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शुक्रवार, सितंबर 03, 2010

व्हिसल ब्लोअर के पक्ष में उतरे मेडिकल छात्र

जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल उकसाने के आरोप में बर्खास्त किए गए एमजीएम मेडिकल कॉलेज के सीनियर रेसीडेंट डॉ. आनंद राय के पक्ष में 73 मेडिकल छात्र सामने आ गए हैं। ये सभी 2005 से 2007 की एमबीबीएस बेच के छात्र हैं। छात्रों ने डॉ. राय की बर्खास्तगी का कारण उनका व्हिसल ब्लोअर (भ्रष्टाचार सचेतक) होना बताया है।

छात्रों ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज डीन को एक पत्र लिखा है। इसके मुताबिक डॉ. राय पर की गई कार्रवाई पूर्वाग्रह से ग्रसित है। उन्होंने व्यवस्था में रहकर कुछ डॉक्टरों द्वारा ड्रग ट्रायल के जरिए मरीजों के साथ हो रहे धोखे का खुलासा किया है, इसीलिए बाहर किया गया। छात्रों ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि कॉलेज काउंसिल की जिस बैठक में डॉ. राय को बाहर करने का निर्णय लिया है, उसमें 38 में से 16 सदस्य ही इसमें शामिल थे, जो कि कोरम का अभाव है। छात्रों ने डॉ. राय का निलंबन समाप्त करने की मांग की है।

हाईकोर्ट ने कॉलेज को दी पोस्ट भरने की छूट
डॉ. आनंद राय द्वारा दायर याचिका पर बुधवार को इंदौर हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेज को छूट दे दी कि वह नेत्र रोग विभाग में सीनियर रेसीडेंट के रिक्त पद को भर ले। पिछली सुनवाई में जस्टिस एससी शर्मा ने पद भरने पर रोक लगाई थी। शासकीय अधिवक्ता विवेक पटवा ने बताया कोर्ट ने पद भरने का आदेश देते हुए केस में अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद रखी है। उधर, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन 30 अगस्त को ही पद पर भर्ती के लिए साक्षात्कार ले चुका है। संभावना है कि शुक्रवार को पद भर लिया जाएगा। 

पत्रिका : ०२ सितम्बर २०१० 

ड्रग ट्रायल में सुस्ती का संक्रमण

- चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में कमेटी ही बना सका


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) के मामले में चिकित्सा शिक्षा विभाग ने एक महीने में महज एक कमेटी का गठन ही किया है। न तो इस कमेटी की बैठक हुई है और न ही अब तक किसी दूसरे राज्य के कानूनों का अध्ययन ही किया गया।
चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने 30 जुलाई को विधानसभा में तीन सदस्यों की कमेटी बनाकर राज्य में ड्रटग ट्रायल पर कानूनी बंदिश लगाने की घोषणा की थी। विभाग के प्रमुख सचिव और कमेटी चेयरमैन आईएस दाणी ने बुधवार को बताया कि कमेटी तीन के बजाए पांच सदस्यों की बनाई गई है। इसमें विधि विभाग के प्रमुख सचिव पीसी मीणा के साथ ही संचालक चिकित्सा शिक्षा डॉ. वीके सैनी, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. भरत छपरवाल और भोपाल के डॉ. एनआर भंडारी सदस्य हैं।


बंदिश नहीं होने से मरीजों की जान सांसत में
अभी तक राज्य में ड्रग ट्रायल की निगरानी की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है। यही वजह है कि पिछले पांच वर्षों में बहुराष्टï्रीय कंपनियों ने राज्य के प्रतिष्ठित डॉक्टरों के जरिए मरीजों पर धड़ल्ले से दवाओं के ट्रायल किए। सरकारी के साथ ही निजी क्षेत्रों में अंधाधुंध ट्रायल हो रहे हैं। पांच वर्ष में मप्र के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हुए ट्रायल से ही 51 रोगियों पर दुष्प्रभाव हुआ। इनमें से कुछ की मौत की भी आशंका है। विधायक पारस सकलेचा और प्रताप ग्रेवाल ने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. आनंद राजे की शिकायत पर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) डॉ. अपूर्व पुराणिक, डॉ. अनिल भराणी, डॉ. पुष्पा वर्मा, डॉ. हेमंत जैन, डॉ. सलिल भार्गव और डॉ. अशोक वाजपेयी की जांच कर रहा है।

