारी ने बतायाï इंदौर के एमवाय अस्पताल, चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय और चेस्ट सेंटर में पिछले कुछ साल से मरीजों पर दवाओं का धोखे से परीक्षण किए जाने की जानकारी मिली है, जिसे आजाद ने गंभीरता से लिया है। आजाद ने इस संबंध में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. वीएम कटोच से भी चर्चा की। आईसीएमआर मापदंडों के आधार पर ही दवाइयों के क्लिनिकल परीक्षण होते हैं।  


News in PATRIKA on 28th July 2010

रविवार, जुलाई 25, 2010

ईओडब्ल्यू में जांच शुरू

 आईजी ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना



विदेशी दवा कंपनियों से मिलने वाले रुपए के लिए शुरू हुए ड्रग ट्रायल के गोरखधंधे में शामिल डॉक्टरों की आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने जांच शुरू कर दी है। ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना है। फिलहाल जांच में सात डॉक्टरों के नाम हैं, जो आगे 50 से अधिक तक पहुंच सकते हैं।

'पत्रिकाÓ में प्रकाशित खबरों के आधार पर स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति द्वारा ईओडब्ल्यू में शिकायत की गई थी। ईओडब्ल्यू आईजी अजय शर्मा ने बताया शिकायत को जांच में ले लिया गया है। प्रथम दृष्टया यह बेहद गंभीर मामला दिखता है। आरोपों सच साबित होने पर केस दर्ज किया जाएगा। संभवत: जांच इंदौर ऑफिस भेजी जाएगी।

शिकायतकर्ता डॉ. आनंद राजे ने बताया एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, पूर्व प्रोफेसर डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्र रोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन और एमवायएच सहायक अधीक्षक डॉ. वीएस पाल को आरोपी बनाया है। 


ये हैं आरोप
एक - सरकारी पद का दुरुपयोग करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित की।
दो-  सरकार की जानकारी के बगैर मरीजों की जान आफत में डाली।
तीन- ट्रायल से एमबीबीएस और एमडी/एमएस के छात्रों की पढ़ाई बाधित।
चार- बगैर जानकारी के अवैधानिक तरीके से विदेश यात्राएं की।
पांच - सरकारी खजाने में रुपए न डालकर खुद ने विभिन्न बैंकों में खाते खुलवाए।


लोकायुक्त में एक ओर शिकायत की तैयारी
शुक्रवार को लोकायुक्त में भेजी गई शिकायत के बाद अब दूसरी शिकायत की तैयारी है। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति ने बताया डॉक्टरों के नाम से आईसीआईसीआई, एडीएफसी, आईडीबीआई, एचएसबीसी, सिटी बैंक के साथ ही कुछ सहकारी बैंकों में भी खाते हैं। इनकी जांच करने से पूरे लेन-देन की जानकारी मिल सकती है। ये डॉक्टर वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के जरिए रुपए भारत मंगवाते हैं। पहली शिकायत में करीब तीन दर्जन डॉक्टरों और अन्य को आरोपी बताया है


सीटीए की भी हो जांच
उधर, विधानसभा में मामला उठाने वाले विधायकों का कहना है 'पत्रिकाÓ के खुलासे के बाद अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन को वे समझौते भी जगजाहिर करना चाहिए जिनका नाम क्लिनिकल ट्रायल्स एग्रीमेंट (सीटीए) होता है। इससे ही रुपए की असली जानकारी सामने आएगी।


पैसे के लिए बेच रहे देश : हजारे
प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने इंदौर प्रवास के दौरान 'पत्रिकाÓ से चर्चा में कहा विदेशी कंपनियों के लिए जो लोग ड्रग ट्रायल कर रहे हैं, वे पैसे के लिए देश को बेच रहे हैं। उनसे देश को बचाना चाहिए। वे कंपनियों के मुनाफे के लिए ही इस काम में लगे हैं। शोध जैसी कोई बात इसमें नहीं है।

News in Patrika on 26th July 2010

लोकायुक्त भी पहुंची शिकायत

मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के साथ ही एथिकल कमेटी व सीटीआरआई को भी बनाया आरोपी
ईओडब्ल्यू भोपाल ने भी शुरू कर दी जांच

रोगी को चूहे की तरह प्रयोगशाला मानकर शुरू हुए दवा आजमाईश के खेल 'ड्रग ट्रायलÓ में अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज फंसते दिख रहे हैं। आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) के बाद लोकायुक्त में भी शिकायत पहुंच चुकी है। इसमें एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े दो दर्जन से अधिक डॉक्टरों के साथ ही उस एथिकल कमेटी के सदस्यों को भी आरोपी बनाया गया है, जिन्होंने ट्रायल को हरी झंडी दी।

शपथपत्र पर की गई लोकायुक्त शिकायत में कहा गया है कि मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव ने एथिकल कमेटी के सदस्यों से साथ सांठगांठ करके मरीजों की जान खतरे में डाली है। इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार के नियमों का ध्यान नहीं रखा गया। विदेशी दवा कंपनियों से आर्थिक लाभ पाने के लिए गंभीर अनियमितताएं की गई। शिकायतकर्ता राजेंद्र के. गुप्ता ने लोकायुक्त को यह भी बताया है कि ड्रग ट्रायल के संबंध में सूचना के अधिकार में कई जानकारियां मांगी गई, लेकिन हमेशा से ही इंकार किया जाता रहा। दस्तावेजों के लिए फिलहाल मामला मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष लंबित है। उधर, सूत्रों का कहना है ईओडब्ल्यू भोपाल में स्वास्थ्य सेवा समर्पण संगठन प्रमुख डॉ. आनंद राजे द्वारा की गई शिकायत पर जांच शुरू कर दी है।

इन पर लगे आरोप
मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत, ड्रग कंट्रोलर मप्र राकेश श्रीवास्तव, क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री इंडिया की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. आभा अग्रवाल, एथिकल कमेटी चेयरमैन डॉ. केडी भार्गव, कमेटी सदस्य कुट्टी मेनन, डॉ. जयंतीलाल भंडारी, रिटायर्ड जस्टिस पीडी मूल्ये, एडवोकेट योगेश मित्तल, एमवायएच अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव, उपअधीक्षक डॉ. वीएस पाल, चाचा नेहरू अस्पताल अधीक्षक डॉ. शरद थोरा, चेस्ट सेंटर अधीक्षक डॉ. एम. हरगुनानी, शिशु रोग प्रोफेसर डॉ. हेमंत जैन, मेडिसिन एचओडी डॉ. जीबी रामटेके, प्रोफेसर डॉ. अपूर्व पुराणिक, प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संजय अवासिया, मेडिसिन कंसलटेंट डॉ. अतुल शेंडे, डॉ. सोनल पगारे, पूर्व एचओडी मेडिसिन डॉ. अशोक वाजपेयी, नेत्ररोग एचओडी डॉ. पुष्पा वर्मा, मनोरोग एचओडी डॉ. रामगुलाम राजदान, मनोरोग कंसल्टेंट डॉ. मनीष पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई के साथ ही जूनियर डॉक्टर सचिन सेठी, गौरव मोहन, प्रोमिता चौधरी, दीलिप सिंह, मयंक जैन, आशीष जैन, प्रज्ञा जैन, मीना ढोल, अब्दुल मंसूर एवं वरूण कटारिया।


News in Patrika on 25th July 2010