पत्रिका: 02 सितंबर 2010


ड्रग ट्रायल का एक ओर कागज ईओडब्ल्यू पहुंचा
मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल द्वारा एक ड्रग ट्रायल के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी पहुंचाने का दस्तावेज भी ईओडब्ल्यू पहुंच गया है। वहां इसे जांच में भी लिया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक ईओडब्ल्यू इसे गंभीर आर्थिक अपराध मान रहा है, क्योंकि कॉलेज को कंपनी बताने की जानकारी कॉलेज प्रबंधन को नहीं है। 'पत्रिकाÓ ने ही इसका खुलासा किया है।

पत्रिका: 0३ सितंबर 2010

मंगलवार, अगस्त 31, 2010

ड्रग ट्रायल के लिए मेडिकल कॉलेज को बता दिया स्पांसर कंपनी

एमवाय अस्पताल में हायरपरटेंशन के रोगियों पर हो रहा प्रयोग


बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) के लिए एमवाय अस्पताल के दो डॉक्टरों ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज को स्पांसर कंपनी बना दिया। ये डॉक्टर किसी दवा कंपनी के लिए अस्पताल में आने वाले हायपर टेंशन के रोगियों पर टेडलाफिल नामक दवा का प्रयोग कर रहे हैं। कान खड़े करने वाला तथ्य यह है कि कॉलेज को पता ही नहीं है कि उसे स्पांसर बना दिया गया है।

मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिल भराणी और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष पटेल ने 1 जुलाई 2010 को केंद्र सरकार के क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री इंडिया (सीटीआरआई) में प्लोमोनरी हायपर टेंशन के 60 मरीजों पर प्रयोग के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया। डॉ. भराणी प्रमुख जबकि डॉ. पटेल सहयोगी इन्वेस्टिगेटर हैं। दोनों डॉक्टर रोगियों को टेडलाफिल नाम की दवा देकर उसका असर जांच रहे हैं।

किसके पास रहेंगे वित्तीय अधिकार?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक स्पांसर व्यक्ति या संस्था ट्रायल पर होने वाले समस्त खर्च के लिए जवाबदेह होती है। ट्रायल के बाद दवा को बाजार में उतारने के पहले उसके वित्तीय अधिकार स्पांसर कंपनी ही बेचती है। दवा उत्पाद से जुड़े जानकारों के मुताबिक आम तौर पर किसी दवा के अधिकार करोड़ों में बेचे जाते हैं। अहम सवाल यही है कि इस ट्रायल के नतीजों के वित्तीय अधिकार किसके पास रहेंगें और उन्हें कौन बेचेगा?

आर्थिक अपराध की श्रेणी में शामिल
किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने संस्थान को कंपनी की तौर पर पेश करके कहीं से रुपए कमाना आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है। सरकार यदि मामले की तह तक जाए, तो यह बड़ी आर्थिक गड़बड़ी साबित होगा।


सूचना का अधिकार में भी नहीं दे रहे जानकारी
इस संबंध में संबंधित डॉक्टरों ने चर्चा करना चाही तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया। डॉ. पटेल चाहते थे कि इस संबंध में कोई भी जानकारी लिखित में ही दी जा सकती है। 'पत्रिकाÓ ने सूचना का अधिकार का इस्तेमाल किया गया, तो मेडिसिन विभाग ने लिखित में दिया कि गोपनीयता की शर्त के कारण यह जानकारी नहीं दी जा सकती है।


मर्ज और दवा दोनों ही खतरनाक

मर्ज: रूक जाती है फेफड़े की रक्तवाहिनी
दिल से खून को पूरे शरीर में ले जाने वाली रक्त नलिकाएं पल्मोनरी वैसल्स (धमनियां) कहलाती हैं। फेफड़ों में मौजूद धमनियों में जब रूकावट आती है तो ब्लड प्रेशर बढ़ता है और दिल के दाएं हिस्से में तेज दर्द उठता है। कभी कभी इसे दिल की धड़कन हमेशा के लिए रूक जाती है। इसे ही प्लमोनरी हायरपर टेंशन (पीएचटी) कहते हैं।

दवा: नपुंसक बना सकती है टेडलाफिल 
- पुरुष जननांग छह घंटे तक उत्तेजित अवस्था में आ सकता है। इससे ताजिंदगी नपुंसक होने का खतरा भी रहता है।
- 0.1 प्रतिशत मरीजों में रंग पहचानने की शक्ति समाप्त हो जाती है। वे नीले-हरे रंग में अंतर नहीं कर पाते। 
- चेहरे पर सूजन, शरीर में झुनझुनी, थकान और दर्द हो सकता है।
- ब्लड प्रेशर में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव, अचानक हार्ट अटैक, बेहोशी, सांस की गति बढऩा भी संभव है।
- पांच प्रतिशत रोगियों में अत्यधिक पीठ या कमर का दर्द होता है। 


मैं कुछ नहीं बता सकता
क्या आप टेडलाफिल के ड्रग ट्रायल की जानकारी देंगे?
मौखिक कुछ नहीं दूंगा, लिखित में मांगे।
परंतु सीटीआरआई ने तो आपको जनता के सवालों का जवाब देने के लिए जिम्मेदार बताया है?
वह सही है, लेकिन मैं आपको मौखिक कुछ नहीं बता सकता।
मुझे सिर्फ इतना बता दें कि क्या ट्रायल के लिए कॉलेज को स्पांसर बनाया गया है?
कहना, मैं आपको कुछ नहीं बता सकता।
(डॉ. आशीष पटेल से  चर्चा)

'किसी को तो बताना ही था स्पांसरÓ 
टेडलाफिल दवा के ट्रायल में मेडिकल कॉलेज को स्पांसर क्यों बनाया गया?
सीटीआरआई में किसी को स्पांसर बताना जरूरी था, इसलिए ऐसा कर दिया।
इसमें वित्तीय मदद कहां से मिल रही है?
उसकी जरूरत ही नहीं है। दूसरे ट्रायल चल रहे हैं, तो यह भी साथ में हो रहा है। इससे जूनियर्स को सीखने को मिलेगा।
वित्तीय अधिकार किसे बेचे जाएंगे?
इसकी कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एक कंपनी ने कहा और हम ट्रायल कर रहे हैं, इसमें वित्तीय अधिकार की बात ही कहां आई?
(डॉ. अनिल भराणी से चर्चा)


मुझे इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। मैं इसकी जांच करूंगा और फिर ही कोई कोई टिप्पणी कर सकूंगा।
- डॉ. एमके सारस्वत, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

पत्रिका: ३० अगस्त २०१० 

बुधवार, अगस्त 25, 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला

Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।

सोमवार, अगस्त 23, 2010

व्हिसल ब्लोअर की सफाई ?

चिन्मय मिश्र 
 
ये  किस तरह का समय है, जब पेड़ों के बारे में बात करना लगभग अपराध है।

मध्यप्रदेश में चल रही जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल की आड़ में डॉ. आनंद राय की बर्खास्तगी उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए चेतावनी है, जो प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। डॉ. राय ने इंदौर के महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय व महाराजा यशवन्त राव अस्पताल में बिना अनुमति के बहुराष्ट्रीय दवाई कंपनियों के लिए किए जा रहे ड्रग ट्रायल का पर्दाफाश किया था। उनकी बर्खास्तगी के आदेश को मीडिया के लिए भी एक चेतावनी माना जा सकता है। क्योंकि डॉ. राय द्वारा किए गए रहस्योद्घाटन को अंतत: मीडिया ने ही व्यापक समाज तक पहुंचाया था। इसलिए यह आदेश मीडिया को भी उसकी हैसियत बताने का तरीका है कि वे भले ही समाज हित के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दें, लेकिन प्रशासन वही करेगा जो कि उसके स्वयं के हित में है।

इस आदेश का अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हड़ताल की वजह से जहां अन्य जूनियर डॉक्टर्स को 15 दिनों के लिए निलंबित किया गया है, वहीं डॉ. राय के अनुसार उन्होंने हड़ताल की अवधि में भी ओपीडी और इमरजेंसी विभाग में अपनी सेवाएं दी थी। इसके बावजूद सूत्रों का कहना है कि उन्हें 'बेहतरीÓ के लिए बर्खास्त किया गया है। सवाल उठता है कि यह किसकी बेहतरी के लिए किया गया है? हड़ताल के दौरान भी अपना काम करना क्या 'बेहतरी  की श्रेणी में नहीं आता? दरअसल बात बहुत दूर तक जा रही है। एक ओर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली तो चर्चा में थी ही, वहीं दूसरी ओर मई में प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा चार बहुराष्ट्रीय दवाई कंपनियों  नोवारिटस, बीएमएस, इलिलिली और फाइजर के सर्वोच्च अधिकारियों के साथ बैठक में भारतीय दवाई निर्माताओं का मानना है कि देश में निर्मित 'जेनेरिकÓ दवाइयों के कारण भारत व तीसरी दुनिया के देशों और कुछ हद तक विकसित देशों में भी दवाई की कीमतें काबू में रहती हैं। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात मान ली जाती है, तो आम आदमी को जीवनरक्षक दवाइयों के लिए काफी अधिक मूल्य देना होगा।

इसी दौरान मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर के लिए सरकारी तौर पर चंदा इकठ्ठा  करना भी गंभीर मामला है। कहा जा रहा है कि पिछले वर्ष तत्कालीन कलेक्टर ने 'मनोकामना अभिषेक योजना के माध्यम से 4.5 करोड़ रुपये इकठ्ठा किए थे और इस बार तो जिलेभर में  मनोकामना अभिषेक वर्ष २०१० समारोहित कर पांच करोड़ रुपये इकठ्ठा करने की योजना है। इस हेतु सरकारी अधिकारियों को नोडल ऑफिसर नियुक्त कर दिया गया है और रसीद कट्टे छपवाकर 'टारगेटÓ तय कर वितरित कर दिए गए हैं।

सरसरी तौर पर देखने में उक्त दोनों मामलों में कोई समानता नजर नहीं आएगी, परन्तु गहराई से देखने पर समझ में आता है कि दोनों मामलों में शासन-प्रशासन अपनी तरह से मूल्य व मानक तय कर रहा है। 'व्हिसल ब्लोअरÓ बिल को अभी कैबिनेट से ही सहमति मिली है, अतएव प्रशासन में रहकर भ्रष्टाचार उजागर करने वालों की अभी खैर नहीं है। इस अधिनियम के अभाव में सूचना का अधिकार कानून को लेकर अमित जेठवा जैसे भ्रष्टाचार उजागर करने वालों का हश्र हम देख चुके हैं।

सरकारें भी चाहती हैं कि व्हिसल ब्लोअर अधिनियम पारित होने से पहले जितनी 'सफाईÓ संभव हो कर ली जाए परन्तु यह विध्वंसकारी परिपाटी है जिससे सार्वजनिक क्षेत्र को बचाया जाना चाहिए। दहशत फैलाने की कोशिशों के समक्ष चुप बैठना भी समझदारी नहीं है।


चिन्मय मिश्र  सामाजिक कार्यकर्ता  हैं.
पत्रिका : २३ अगस्त २०१०

शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

ड्रग ट्रायल से 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट

- विधानसभा के दस्तावेज में मंत्री ने मंजूर की सच्चाई

बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर प्रयोग (ड्रग ट्रायल) से राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 51 रोगियों पर साइड इफेक्ट हुए हैं। ये मरीज पिछले पांच वर्ष में कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में इलाज के लिए गए थे।

यह जानकारी विधानसभा से जारी एक दस्तावेज में उपलब्ध है। चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया ने विधानसभा में यह जानकारी दी थी। उन्होंने यह भी बताया था कि पांच वर्ष में 2365 रोगियों पर ट्रायल हुआ। इसमें 1644 बच्चे और 721 वयस्क हैं।

कुछ की मौत की आशंका
आशंका है कि जिन मरीजों पर दुष्प्रभाव हुआ है, उनमें से कुछ की मौत भी हुई होगी। वैसे भी, सूचना का अधिकार में प्राप्त एक दस्तावेज में जबलपुर के कैंसर अस्पताल में एक महिला रोगी की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इंदौर के चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमंत जैन ने भी मंजूर किया है कि ट्रायल के दौरान एक बच्चे की मौत हुई थी और इसकी जानकारी एथिकल कमेटी को दे दी गई थी।

सूची का वादा किया था, पर नहीं दी
रतलाम के विधायक पारस सकलेचा ने बताया 30 जुलाई को ट्रायल के मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बहस के आखिर में चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री ने वादा किया था कि सभी मरीजों की सूची दी जाएगी, किंतु अब तक यह प्राप्त नहीं हुई है। इसके लिए चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव आईएस दाणी से भी चर्चा की है। 

पत्रिका: १९ अगस्त २०१० 

शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

फोन, फैक्स नंबरों और ई-मेल पर नजर

- ड्रग ट्रायल पर ईओडब्ल्यू की घेराबंदी
- एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में अवैध कनेक्शन



बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा विकसित दवा के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) से जुड़े मामले की जांच कर रहे आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) की नजर उन फोन और फैक्स नंबरों और ई-मेल पतों पर भी है, जिनके जरिए यह कारोबार एमजीएम मेडिकल कॉलेज में फैला। इन नंबरों की जानकारी के आधार पर पैसे के लेन-देन की बात को पुख्ता किया जा सकेगा।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक ईओडब्ल्यू ने कुछ ईमेल और फोन व फैक्स नंबर जुटा लिए हैं। 'पत्रिकाÓ को मिली जानकारी के मुताबिक ये ऐसे फोन और फैक्स नंबर हैं, जिन्हें कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में लगाने के लिए किसी की अनुमति भी नहीं ली गई। एक तरह से ये सभी नंबर 'अवैधÓ हैं।

डीन के भी होंगे बयान
ईओडब्ल्यू मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. एमके सारस्वत के बयान भी लेगा। संभवत: यह बयान 15 अगस्त के बाद लिया जाएगा। उनसे पूछा जा सकता है कि किस डॉक्टर ने कितने रुपए कॉलेज के स्वशासी निकाय में जमा करवाए और उन रुपयों का क्या इस्तेमाल किया गया।

मप्र नियमावली की भी घेराबंदी
ईओडब्ल्यू ने ट्रायल करने वालों डॉक्टरों पर मप्र के उन नियमों से भी घेराबंदी करने का मन बनाया है, जो यहां काम करने वाले हर सरकारी कर्मचारी के लिए पालन करना अनिवार्य है। मप्र सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 14 के मुताबिक प्रथम और द्वितीय श्रेणी अफसर 1500 रुपए से अधिक का उपहार नहीं ले सकता है। यदि वह ऐसा करता है तो इसकी जानकारी एक माह के भीतर सरकार को देना अनिवार्य है। नियम 14 के उपनियम पांच के मुताबिक कोई भी सरकारी कर्मचारी एकाउंट पेयी चेक के जरिए 2000 रुपए से अधिक प्राप्त नहीं कर सकेगा। नियम से अधिक प्राप्त करना रिश्वत की श्रेणी में रखा गया है।


फोन / फैक्स नंबर         यहां है कनेक्शन

0731 2512513        चाचा नेहरू अस्पताल 
0731 4048207        नेत्ररोग विभाग 
0731 4066606        मनोरोग विभाग 
0731 2711611        ज्ञानपुष्प सेंटर
0731 2711623        ज्ञानपुष्प सेंटर
0731 2491214        मेडिसिन विभाग
0731 2526839        मेडिसिन विभाग


पत्रिका : १४ अगस्त २०१०